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नई डगर के राही

 
Source: रसरंग टीम   |   Last Updated 00:10(22/09/11)
 
 
 
 
सफल बदलाव की चार प्रेरक कहानियां..।

डॉ पुश्किन

हिमालय में ग्रीन इकोनॉमी का मॉडल खड़ा किया

क्या?:

पुश्किन फत्र्याल हिमालय में प्राकृतिक संसाधनों और पर्यावरण की रक्षा करते हुए पहाड़ी ग्रामीणों के लिए आजीविका के साधन विकसित करने में जुटे हैं। वह ग्रीन इकोनॉमी या पर्यावरण के अनुकूल अर्थव्यवस्था बना रहे हैं।

विचार यह है कि पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बगैर पहाड़ों पर रहने वालों की बढ़ती आबादी आजीविका का प्रबंध कर सकती है। इसके लिए बस प्राकृतिक संसाधनों का इस तरह प्रबंधन करना होगा जो आजीविका पर आधारित हो।

इसमें गांवों को रोपवे के माध्यम से सड़कों से जोड़ना, पॉली हाउस जैसी कम लागत की खेती की तकनीक अपनाना, बरसाती पानी के पॉलीथिन के संचय टैंक बनाना और उन्हें जन समुदाय को सुलभ करवाना और सामुदायिक कार्बन वानिकी की अवधारणा को प्रोत्साहित करना शामिल है।

उत्तराखंड में विकसित इस मॉडल को अब वह देश के अन्य हिमालयी राज्यों और एशिया के अन्य हिमालयी देशों (अफगानिस्तान से म्यांमा) तक पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं। इसके लिए भारतीय पर्वतीय पहल कार्यक्रम हाल ही में आरंभ किया गया है।

कैसे?:

पुश्किन ने देखा कि पहाड़ों पर आबादी के बढ़ते दबाव के कारण हो रही पर्यावरण की क्षति को रोकना है तो आजीविका के ऐसे स्रोत विकसित करने होंगे जिनसे पर्यावरण का नुकसान न हो। इसके लिए उन्होंने कई उपाय तजवीज किए।

सामुदायिक कार्बन वानिकी में ग्रामीणों को जागरूक किया कि किस तरह पेड़ कार्बन सोखकर और ऑक्सीजन छोड़कर पर्यावरण को स्वच्छ रखते हैं। उन्हें वैज्ञानिक यंत्रों और तरीकों से वनों द्वारा सोखे जाने वाली कार्बन गैस की वार्षिक दर को मापने के लिए प्रशिक्षित किया गया।

यह सामने आया कि उत्तराखंड में वन पंचायतों के अधीन आने वाले वन प्रतिवर्ष प्रति हैक्टेयर 3-4 टन कार्बन सोखते हैं। सामुदायिक कार्बन वानिकी के लिए पुश्किन की रिपोर्ट के आधार पर योजना आयोग ने राज्यों में वन प्रबंधन के लिए 1000 करोड़ रुपए की धनराशि तय की है।

पुश्किन ने पहाड़ के गांवों में सामुदायिक संगठन बनाकर उन्हें सक्षम और सशक्त बनाया। उन्हीं की पहल पर राज्य में 12,089 वन पंचायतें कायम हुई हैं और अच्छा काम कर रही हैं।

कौन?:

डॉ पुश्किन नैनीताल में रहते हैं और नोबेल विजेता अल गोर के ‘द क्लाइमेट प्रोजेक्ट’ के अलावा कई अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रमों से जुड़े हैं। उनकी पत्नी डॉ बिनीता फत्र्याल भू-वैज्ञानिक हैं और शोध के लिए दक्षिणी व उत्तरी ध्रुव की यात्रा करने वाली पहली भारतीय महिला वैज्ञानिक भी।

बिप्लब पॉल

पानी को समुदाय की आर्थिक तरक्की का आधार बनाया

क्या?:

बिप्लब पॉल ने गुजरात के एक पिछड़े और आदिवासी बहुल इलाके में बारिश के पानी के संग्रह और सिंचाई की ऐसी व्यवस्था बनाई है जिससे हाशिये के किसानों के जीवन में खुशहाली आई है। यह व्यवस्था समुदायों के बीच महिलाओं के द्वारा चलाई जा रही है।

इसे ‘भुगंरू’ नाम दिया है जो बोतल से पानी खींचने वाले ‘स्ट्रा’ के लिए स्थानीय बोली का शब्द है। संदेश यह है कि सब सिर्फ उतना ही पानी लें जितना जरूरी हो। प्रारंभ में ही बिप्लब ने पाया कि पानी की कमी के कारण छोटे किसान शहरों में मजदूरी करने को विवश हैं।

