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उपन्यास अंश: रिवॉल्यूशन 2020

 
Source: चेतन भगत   |   Last Updated 00:11(08/10/11)
 
 
 
 
मैं शांत हो गया। हम दूर शाम की आरती होती देख रहे थे। दर्जन भर पंडित। हाथों में जलती मशालों के आकार की विशाल आरतियां। सभी के हाथ एक साथ, एक गति और एक लय में उठते और नीचे आते हुए। पृष्ठभूमि में मंत्रों का उच्चर।

चारों तरफ हजारों सैलानियों से घिरे। बनारस के घाटों की आरती जितनी भी बार देखें, हर बार मन मोह लेती है। मेरे नजदीक बैठी इस आरती की तरह। वो काले वाले दिखाइए,’ आरती ने दुकानदार से कहा। उसने हैंगर पर लटके कोई दर्जन भर कपड़ों की ओर इशारा किया।

हम नदेसर रोड पर घरेलू चीजों की दुकान में आए थे। मुझे कोटा में अपनी जरूरत की चीजें खरीदनी थी। ‘मैं खरीदारी में तुम्हारी मदद कर रही हूं इसका मतलब यह नहीं कि तुम्हारे बनारस छोड़ने से मैं खुश हूं,’ आरती बोली।

‘मैं नहीं जाऊंगा। एक बार कह भर दो मैं अपना टिकट कैंसिल करवा लूंगा।’ उसने मेरे गाल पर हाथ रखा। ‘मुझे सोचकर ही खराब लगता है कि मेरा सबसे अच्छा दोस्त जा रहा है। मगर तुम्हारे लिए यही सही रास्ता है।’
आरती ने पसंद के हैंगर चुन लिए। हरेक की कीमत थी पचास रुपए। ‘अंकल, मैंने टॉवेल, साबुनदानी और भी कितनी सारी चीजें खरीदी हैं। आपको अच्छा डिस्काउंट देना पड़ेगा।’

दुकानदार ने मुंह बनाया, पर आरती ने उस पर ध्यान नहीं दिया। ‘साथ आने के लिए शुक्रिया। मुझे तो पता भी नहीं था कि क्या खरीदना है,’ मैंने उससे कहा। ‘तुमने बर्तन खरीदे? भूल गए न?’‘मैं खाना बनाने वाला नहीं हूं। वहां टिफिन सिस्टम है।’

लेकिन आरती तब तक बर्तनों वाले हिस्से में दाखिल हो चुकी थी। उसने एक बड़ा स्टील का बाउल उठाया और मुझे दिखाते हुए कहा, ‘इमरजेंसी के लिए। अगर मैं तुम्हारे साथ कोटा आई तो रोज अपने हाथों से तुम्हारे लिए खाना बनाऊंगी।’

उसने अपने गोरे हाथों में वह चमकीला बर्तन उठा रखा था। मेरे दिमाग में तस्वीर कौंधी जिसमें वह मेरे किचन में खाना बना रही थी। आरती इस तरह की बातें क्यों कहती है। मैं क्या कहूं ऐसे में। मैंने सिर्फ इतना कहा, ‘मैं मैनेज कर लूंगा।’

दुकानदार ने बिल थमाया। आरती ने मेरी तरफ देखा। वह हर बार मुझे सम्मोहित करती है। दिन-ब-दिन सुंदर होती जा रही है। अपनी मां के साथ दुकान पर आई एक छोटी-सी लड़की आरती के पास आई। ‘आप टीवी पर आती हैं न?’

आरती ने सिर हिलाया और मुस्कराई। वह दुकानदार की तरफ मुड़ी। ‘अंकल, ट्वेंटी परसेंट डिस्काउंट।’ आरती को अपनी खूबसूरती का अहसास नहीं था। उसने कभी आईने में खुद को निहारा नहीं, कभी मेक-अप नहीं किया, यहां तक कि उसके बाल अक्सर सारे चेहरे पर बिखरे रहते। इससे वह और ज्यादा आकर्षक लगती।

‘चलें,’ उसने कहा।

‘जैसी मर्जी।’

‘क्या हुआ?’

