ऐश्वर्य और पराक्रम की शक्ति
Source: अनामिका | Last Updated 00:23(08/10/11)
प्राचीन संस्कृतियों में कुछ साझा मान्यताएं हैं। सबकी जातीय स्मृतियों में कुछ मूल अवधारणाएं मिलती-जुलती हैं। उनमें एक अवधारणा यह कि सृष्टि ‘माइंड’ और ‘मैटर’, ‘यिन’ और ‘यांग’, ‘शक्ति ’ और ‘शिव’ का आवेगमय नर्तन है।
यूनान, रोम और भारत की मिथकीय चेतना, उसका जातीय अवचेतन अधिक कल्पनाशील है। इस कल्पना की आधारभूमि से जो तरह-तरह के बिम्ब फूटे, उनमें ही एक बिम्ब है शक्ति का। शक्ति जो सबमें अंतर्निहित है। शक्ति या ऊर्जा जिसके बिना हम एक पग नहीं धर पाते।
शक्ति कई तरह की होती है - मानसिक, वाचिक, शारीरिक, आध्यात्मिक, राजनीतिक वगैरह। इसके बिना, कहते हैं, शिव भी शव है। विज्ञान जिसे ऊर्जा कहता है, उसके सब लक्षण स्त्री-रूप में संकल्पित इस ‘महाशक्ति ’ में हैं। ऊर्जा अविभाज्य, अनश्वर, सर्वव्याप्त है।
इसके कई प्रकार हैं - ध्वनि, प्रकाश, ऊष्मा, विद्युत, गतिज और चुंबकीय ऊर्जा। ऊर्जस्वी पिंड में गहरा आकर्षण होता है। ऊर्जाएं विनष्ट नहीं होतीं, आपस में रूप जरूर बदल लेती हैं। विद्युत ऊर्जा ध्वनि ऊर्जा में परिवर्तित होती है तो हम दरवाजे की घंटी सुनते हैं और प्रकाश ऊर्जा में परिवर्तित होती है तो लाइट जलती है।
शास्त्रों में शक्ति के कई रूप कहे गए हैं। हर रूप में वह स्त्री शरीर ही पहनती है। यह शायद इसलिए कि स्त्री में भाविक ऊर्जा अधिक होती है और इसी कारण उसकी भाषिक ऊर्जा भी। स्पंदित करने और स्पंदित रखने की उसकी क्षमता अनन्य होती है।
एक प्रयोग करें। आंखें मूंदें और सोचें - जीवन के सबसे सरस, सबसे भास्वर क्षण कौन-से थे और वे किसकी संगति में मिले! मैं बाजी लगा सकती हूं, आंख बंद करते ही आपके मानस पटल पर कोई न कोई स्त्री रूप उभरेगा - दादी, नानी, मां, मौसी, मामी, चाची, बुआ, बहन, बचपन की सहेली, प्रेमिका, पत्नी, शिक्षिका, बेटी!
शायद ही कोई भाग्यवान या भाग्यवती हो जिसके जेहन में किसी पुरुष की स्मृति उभरे। जो एक साधारण स्त्री चुटकियों में कर देती है, प्रेरित और स्पंदित रखने का वह काम विलक्षण पुरुष भी शायद ही कर पाता है।
‘देवी’ शब्द जिस दिव धातु से बना है उसके अनेक अर्थ हैं - क्रीड़ा, विजिगीशा, व्यवहार, द्युति (महिमा), स्तुति, कांति और गति। एक दूसरे को जीतने की होड़ का नाम विजिगीशा है। बाकी सब तत्वों का अर्थ जगतप्रसिद्घ है। ये सब भाव जिस महाभाव में विलीन होते हैं, सब दुख-सुख जिस एक बिंदु पर केंद्रीकृत होते हैं - वही बिंदु है देवी, शक्ति रूप में जिसकी वंदना तरह-तरह से होती है।
सारी दुनिया जिस शक्ति -लाभ के पीछे पागल है, वह शक्ति है क्या? ‘श’ का अर्थ ‘ऐश्वर्य’ और ‘क्ति का पराक्रम। पराक्रम द्वारा अष्टविध ऐश्वर्य (अणिमा, महिमा, गरिमा, लधिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और शशित्व) की सिद्घि संभव है।
वेद, उपनिषद, पुराण और तंत्र देवी के अलग-अलग रूपों की कल्पना करते हैं। वेदों में प्राकृतिक घटनाएं (उषा, रात्रि आदि) या प्रकृति स्वयं (नदियां, अरण्य), मन के शुभ भाव (अनुरति, श्रृद्घा, स्वस्ति, विद्या आदि) देवी के रूप में प्रकल्पित हैं।
पुराण काल में देवियां देवताओं की शुभांगी पत्नियां हैं। वायसायनि संहिता और तैत्रीय ब्राह्मण फसल कटाई की ऋतु (शरदकाल) में जिस देवी अंबिका का आह्वान करते हैं, पुराण काल में वही दुर्गा हो जाती हैं। सब क्रियाकलापों का उत्स अन्न है और ‘अन्न’ की कटाई के मौसम में वे नैहर (धरती पर) आती हैं।
धरती जब आततायी शक्ति यों के वशीभूत हो जाती है, वे संकल्प शक्ति के रूप में प्रकट होती हैं। इस संकल्प शक्ति के सहारे ही लोग दुर्वृत्तियों के निवारण में सफल होते हैं। लोक तत्व दशहरे पर दुर्गा के नैहर-ससुराल आने-जाने की कल्पना से जोड़कर इन्हें सहज स्त्री तत्व से एकाकार करता है।
इनके जन्म की कथा सर्वविदित है कि समस्त देवगण यानी समस्त शुभ भाव अपना तेज संचित कर इनकी मूर्ति गढ़ते हैं। धरती पर इनकी मूर्ति जिन जगहों से मिट्टी लाकर गढ़ी जाती है, उनमें एक जगह वेश्याओं का द्वार भी है। देवी ऊंच-नीच नहीं मानतीं, ठीक वैसे जैसे मिट्टी।
वह कोई छुआछूत नहीं मानतीं। कोई भी वनस्पति औषधि हो सकती है। हर प्राणी देवत्व की संभावनाओं का उत्कट उद्घोष है। शक्ति कहीं भी छिपी हो सकती है, उसके उद्घाटन का सम्यक और सामूहिक यत्न जरूर होना चाहिए।