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मेरा कन्फेशन : वह किताब क्यों ली वापस!

 
Source: प्रसून जोशी   |   Last Updated 00:05(31/07/11)
 
 
 
 
वैसे तो मेरा फलसफा आज में जीने का है और इसलिए मैं बुरी और पीछा करने वाली यादों को अपने दिल में जगह नहीं देता। हां, एक वाकया मुझे याद आता है। मैंने बचपन में अल्मोड़ा में अपने गांव में एक बाल पुस्तकालय खोल रखा था। उसमें भी मैंने अपनी रचनात्मकता दिखाई। अपने पुस्तकालय के लिए मैं हाथ से पोस्टर बनाकर यहां-वहां चिपका दिया करता था कि प्रसून बाल पुस्तकालय का रास्ता इधर से है।

एक बार की बात है, मेरा एक दोस्त मेरी पसंदीदा काटरून की किताब ले गया। कई दिनों बाद भी जब उसने किताब वापस नहीं की तो मुझे बहुत गुस्सा आया। मैंने अपने बड़े भाई के साथ पहले उसके गांव का पता हासिल किया और फिर जा पहुंचा सीधे उसके घर। इस पर भी उसने किताब देने से मना कर दिया।

हमें उसके साथ काफी डांट-डपट करनी पड़ी। तब कहीं जाकर वह किताब हमें वापस मिल सकी। खैर! किताब तो मिल गई। लेकिन हम जिस तरह से उससे किताब लाए थे, बाद में उसके बारे में सोचकर मुझे बहुत अखरने लगा। आखिर किताब ही तो थी, अगर उसने रख ली तो क्या बिगड़ जाता मेरा! आज वो न जाने कहां होगा, लेकिन मेरे बारे में तो उसने उस एक घटना से ही छवि बनाई होगी। इसका आज भी मुझे बहुत अफसोस होता है।

मैं बचपन से ही कारोबार में भी रुचि रखता था। एक किस्सा सुनाता हूं। मेरी नानी चूरन बनाया करती थीं और मैं वह चूरन छोटे-छोटे कागज के पैकेट बनाकर उसमें डाला करता था। यही नहीं, मैं चूरन के साथ उन पैकेटों में इनाम रखा करता था ताकि लोग उन्हें खरीदें। इनाम में साबुनदानी, छल्ला, ढक्कन, कलम, कॉपी, पंखा, किताब जैसी चीजें हुआ करती थीं।

यह उस वक्त मेरा एक प्रयास था अपने उत्पाद की बिक्री बढ़ाने का। अब तो ये सारी बातें याद करके हंसी आती है। तब भी घर के लोग कहा करते थे कि तू कहां चूरन बेचता रहता है कुछ पढ़ा-लिखा कर। लेकिन मैं इसे अपने पहले कारोबारी प्रयास के रूप में देखता हूं, भले ही वह सफल नहीं हो पाया। बचपन से ही मैं इंडस्ट्री और बिजनेस की बात करता था। पांच पैसे में मैं एक चूरन का पैकट बेचता था। इस तरह मेरे विज्ञापन और फिल्मों में आने की पृष्ठभूमि बचपन में ही तैयार हो गई थी।

मैं बचपन से ही कविता, लेख, कहानी या कुछ नया करने के बारे में हमेशा सोचा करता था। इसी सब में कहीं उस किताब की घटना जेहन से हट गई। जब थोड़ा बड़ा हुआ तो मैंने एक पत्रिका निकाली। मेरे पिताजी के ऑफिस में एक साइक्लोस्टाइल मशीन थी। रात में अपनी कविताएं, लेख, कहानियां उसमें स्टेंसिल के जरिए छापता और बाद में धागे से बांधकर उसका कवर बनाकर सर्कुलेट करता।

वह पत्रिका काफी पढ़ी भी जाती थी। कई बार लोग पूछते थे कि उस कहानी का अगला हिस्सा कब आएगा। यह सुनकर काफी प्रसन्नता होती थी। उस समय हमारे पास समय होता था, किताबें होती थीं, आसमान होता था, परिवार व दोस्तों का साथ होता था। हम बाहर खेलने जाया करते थे। आज की तरह नहीं था कि मां-बाप बच्चों को टीवी और वीडियोगेम में व्यस्त रखना चाहते हैं। हम उस समय कल्पना की दुनिया में रहते थे। कल्पना लोक से जुड़ा रहना अच्छा लगता था।

(जैसा उन्होंने पूजा सिंह को बताया)

प्रसून जोशी होने का अर्थ

विज्ञापन गुरु के नाम से विख्यात प्रसून को अब तक विज्ञापन जगत में शानदार काम के लिए 200 से अधिक पुरस्कार मिल चुके हैं।

ठंडा मतलब कोकाकोला’ नामक उनके विज्ञापन को कांस का गोल्डन लॉयन पुरस्कार मिला था।

हिंदी सिनेमा में हम-तुम, तारे जमीं पर, रंग दे बसंती जैसी फिल्मों के गीत लिखने वाले प्रसून को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी मिल चुका है।
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
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