‘तुम अचानक से ऐसी बात कह देती हो ‘अगर मैं कोटा आई’।’

‘मैं आ सकती हूं। मैं डैड से कहूंगी मैं भी एक साल दोहराना चाहती हूं। कौन जानता है,’ उसने आंख झपकाई।

मैंने उसे गौर से देखा। मैं उसकी बात में गंभीरता की झलक देखना चाहता था। क्या यह मुमकिन होगा?

‘सचमुच?’ मैंने कहा। मुझे भरोसा होने लगा था।

‘मैं मजाक कर रही हूं, स्टुपिड। मैंने तुम्हें बताया तो था। मैंने अग्रसेन कॉलेज में साइकोलॉजी ऑनर्स में दाखिला लिया है।’

‘मैंने सोचा तुम..।’

‘तुम इतने भोले क्यों हो?’ वह ठहाका लगाते हुए दोहरी हो गई।

‘भोले.. मतलब?’ मैंने कहा। उसने मेरे गाल पर चिकोटी काट ली। ‘ओह,’ मैंने कहा और अपने को शांत किया।

कोई सूरत नहीं थी कि वह कोटा आ सके। मैं इतना भोला भी नहीं हूं। मैं समझता हूं। तो भी आरती मेरी तर्क क्षमता को हरा देती है। उसके साथ होता हूं तब मैं सोचना बंद कर देता हूं।

मैंने खरीदी हुई चीजें बटोरीं और देखा कि वह दुकानदार को पैसे दे रही है।

‘अरे, रुको,’ मैंने कहा, ‘मैं दूंगा।’

‘हो गया। चलो चलें,’ उसने मेरी कोहनी को झटका दिया और दुकान के बाहर खींच लाई।

‘कितना हुआ,’ अपना वॉलेट टटोलते हुए मैंने कहा।

उसने वॉलेट मेरे हाथ से लिया और वापस मेरी शर्ट की जेब में रख दिया। उसने आहिस्ता-से मेरे होंठों पर एक उंगली रख दी।

लड़कियां इतने कंफ्यूजिंग सिग्नल क्यों देती हैं? उस दिन नाव पर उसने मुझे झिड़क दिया था। उसके बावजूद मुझे वो बोरिंग कपड़े खरीदवाने आ जाती है और मुझे पैसे भी नहीं देने देती। दिन में तीन बार मुझे फोन करती है कि मैंने खाना खाया या नहीं। क्या समझूं? उसे मेरी फिक्र है या नहीं है?

‘सिगरा पर नया डोमिनो ट्राय करना चाहोगे?’ उसने कहा।

‘हम घाट पर चल सकते हैं?’ मैंने कहा।

‘घाट?’ उसने आश्चर्य से कहा।

‘जाने से पहले मैं ज्यादा से ज्यादा बनारस को जज्ब कर लेना चाहता हूं।’

हम ललिता घाट की सीढ़ियां चढ़ने लगे। दाहिनी तरफ भीड़-भाड़ भरे दशाश्वमेध घाट की तुलना में यहां शांति थी। हम एक दूसरे के अगल-बगल बैठ गए और शाम के सूरज की आभा में गंगा को रंग बदलते देखने लगे।

हमारे बाईं तरफ मणिकर्णिका घाट पर कभी न बुझने वाली चिताओं की लपटें फड़फड़ा रही थीं। इस घाट का नाम शिव के कानों की बाली पर पड़ा है जो उन्होंने यहां नृत्य करते हुए गिरा दी थी। यह संसार में अंत्येष्टि के लिए पवित्रतम स्थल माना जाता है।

उसने हौले-से मेरी कोहनी थाम ली। मैंने आसपास नजर दौड़ाई। कुछ सैलानियों और साधुओं के अलावा कुछेक स्थानीय लोग भी थे। मैंने धीमे-से अपनी कोहनी छुड़ा ली।

‘क्या हुआ?’ उसने कहा।

‘यह नहीं। अच्छा नहीं है। खासकर तुम्हारे लिए।’

‘क्यों?’

