मेरा कन्फेशन: विश्वास से बंधे रिश्ते का यह कैसा सिला!
Source: अर्पणा कौर | Last Updated 23:12(07/08/11)
हमारी जिंदगी तमाम तरह के खट्टे-मीठे अनुभवों से मिलकर बनती है। इनमें कई तरह की खुशियों के बीच कुछ रंज, कुछ अफसोस भी शामिल होते हैं। वे भी जिंदगी के ढेर सारे रंगों में से एक रंग ही हैं। मुझे बचपन से अफसोस रहा कि मेरे जीवन में कभी कोई ऐसा पुरुष नहीं रहा जिसका हाथ अपने सिर पर होने से मैं आश्वस्त महसूस कर सकूं। मुझे अपने जीवन में पिता और भाई की कमी हमेशा खली है, अब भी खलती है। मुझे उस कलाई की कमी महसूस होती जिस पर मैं राखी बांधती और आजीवन रक्षा का वचन लेती।
मेरी इसी चाहत, इसी कमजोरी का एक शख्स ने ऐसा फायदा उठाया जिसका अफसोस मुझे ताउम्र रहेगा। अफसोस इस बात का नहीं कि उसने मुझे आर्थिक नुकसान पहुंचाया, बल्कि इस बात का कि उसने भाई बनकर मेरी भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया। बात करीब 10 साल पुरानी है। मेरी अकादमी में एक कश्मीरी नौजवान कलाकार आया। उसके साथ बुजुर्ग माता-पिता और भाई-बहन थे।
वह पढ़ा- लिखा शिष्ट आदमी था। उसकी जरूरतों को देखते हुए मैंने उसे अपनी अकादमी में पढ़ाने का काम सौंप दिया। समय बीतता गया और वह लगभग मेरे परिवार का एक अंग हो गया। कई दफा वह मेरे और मेरी मां के साथ खाना खाता। इसी दौरान उसने कई बार अपनी वित्तीय कठिनाइयों का भी जिक्र किया। मेरे लिए वह बिल्कुल भाई जैसा था। मैं उसकी सारी चिंताओं में शरीक रहा करती थी।
ईस्ट ऑफ कैलाश के माउंट कैलाश टॉवर में हमारा एक तीन बेडरूम का फ्लैट था। हम सब उससे भावनात्मक रूप से जुड़े हुए थे क्योंकि वह दिल्ली में हमारा पहला मकान था जिसे हमने किस्तों पर खरीदा था। मेरी मां ने छह महीने तक खुद खड़े रहकर वहां काम करवाया था। बाद में हम उस मकान को छोड़कर अपनी अकादमी चले आए। हमारे पुराने पड़ोसी उस घर के लिए हमें डेढ़ करोड़ रुपए तक देने की पेशकश लगातार कर रहे थे। इस बीच मेरे उस कश्मीरी भाई की शादी हुई।
उसे भी दिल्ली में रहने के लिए अपने ठिकाने की जरूरत थी। उसने मुझसे कहा कि मैं उसे वह मकान 70 लाख रुपए में बेच दूं। यह पैसे भी उसे बैंक से लोन लेने थे क्योंकि इतनी उसकी हैसियत नहीं थी। मैंने अपने परिवार में मशविरा किया। मेरे पति और मेरी मां दोनों इस बात के बेहद खिलाफ थे। लेकिन मैंने उनकी बात को ठुकराकर उसे मकान 70 लाख रुपए में दे दिया।
उसने मुझसे वादा किया कि अगर वह बैंक का कर्ज नहीं चुका पाया तो मेरा मकान उसी कीमत पर मुझे वापस कर देगा। कर्ज चुकाने में उसे हो रही परेशानी को देखते हुए मैंने तीन गैलरियों में उसकी प्रदर्शनी लगाने के लिए भी बात चलाई। लेकिन करीब छह महीने पहले उस समय मेरे दुख की सीमा नहीं रही जब मुझे पता चला कि वह उस मकान को 2.15 करोड़ रुपए में किसी को बेचकर चंपत हो गया।
यह मेरे लिए बहुत बड़ा आघात था क्योंकि मैंने उसे भाई माना और उसने मेरा भरोसा तोड़ा था। इस बात को छह महीने बीत गए, मैंने अनगिनत बार उसे फोन लगाया लेकिन सब बेकार। मैंने उसको ढूंढ़ने की लाख कोशिश की लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। कानूनन तो मकान उसका था और वह उसे बेच सकता था लेकिन मुझे इस बात का दुख होता है कि मैंने उसे भाई समझा और उसने मानवीय रिश्तों और भावनाओं को क्रूरता से कुचल दिया।
उसने 10 साल के घनिष्ठ और विश्वास से बंधे रिश्ते का यह सिला दिया था। यह चेहरे पर पड़े थप्पड़ से भी ज्यादा झकझोरने वाला था। घर का सौदा और उसे भाई मानने का अफसोस हमेशा रहेगा। उसने जो जख्म मेरी आत्मा को दिया है उसकी टीस जीवनभर रहेगी।
(जैसा उन्होंने पूजा सिंह को बताया)