जन्म तिथि पर विशेष :धरोहर हैं मुंशी प्रेमचंद की कहानियां
Source: Bhaskar | Last Updated 00:09(31/07/11)
कुछ चीजें कभी पुरानी नहीं पड़तीं। वे एक के बाद एक कालखंडों में अपनी प्रासंगिकता कायम रखकर कालजयी और शास्त्रीय होने का दर्जा हासिल कर लेती हैं। ऐसी ही हैं मुंशी प्रेमचंद की रचनाएं। वे आज भी इतनी मौजूं हैं कि हर आयु, वर्ग, परिवेश के लोग अपने को उनके साथ जोड़ सकते हैं, उनसे सीख ले सकते हैं। हिंदी की अलग-अलग पीढ़ी के कथाकार यहां बता रहे हैं कि प्रेमचंद की कौन-सी कहानी उन्हें सबसे प्रिय है और क्यों?
प्रस्तुति : पूजा सिंह।
उन्होंने विषमता को कलंक के रूप में उभारा: असगर वजाहत
प्रेमचंद की कहानियों से मेरा परिचय छात्र जीवन में हुआ था। स्कूल से निकलकर जब मैं विश्वविद्यालय पहुंचा तो उनकी कहानियों को पढ़ने का अवसर मिला। मैंने हिंदी में उनकी कहानियां पढ़ीं उसके बाद उर्दू में भी। उस समय उन्होंने अपनी रचनाओं में आम आदमी को किरदार बनाया। उनकी कुछ कहानियां जैसे कफन, बड़े भाई साहब, पूस की रात आदि समाज के यथार्थ की परतें उधेड़ती हैं।
साथ ही उनकी कई कहानियां मानवीय सबंधों और जटिलताओं को सामने लाती हैं। कफन कहानी बहुत महत्वपूर्ण और महान कहानी है। यह हमारे समाज, गांव, स्त्री, पुरुष के यथार्थ को बताती है। उन्होंने जीवन के सभी पक्षों पर लिखा और किसी पक्ष को छोड़ा नहीं। उनकी एक बहुत अच्छी पंक्ति है- किसानों से अच्छी हालत उन लोगों की थी जो किसानों की कमजोरियों से लाभ उठाना जानते थे।
प्रिय कहानी>कफन
क्यों?
यह महत्वपूर्ण और महान कहानी है, जो हमारे समाज, गांव, स्त्री, पुरुष के यथार्थ को बताती है।
अच्छे और बुरे का फर्क हमें बताते हैं प्रेमचंद : ममता कालिया
मैंने अपने जीवन में सबसे पहली कहानी ‘ईदगाह’ पढ़ी थी जो प्रेमचंद की थी। अभी पिछले साल मेरे पोते ने, जो 9 साल का था, मुझे फोन किया और कहा कि दादी मैंने अपनी क्लास में ईदगाह कहानी पढ़ी और मैं भी आपके लिए चिमटा लाऊंगा। ये प्रेमचंद ही हैं जो नौ साल के बच्चे के कोमल मन पर कुछ इस तरह से प्रभाव डालते हैं कि बच्चा अच्छे और बुरे में फर्क करना सीख जाता है।
ऐसे साहित्यकार शायद विरले ही हैं। प्रेमचंद बहुत ही सरल व सहज, जीवन से जुड़े हुए लेखक हैं। मुझे प्रेमचंद की वैसे तो सभी कहानियां बेहद पसंद हैं लेकिन उनमें ‘सवा सेर गेहूं’ बहुत महत्वपूर्ण और अच्छी लगती है। क्योंकि मुझे ऐसा लगता है कि आज के समय में बच्चे चाहे कार हो या घर हो, झटपट लोन लेकर खरीद लेते हैं।
जब उसकी किस्त चुकाने की बारी आती है तब मुझे बिल्कुल यही कहानी याद आती है। महाजनी सभ्यता के चलते सवा सेर गेहूं सात साल में सात मन हो जाता है। कंपनियां चक्रवृद्घि ब्याज लगा देती हैं। हम जो दो लाख की गाड़ी खरीदते हैं वो चार लाख की पड़ जाती है।
लोग समझते नहीं और हर साल-दो साल में उसे बदलना भी चाहते हैं। और जब तक हम वह ऋण चुकाते हैं तब तक खासा अच्छा समय बीत चुका होता है और वह गाड़ी और घर भी काफी पुराना हो चुका होता है।
कह सकते हैं कि उस ऋण से कभी मुक्ति ही नहीं मिल पाती। यह कहानी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी तब थी जब वह लिखी गई थी। मुझे आज की सभी विदेशी कंपनियां उसी साहूकार कि तरह लगती हैं जिसने सवा सेर गेहूं दिया था। इन्हें देखकर मुझे प्रेमचंद बहुत याद आते हैं।
प्रिय कहानी > सवा सेर गेहूं
क्यों?