‘क्योंकि तुम लड़की हो।’

उसने झटके से मुझसे अपनी कोहनी सटा ली। ‘लड़की हूं तो क्या?’

‘लोग बातें करेंगे। वे कोहनियां सटाकर घाट पर बैठी लड़कियों के बारे में अच्छी बातें नहीं कहते।’

‘हम सचमुच अच्छे दोस्त ही तो हैं,’ उसने कहा।

मुझे इस शब्द से नफरत थी। मैं पूछना चाहता था कि उसकी जिंदगी में मेरी क्या जगह है, पर मैं माहौल खराब नहीं करना चाहता था। ‘लेकिन अब तो मैं जा रहा हूं,’ मैंने कहा।

‘तो? वी विल बी इन टच। हम फोन करेंगे। हम नेट पर चैट कर सकते हैं। कोटा में साइबर कैफे तो हैं न?’

मैंने सहमति में सिर हिलाया।

‘इतने उदास मत दिखो,’ उसने कहा। दूर मंिदर की घंटियां बजती सुनाई दीं। शाम की आरती शुरू होने वाली थी।

‘तुम्हारी प्रॉब्लम क्या है?’ मैंने कहा।

‘किस बारे में?’ उसने कहा।

‘हमारे बारे में। दोस्त से ज्यादा होने के बारे में।’

‘प्लीज, गोपाल, दोबारा नहीं।’

मैं शांत हो गया। हम दूर शाम की आरती होती देख रहे थे। दर्जन भर पंडित। हाथों में जलती मशालों के आकार की विशाल आरतियां। सभी के हाथ एक साथ, एक गति और एक लय में उठते और नीचे आते हुए। पृष्ठभूमि में मंत्रों का उच्चर। चारों तरफ हजारों सैलानियों से घिरे। बनारस के घाटों की आरती जितनी भी बार देखें, हर बार मन मोह लेती है।

मेरे नजदीक बैठी इस आरती की तरह। उसने मोरपंखी नीले रंग की सलवार-कमीज पहन रखी थी और मछली के आकार के चांदी के झुमके।

‘मैं उस तरह नहीं सोचती, गोपाल,’ उसने कहा।

‘मेरे बारे में?’

‘किसी के भी बारे में। और मुझे तुम्हारा साथ अच्छा लगता है। तुम्हें?’

‘मुझे भी। लेकिन अब मैं जा रहा हूं। अगर हमारे बीच कमिटमेंट हो तो क्या अच्छा नहीं होगा?’

‘कमिटमेंट? गोपाल, वी आर सो यंग!’ वह हंसी। वह उठकर खड़ी हो गई। ‘आओ, दिये सिराएं। तुम्हारी यात्रा के लिए।’

बात बदलने में लड़कियों से ज्यादा माहिर कोई नहीं होता।

हम सीढ़ियां उतरकर पानी तक गए। उसने पांच रुपए में छह जलते हुए दिये खरीदे। एक मुझे दिया। उसने एक दिया पानी पर तैरता रख दिया। मेरा हाथ थामकर उसने कहा, ‘आओ, मिलकर प्रार्थना करें, कामयाबी के लिए।’

‘कोटा में तुम्हें वो सब मिले जो तुम चाहते हो,’ आंखें मूंदे हुए उसने कहा।

मैंने उसकी तरफ देखा। मैं जो चाहता हूं वह वहां कोटा में नहीं है। वह मैं यहां बनारस में छोड़कर जा रहा हूं..।
 
 
 
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