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तेज रफ्तार का जानलेवा रोमांच

 
Source: भास्कर न्यूज़   |   Last Updated 00:09(08/10/11)
 
 
 
 
कुछ लोग खासकर युवा कंक्रीट की चिकनी सड़कों को आकाश, अपनी बाइक्स को रॉकेट और खुद को पायलट समझने की भूल कर बैठते हैं। रफ्तार का यह रोमांचक सफर कमोबेश अस्पताल के बिस्तर पर खत्म होता है और कई बार तो मौत की अंधी सुरंग में।

रफ्तार से युवाओं को कुछ ज्यादा ही इश्क होता है। वहीं दूसरी ओर हेलमेट जैसे सुरक्षा उपाय अपनाना उनको सिर पर बोझ लादने जैसा मालूम होता है। शहर की भीड़ भरी सड़कों से थोड़ा अलग हाईवे उनको अपने इस शौक को पूरा करने का बेहतर जरिया लगते हैं लेकिन वहीं इन सड़कों पर भारी-भरकम वाहन भी चलते हैं। बस यहीं पर थोड़ी-सी चूक उम्र भर का पछतावा बन जाती है।

आज यूथ के ज्यादातर आइकॉन फिल्मी अभिनेता ही हैं। फास्ट ऐंड द फ्यूरियस, धूम जैसी फिल्में उनके अंदर स्पीड का क्रेज पैदा करते हैं। इसके अलावा वीडियो गेम्स खेलकर बड़ी होने वाली एक पीढ़ी ऐसी भी है जो वचरुअल वर्ल्ड में तेज रफ्तार का रोमांच अनुभव करने के बाद उसे हकीकत में आजमाने को आतुर हो जाती है। लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि जिंदगी वीडियो गेम नहीं है जहां किसी भी ठोकर के बाद खिलाड़ी उठ खड़ा होता है।

दिल्ली स्थित मैक्स हॉस्पिटल के मनोचिकित्सक डॉ. समीर पारेख के अनुसार, किशोरों में रिस्क उठाने की लालसा दूसरों के मुकाबले ज्यादा होती है। वे जब मीडिया में और अन्य माध्यमों में लोगों को तेज गति से बाइक चलाते देखते हैं तो उन्हें लगता है कि यह सब बहुत ही एक्साइटिंग है।

फिर यहीं से शुरू होता है खुद को औरों से अलग समझने का क्रम। दिल्ली के ही अपोलो अस्पताल के सीनियर कंसल्टेंट डॉ. एन के बोहरा कहते हैं कि मां बाप को चाहिए कि बच्चों को डिसीजन मेकिंग में हिस्सेदार बनाएं उन्हें पर्याप्त तवज्जो दें। बच्चों को ऐसे जोखिम उठाने से बचने की सलाह दे। उन्हें जिम्मेदार बनना सिखाएं।

कुछ अरसा पहले एक शोध के आंकड़ों के मुताबिक दुनिया भर में सड़कों पर होने वाले कुल हादसों में से 80 फीसदी अधिक रफ्तार की वजह से होते हैं। इनमें होने वाली मौतों में से 90 फीसदी से बचा जा सकता था अगर बाइक सवारों ने कानूनी मानकों पर खरे उतरने वाले हेलमेट लगाए होते।

2009 में देश में सड़क दुर्घटनाओं में हुई कुल मौतों में से 21 फीसदी लोग दोपहिया वाहन पर सवार थे।

2009 में 1.26 लाख लोग सड़क दुर्घटनाओं के शिकार हुए। इस वर्ष हर घंटे देश की सड़कों पर 14 लोगों की जानें गईं, जबकि इसी अवधि में 56 लोग घायल हुए।

क्या करें मां बाप

बच्चों को कम उम्र में बाइक चलाने के लिए कभी प्रोत्साहन न दें। बगैर लाइसेंस उन्हें गाड़ी लेकर सड़क पर न निकलने दें।

बच्चे स्वभाव से ही थोड़े लापरवाह होते हैं,उन्हें रोमांच अच्छा लगता है। उन्हें तेज वाहन चलाने के खतरों से रूबरू कराएं। ऐसा न करने के लिए प्रेरित करें।

बच्चों को सुरक्षित गाड़ी चलाने का हुनर सिखाएं।
 
 
 

 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
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