आज घर हो या कार, बच्चे लोन पर खरीद लेते हैं। उन्हें किस्त चुकाते देखकर मुझे बरबस यह कहानी याद आती है।
प्रेमचंद के रचित आदर्श समाज में कहां हैं: मृदुला गर्ग
प्रेमचंद की ईदगाह, नमक का दरोगा, कफन, पूस की रात आदि कहानियां दिल के बेहद करीब हैं। उनकी भाषा बेहद सरल और सहज होती है। उनकी कई बातें यथार्थ से दूर और आदर्शवाद के करीब थीं। जिन आदर्शो की वह बात करते थे, वे आदर्श समाज में कहीं दिखाई नहीं दिए। एक उदाहरण देती हूं। उनकी कहानियों में गांव दिखता था लेकिन गांव की भाष खड़ी बोली ही रहती थी।
उनकी कहानियों में मेरी पसंदीदा कहानी ‘पूस की रात’ है। ‘कफन’ भी मुझे बेहद पसंद हैं। कफन कहानी हमारे पुरुष सत्तात्मक समाज की गहरी पड़ताल करती है। अगर पत्नी की तबीयत खराब है तो उसकी मां, बहन, भाभी या किसी करीबी महिला को बुला लेते हैं। महिला का पति खुद को उससे दूर ही रखता है। यह कैसा संबंध है? प्रेमचंद की रचनाएं आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी लिखे जाने के समय थीं।
प्रिय कहानी > कफन/पूस की रात
क्यों?
कफन कहानी हमारे पुरुष सत्तात्मक समाज की गहरी पड़ताल करती है। ये आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं।
उनकी कहानियों में भारतीय समाज की आत्मा है: अखिलेश
प्रेमचंद की कहानियों से मेरा परिचय प्राथमिक शिक्षा के दौर में ही हो गया था। उनकी सभी कहानियां में अच्छा-बुरा नहीं, बल्कि उनमें हमारे भारतीय समाज की आत्मा दिखाई पड़ती है। एक अलग जीवन प्रकट होता है। अगर मुझे किसी एक कहानी के बारे में बताना पड़े तो ‘कफन’ मुझे बेहद पसंद है।
गांव के समाज का बेहद व्यापक और गहन चित्रण उन्होंने अपने कथा चरित्रों के जरिए किया है। भारतीय समाज तथा मनुष्यों के मन का पूरा कोलाहल या कहें उस दौर का जो घमासान था, वह उनके रचना संसार में प्रकट होता है। ये बातें उन्हें अपने समकालीन लेखकों से अलग करती हैं। गहरी अंतर्दृष्टि के जरिए वे सामाजिक व्यवस्था को चित्रित करने में सिद्धहस्त थे। हिंदी साहित्य में किसी और लेखक के पास ऐसी सोच नहीं है।
प्रिय कहानी > कफन
क्यों?
यह बताती है कि किसी मनुष्य का इतना शोषण और उत्पीड़न हो सकता कि उसका अपने श्रम से ही विश्वास खत्म हो जाए।
वे हमसे हमारी भाषा में हमारी बात करते हैं: गौरव सोलंकी
प्रेमचंद की कहानियों से मेरा सामना बहुत कम उम्र में हुआ, 8-9 साल की उम्र में। उनकी कहानियों में इतनी सरलता है कि हर उम्र के आदमी को उनमें एक-सी दिलचस्पी होगी। दो बैलों की कथा मुझे बहुत प्यारी लगती है।
आज भी मूक पशुओं कुत्तों, बिल्लियों पर बहुत कम कहानियां मिलेंगी। वे सिर्फ कार्टून नेटवर्क पर ही नजर आते हैं। प्रेमचंद वही भाव इन कहानियों में लेकर आए, जो बच्चों के भी उतने ही थे जितने बड़ों के।
उनका उपन्यास कर्मभूमि भी मुझे बहुत पसंद है। उन्होंने भूखे सो रहे किसान, गबन कर रहे बाबू, अमीर जमींदार और पतित मानी जाने वाली स्त्रियों पर एक-सी कुशलता से लिखो। उन्होंने बहुत और विविधतापूर्ण लिखा है। उनका लिखा अनपढ़ और विद्वान, दोनों एक ही तरह समझ सकते हैं।
प्रिय कहानी > दो बैलों की कथा
क्यों?
मूक पशुओं कुत्तों, बिल्लियों पर आज भी बहुत कम कहानियां मिलती हैं। वे सिर्फ कार्टून नेटवर्क पर ही नजर आते हैं।