पानी में नमक की मात्रा भी इतनी ज्यादा है कि वह जमीन के अंदर नहीं जा पाता और दूसरी समस्याओं को जन्म देता है। लिहाजा उन्होंने जमीन के अंदर विशाल जलाशय बनवाए, इनमें वर्षा के पानी की एक-एक बूंद एकत्र करने की प्रणाली खड़ी की और फिर इनसे सभी की जरूरत के अनुरूप पानी देने की व्यवस्था स्थापित की। जहां उन्हें टेक्नोलॉजी की जरूरत पड़ी, विशेषज्ञों की मदद ली।

बांग्लादेश के मुहम्मद युनूस के ग्रामीण बैंक का आर्थिक मॉडल अपनाया। समाजशास्त्र खुद विकसित किया। वर्ल्ड बैंक सहित कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने बिप्लब द्वारा विकसित मॉडल की सराहना की है। देश के आठ राज्य और मलयेशिया, इंडोनेशिया, पाकिस्तान जैसे देश उनकी सलाह ले रहे हैं।

कैसे?:

17 साल पहले बिप्लब ने पानी की बात कहना शुरू किया। उन्होंने कहानी और खेलों के माध्यम से बच्चों को पढ़ाने की पहल की। इस तरह बच्चे पहले घरों में उनका नाम लेकर गए और यह ‘बंगाली भाई’ गुजराती भाषी घरों में स्वीकार्य होने लगे।

महिलाओं में विश्वास जमा तो उन्होंने महिला बचत मंडल बनाए। जनसमस्याओं खासकर पानी के लिए छोटे-मोटे स्थानीय आंदोलन भी किए। 2006 में उन्होंने भुंगरू विकास नामक महिलाओं द्वारा संचालित सामुदायिक संगठन बनाया।

एक भुंगरू समूह में छह महिलाएं होती हैं जो ग्रामीण बैंक के जवाबदेही के मॉडल पर काम करती हैं और कभी विफल नहीं होतीं। 4 करोड़ लीटर क्षमता का विशाल भूमिगत जलाशय किसानों को दो से तीन फसलों के लिए पानी देता है।

यह वर्षा के पानी से भरता है और इस तरह भरता है कि पानी को बर्बाद नहीं होने देता। इससे साल के सात महीनों तक खेती के लिए पानी लिया जा सकता है। बिप्लब के मॉडल में सारी जिम्मेदारियां लोग खुद संभालते हैं और खुद ही मॉनीटरिंग करते हैं।

वह न्यूनतम हस्तक्षेप के सिद्घांत पर काम करते हैं। बंगाली लहजे में वह कहते हैं- ‘महिलाओं को दे दो, सीखेगा और करेगा।’ उनकी टीम में 11 विशेषज्ञ, 131 स्वयंसेवक हैं। 20,000 महिलाएं उनके विकास मॉडल से जुड़ी हैं।

कौन?:

बिप्लब की पत्नी तृप्ति पर्यावरण इंजीनियर और साथ ही रॉकफेलर फाउंडेशन फेलो व कॉमनवेल्थ स्कॉलर हैं। 11 साल की एक बेटी है जिसका नाम उन्होंने नयरीता रखा है, जिसका अर्थ है सिंचाई के लिए अच्छी वर्षा लाने वाले बादल।

निधि प्रभा तिवारी

लोकतंत्र में लोक और तंत्र के बीच का फासला कम किया

क्या?:

लोकतंत्र में लोक और तंत्र के बीच में जो फासला है वह निधि प्रभा तिवारी को हमेशा परेशान करता था। उन्होंने देखा कि सर्वोच्च संसद से लेकर ग्राम पंचायतों तक लोकतांत्रिक संस्थाओं में कोई तालमेल नहीं है। समूची राजनीतिक प्रणाली संरक्षण पर आधारित है।

प्रारंभ में उन्हें लगा कि जनहित की नीतियों के बारे में शोध करके उनके निष्कर्ष सांसदों के सामने रखे जाएं तो शायद फासला कुछ कम हो। उन्होंने बाकायदा कुछ सांसदों के साथ काम किया। राजनीतिक दलों के युवा संगठनों के साथ भी उन्होंने संवाद किया।

