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प्रेम की कविता

 
Source: आस्तीक वाजपेयी   |   Last Updated 12:11(18/07/11)
 
 
 
 
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कविता


प्रेम की कविता

मैं जब सब भूल जाता हूं
तब भी कुछ बच जाता है।
हार से अधिक
वे वाक्य बच जाते हैं जो
तुमसे कभी कह नहीं पाया,
या शायद ख़ुद से नहीं कह पाया।

हर परछाई में मैं ख़ुद को
तुमसे छिपा लेता हूं।
और छिपने से ख़ुद में छिप जाता हूं
वहां जहां रोशनी की जगह
मेरी उम्मीद आती है लालटेन पकड़ कर

शायद प्रेम वह जगह है यहां
हमारी विफलताएं आती हैं सुस्ताने,
फिर से भाग जाने, और बच जाते हैं
हम फिर एक दूसरे से स्वप्न में
मिल जाने।



आईना

स्तब्ध हो जाने की अपेक्षा से निरपेक्ष
मैं समुद्र को देखना चाहता हूं।

क्या कुछ ऐसा भी दिख सकता है
जो किसी और का
आईना न हो।

जिन पेड़ों पर विश्राम करते हुए
हवा बह रही है, उन पर भी तो
किसी स्वप्न की बेचैनी लिपटी होगी।

एक गिरगिट जो आईने के परे
पेड़ को देख आईने पर चढ़ने की
कोशिश कर रहा है,
वह दूसरों के आईने में
अपने आईने को देख रहा है।

पीले गुलाब के कठोर गमले
पेड़ों की तरह लगते हैं।
कोई सुनेगा भी क्यों
जब जिसके लिए आईना ढूंढ रहा हूं,
वह तो आईने में ही दिखेगा।

और जब दिखेगा तो खो जाएगा
एक दूसरे गिरगिट
और पेड़ के बीच आ जाएगा।
 
 
 
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