घबराहट के मारे प्रिंसिपल साहब के माथे पर पसीना चुहचुहा आया था। रिसेप्शनिस्ट प्रश्नवाचक चिह्न चेहरे पर चिपकाए सामने खड़ी थी, ‘सर क्या जवाब दूं उनको? वे बड़े उग्र हो रहे हैं।’ कोई और समय होता तो वे सामने पड़ी फाइल दे मारते उस पर मगर अभी तो इस भवसागर से उन्हें पार लगाने वाली वह ही थी। उसकी मधुर वाणी ही उन्हें पालकों के कोप से बचा सकती थी।
आवाज संयत करके वे बोले, ‘मिस आनंद, आप उनसे कहिए कि सर अभी मीटिंग में हैं, जैसे ही फुरसत होगी, सबसे पहले आपसे ही बात करेंगे।’ उसने गरदन हिला दी थी। हालांकि पिछले दो घंटे में वह चौथी बार पालक संघ के अध्यक्ष को यह जवाब देने जा रही थी, वह खामोशी से बाहर निकाल गई। प्रिंसिपल साहब सर हाथ में थामे अचानक आई इस विपदा के बारे में सोचने लगे।
‘भुवन सिन्हा को इस स्कूल में आए एक महीना हो गया था। अब तक तो सब ठीक ठाक था. फिर आज अचानक यह बवंडर?’ उन्होंने पास रखी घंटी पर हाथ दे मारा। चपरासी अविलंब हाजिर था. आज किसी भी तरह की अवज्ञा करके कोई भी अपनी जान सांसत में नहीं डालना चाहता था. ‘भुवन सिन्हा को तुरंत बुलाओ.’ जी सर वह पलट गया था।
‘क्या मैं अंदर प्रवेश कर सकता हूं श्रीमान? ‘कोई और समय होता तो इतनी शुद्ध हिंदी सुनकर उनके अधरों पर मुस्कान अवश्य आ जाती मगर आज.. ‘आइए प्लीज, बैठिए..’ आवाज में कठोरता कायम थी। ‘मिस्टर भुवन, कल-परसों किसी कक्षा में कोई दिक्कत हुई?’
नहीं श्रीमान! विनम्र उत्तर था।
‘किसी बच्चे को डांटा-फटकारा?’
‘प्रश्न ही पैदा नहीं होता श्रीमान।’
‘किसी बच्चे को मारा तो नहीं?’
‘आपको तो पता ही है, मैं हिंसा का पूर्ण विरोधी हूं। उस पर बच्चे तो देवता समान होते हैं..’
‘बस-बस अब शुरू मत हो जाइए . जब आपके अनुसार सब कुछ ठीक ठाक है तो सुबह से पालक संघ से फोन क्यों आ रहे हैं? कहीं कुछ तो हुआ है.
कहीं पेपर वगैरह तो लीक.’
‘राम-राम-राम श्रीमान. ऐसा तो मैं सपने में भी नहीं सोच सकता.’
‘ठीक है. तो मुझे उनसे बातचीत करनी ही पड़ेगी. पता नहीं ऐसा क्या हुआ है जो बात पालक संघ तक पहुंच गई है। जानते हैं, संघ के अध्यक्ष हमारे स्कूल के चेयरमेन के खास हैं.’ प्रिंसिपल ने खास शब्द को मानो चबा डाला था। ‘आप परेशान न हों श्रीमान, मेरा पक्ष बिल्कुल उजला है. अवश्य ही कोई गलतफहमी है, जो मिलकर दूर हो जाएगी’.भुवन सिन्हा ने उन्हें सांत्वना देते हुए कहा था।
‘ठीक है. आप जाइए. मैं देखता हूं .’ भुवन सिन्हा के जाते ही उन्होंने रिसेप्शनिस्ट से कहा, ‘जरा पालक संघ के अध्यक्ष को फोन लगाइए.’ ‘हेल्लो, मैं वंडर बेल्स स्कूल से प्रिंसिपल..’
‘क्यों प्रिंसिपल साहब, आज तो हमारा फोन लेने में भी आपको तकलीफ हो रही है? कितनी बार लगा चुका हूं मैं.’ अध्यक्ष ने उनकी बात काटते हुए कड़वे से लहजे में कहा। ‘नहीं, नहीं. स्टाफ मीटिंग चल रही थी, कहिए .’