लेकिन पाया कि सांसद पार्टी और उसके व्हिप से बंधे हैं। कई बार वे कानून बनाने के काम को बहुत महत्वपूर्ण भी नहीं समझते। जल्दी ही वह इस नतीजे पर पहुंचीं कि लोकतांत्रिक प्रश्नों और बहसों को सीधे जनता के बीच ले जाना जरूरी है। इसके लिए जरूरी प्लेटफॉर्म भी नहीं हैं।

कैसे?:

2007 में निधि ने डेमोक्रेसी कनेक्ट नाम की गैरसरकारी संस्था का गठन किया। इसके माध्यम से वह जन नीतियों और राजनीतिक प्रणाली में जनता की भागीदारी बढ़ाने पर काम कर रही हैं। वह कहती हैं कि जनता के बीच बहसों के लिए सार्वजनिक पुस्तकालयों का होना बहुत जरूरी है।

वह उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले में 17 साल पुरानी एक पब्लिक लायब्रेरी के साथ 30 ग्राम पंचायतों में काम कर रही हैं। यहां वह एक ऐसा मॉडल विकसित करने के लिए प्रयासरत हैं जिसमें ग्राम सभाओं से लेकर स्थानीय सांसद तक सभी का जन नीति से जुड़ाव हो। निधि शहरों में एक्टिव सिटिजन या सक्रिय नागरिक तैयार करने के लिए भी काम कर रही हैं।

कौन?:

लखनऊ में पली-बढ़ी निधि ने 2001 में ग्रामीण प्रबंधन संस्थान आणंद से डिग्री ली। अपने दो साल के बेटे और बिजनेस कंसल्टेंट पति के साथ वह दिल्ली में रह रही हैं।

राजीव खंडेलवाल

प्रवासी मजदूरों को पहचान और उनके हक दिलवाए

क्या?:

राजीव खंडेलवाल राजस्थान के उदयपुर में प्रवासी मजदूरों की बदहाल जिंदगी में मुस्कान की एक लकीर खींचने के लिए काम कर रहे हैं। उन्होंने देखा कि रोजगार-धंधों की कमी के कारण बड़ी संख्या में लोग इस आदिवासी इलाके से खासकर पड़ोसी गुजरात के शहरों में जाकर मजदूरी करते हैं।

उन्हें जिस किस्म के संकटों और शोषण से दो-चार होना पड़ता है, वह किसी को भी द्रवित करने को काफी है। राजीव ने उनकी तकलीफों को कम करने को अपना मिशन बनाया। प्रवासी मजदूरों के लिए सबसे पहला संकट पहचान का होता है।

राजीव ने उन्हें पहचान पत्र जारी करना शुरू किया जिस पर उनका नाम व फोटो और सरपंच के दस्तखत होते हैं। फिर उन्हें कामों का प्रशिक्षण देना शुरू किया। राजीव बताते हैं कि 68 फीसदी मजदूर अपने काम का पूरा मेहनताना भी वसूल नहीं कर पाते। लिहाजा वह इन्हें कानूनी शिक्षा और मदद भी मुहैया करवाते हैं।

आज 70,000 प्रवासी मजदूरों के पास फोटो पहचान पत्र हैं। 1600 प्रवासी युवा तकनीकी प्रशिक्षण हासिल कर रहे हैं। उनके लिए 550 मुकदमे लड़े गए हैं और उन्हें उनकी मेहनत के 52 लाख से ज्यादा रुपए दिलवाए गए हैं।

कैसे?:

2005 में राजीव ने आजीविका ब्यूरो नामक संगठन की स्थापना की, जो अब अपनी खास पहचान बना चुका है। यह प्रवासी मजदूरों के गांव की पहचान करके उन्हें रजिस्टर करता है और फिर उन्हें कार्ड जारी करता है। सबसे मुश्किल होता है इन मजदूरों को कानूनी हक दिलवाना।

ब्यूरो पहले विवादों को बातचीत से सुलझाता है। बीच-बचाव के दौरान ब्यूरो निष्पक्ष ढंग से पेश आता है जिससे नियोक्ता भी अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करते हैं। ब्यूरो अब मजदूरों को शहरी व्यवहार के तौर-तरीकों का प्रशिक्षण भी देता है। राजीव प्रयासरत हैं कि उनका मॉडल देश के दूसरे हिस्सों में भी प्रवासी मजदूरों के लिए लागू हो सके।

कौन?:

अविवाहित राजीव कहते हैं, ‘मैंने शादी नहीं की पर दोस्तों का मेरा काफी बड़ा परिवार है।’
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
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