‘हां, तो सुनिए मेरे पास कक्षा 6, 7 और 8 के पालकों की भीड़ लगी है. कैसे-कैसे टीचर रखे हैं आपने, जो हमारे बच्चों को न जाने क्या उल्टी-सीधी पट्टी पढ़ा रहे हैं. हमारे बच्चे हमारी ही जान के दुश्मन बने पड़े हैं. कौन है ये भुवन सिन्हा?’ अपमानजनक लहजा बड़ी मुश्किल से पचाकर, संयत होकर प्रिंसिपल साहब बोले. ‘आखिर हुआ क्या है, कुछ तो बताए?
मैं भुवन को समझा दूंगा.’
‘अब फोन पर कुछ नहीं जी, मीटिंग बुलवाइए. बोर्ड की हम सब भी आते हैं, वहीं दूध का दूध और पानी का पानी होगा.।’ मरता क्या न करता, प्रिंसिपल साहब को बोर्ड मीटिंग बुलानी पड़ी। वे भुवन जैसे योग्य युवक को पालकों के शब्द बाणों का ग्रास नहीं बनाने देना चाहते थे., मगर बोर्ड मीटिंग यानी आमना-सामना.
भुवन सिन्हा ने इंटरव्यू के दिन ही उन पर गहरी छाप छोड़ी थी। विशुद्ध भारतीयता के रंग में रंगा युवक जिसने एमएससी करने के बाद राष्ट्रभाषा प्रेम के चलते हिंदी में डिग्री ली, हिंदी पर अधिकार उच्च कोटि का था, उस पर उसकी शिक्षण शैली के तो बच्चे दीवाने थे।
उसकी कक्षा देखने के बाद उन्हें लगा था कि बच्चों की बागडोर सही हाथों में पहुंच चुकी है। तनाव को कम करने के लिए उन्होंने एक गिलास पानी गटका और राउंड पर निकल पड़े। बाकी कक्षाएं जहां पारंपरिक शांति धारण किए थी, भुवन की कक्षा सजीव और चैतन्य थी. बच्चे मजे से प्रश्नोत्तरी में हिस्सा ले रहे थे, उत्साह उनकी रग-रग से फूटा पड़ रहा था। ‘हे ईश्वर, इस रौनक को कायम रखना’ वे बुदबुदाए थे।
दो दिनों बाद बोर्ड मीटिंग आयोजित हुई। पालक बड़ी आक्रामक मुद्रा में थे, बोर्ड के सदस्य उहापोह में, प्रिंसिपल साहब बार-बार पहलू बदल रहे थे. मगर . भुवन सिन्हा के चेहरे पर निश्छल सी शांति थी.। कार्यवाही शुरू हुई। पालक संघ के अध्यक्ष खड़े हुए।
उनके हाथों में शिकायतों का पुलिंदा थी। उन्होंने कहना शुरू किया, ‘सभी पालकों की शिकायत है कि भुवन सिन्हा बच्चों को उलटी-सीधी पट्टी पढ़ा रहे हैं.’‘अपनी बात जरा स्पष्ट रूप से कहें’ चेयरमेन ने कहा। ‘हम सभी एक-एक करके बताते हैं .
भुवन सर बच्चों से कहते हैं कि अंग्रेजी से पहले अपनी हिंदी सुधारो क्योंकि अंग्रेजी तो विदेशी भाषा है, वो आपकी मातृभाषा नहीं बन सकती यहां हम इतना रुपया खर्च करके बच्चों को इसलिए नहीं भेजते कि बच्चे अंग्रेजी की बजाय हिंदी बोलना सीखें’ ‘और तो और, ये बच्चों से कहते हैं कि इस देश में पढ़कर विदेश में नौकरी करना धरती मां का अपमान है. माय फुट, इतनी महंगी पढ़ाई के खर्चे का भुगतान इसका बाप करेगा क्या?’
‘कृपया शब्दों पर नियंत्रण रखें.’ चेयर में भी अनायास हिंदी भाषी हो चले थे।
‘ठीक है, और हां. वेल्यूज के नाम पर जाने कैसी-कैसी बेहूदी बातें सिखा रहे हैं. शाम को दीपक जलाओ, सूर्य को नमस्कार करो, गायत्री मंत्र और न जाने क्या-क्या. बच्चे गुड मोर्निग और गुड इवेनिंग की जगह नमस्ते कहने लगे हैं. आते-जाते लोगों के पैर छूने लगे हैं. भरी पार्टी में शर्मिदा कर देते हैं.।’
‘अरे ये तो कुछ नहीं, मेरी सुनिए’ कांट्रेक्टर साहब उठ खड़े हुए. ‘मेरा बेटा मुझसे प्रश्न करता है कि पापा आप जो पैसे कमाते हो, वो काली कमाई का तो नहीं. व्हाट रबिश. अब ये हमें सिखाएगा ईमानदारी का पाठ?’ ‘हां और इनके कहने पर बच्चे छुट्टी के दिन कॉलोनी में घर-घर घूमते हैं, पोलीथीन बिनवाते हैं, लोगों को सफाई का लेक्चर देते हैं. क्या हमारे बच्चों के पास यही काम रह गया है?’ प्रिंसिपल साहब को असल बात समझ में आ गए थे। भुवन का देशप्रेम उसकी नौकरी खाने वाला था। उन्होंने माथा पकड़ लिया था।
‘देखिए चेयरमेन जी, हमने इस स्कूल में रुपया इसलिए लगाया था कि हमारे बच्चे वेस्टर्न कल्चर सीखें। हम ये बेहूदगी हरगिज बर्दाश्त नहीं करेंगे’ पालक समवेत स्वर में चिल्लाए थे। ‘भुवन सिन्हाजी, आपको कुछ कहना है?’ प्रिंसिपल ने गेंद भुवन के पाले में उछाल दी थी।
भुवन, जो बड़ी तटस्थता से सारी बातें सुन रहा था, उठ खड़ा हुआ। हाथ जोड़कर सभी को प्रणाम करके बोला, ‘आप लोगों ने जो कुछ कहा, बिल्कुल सच है। मैंने बच्चों से यह सब कहा है क्योंकि यह अंग्रेजी का विद्यालय नहीं है, वरन भारत में चलाने वाला एक अंग्रेजी माध्यम का स्कूल है। भाषा शिक्षक होने के नाते बच्चों में अपनी भाषा के प्रति प्रेम जगाना और उन्हें संस्कार, संस्कृति, देशप्रेम और पर्यावरण प्रेम का पाठ पढ़ाना मेरा दायित्व है और मैं उसे ही निभा रहा हूं. पर मैं पूछता हूं कि मैं तो केवल एक क्लास में जाता हूं बाकी छह क्लास तो अंग्रेजी के अध्यापकों के हैं.
फिर उनकी बातों का कोई असर.?’
‘पता नहीं क्या जादू-टोना किया है आपने. बच्चे पागल है आपके पीछे.’ पालक अब हथकंडों पर उतर आए थे। ‘ठीक है, हमने दोनों के पक्ष सुन लिए हैं। हम चर्चा करके किसी हल पर पहुंचते हैं’ चेयरमेन ने मीटिंग बर्खास्त कर दी. मगर जाते-जाते पालक धमकी दे गए कि यदि यह सब बंद न हुआ तो अच्छा नहीं होगा। ‘प्रिसिपल साहब, आप इन्हें समझाइए और मुझे इंफोर्म कीजिए.’ तल्ख लहजे में अपनी बात कहकर चेयरमेन साहब अपने सहयोगियों के साथ निकल गए।
‘भुवन, क्या वक्त को देखकर तुम बदल..’ ‘नहीं सर, पिताजी के सामने वचन लिया था कि अपने पेशे से गद्दारी नहीं करूंगा। यदि शिक्षक होकर बच्चों में जागृति न ला पाया तो लानत है ऐसी नौकरी पर. मैं परिणाम भोगने के लिए तैयार हूं.’ भुवन के स्वर में दृढ़ता थी।
पंद्रह अगस्त को ध्वजारोहण हुआ। शहर के सांसद कार्यक्रम में भाषण दे रहे थे ‘शिक्षकों का कर्तव्य है कि बच्चों में देशप्रेम जगाए, उन्हें देश की समस्याओं के प्रति जागरूक बनाएं, ब्रेन-ड्रेन रोकंे.. आज के बच्चे ही कल के नागरिक हैं आखिर.’वहां प्रिंसिपल के ऑफिस में भुवन सिन्हा अपने ‘निष्कासन आदेश’ पर हस्ताक्षर कर रहे थे।
‘जाओ मेरे बच्चे, आज नहीं तो कल, तुम्हें पहचान अवश्य मिलेगी.’ प्रिंसिपल साहब की आवाज भीग गई थी। भुवन उनके पैर छूकर बाहर की ओर चल पड़ा। भाषण समाप्त हो चुका था। लाउडस्पीकर पर गीत बज रहा था..
‘इंसाफ की डगर पे, बच्चो दिखाओ चल के, ये देश है तुम्हारा, नेता तुम्हीं हो कल के .।’