शेक्सपियर ने कहा है कि दुनिया एक स्टेज है जहां हर कोई अपना किरदार निभाता है। मेरी कोशिश यही होती है कि काम में हमेशा अपनी तरफ से सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने की कोशिश करूं, बाकी चीजें तो अपने बस में नहीं होतीं।
कॅरियर से जुड़े अफसोस की बात करूं तो लगता है कि मुझे ‘स्लमडॉग मिलियनेयर’ फिल्म का ऑफर नहीं ठुकराना चाहिए था। वह गलत फैसला साबित हुआ। मुझे फिल्म में वह भूमिका दी
जा रही थी जिसे बाद में इरफान खान ने निभाया।
उस समय मुझे वो किरदार कुछ जमा नहीं और मैं ऑस्कर विजेता फिल्म का हिस्सा बनने से रह गया। खैर, जब आप ऐसे प्रोफेशन में होते हैं तो हमें तत्काल निर्णय लेने पड़ते हैं जो कई बार सही तो कभी गलत भी साबित हो जाते हैं।
हमारा परिवार पार्टीशन के दौर में रावलपिंडी से नई दिल्ली आया था। वह इतनी अफरातफरी का दौर था कि मेरे परिवार में किसी को मेरा जन्म दिन तक याद नहीं रहा। बचपन में यह बात मुझे इतनी खलती थी कि बस पूछिए मत। मेरे सारे दोस्त अपने जन्मदिन पर पार्टी करते लेकिन मेरा तो अपना कोई जन्म दिन था ही नहीं।
मैं इस बात का गुस्सा अपनी मां पर निकालता और उनसे कहता कि वे मुझे बिलकुल ह्रश्वयार नहीं करतीं। हमारे बचपन के दिन मुफलिसी में जरूर कटे लेकिन जिंदादिली में कहीं कोई कमी नहीं थी। अदाकारी मेरे खून में है।
मैं स्कूल के दिनों से ही नाटकों में हिस्सा लेने लगा था। मेरे पिताजी भी रामलीला में पार्टटाइम एक्टिंग किया करते थे। कॉलेज के बाद मेरा यही शौक मुझे मुंबई खींच लाया।
जीवन का असली संघर्ष मैंने यहीं देखा। मेरा अपना कोई स्थायी पता तक नहीं था, रोज मेरा ठिकाना बदलता रहता। कई बार तो मुझे भूखा सोना पड़ता या फिर मैं किसी दोस्त के यहां महज इसलिए चला जाता
कि वह मुझे खाना खिला देगा। रोशन तनेजा के एक्टिंग स्कूल में मैं, संजय दत्त और अनिल कपूर बैचमेट थे। बाद में मुझे वहीं काम मिल गया और मेरी पहली सैलरी के रूप में मिला 4000 रुपए का चेक।
जिंदगी में एक गम यह भी है कि ह्रश्वयार के मामले में मैं भाग्यशाली नहीं रहा। मैंने दो दफा शादी की लेकिन दोनों ही बार असफलता हाथ लगी। अब जाकर सोचता हूं तो मुझे ऐसा लगता है मानो मेरी महत्वाकांक्षाएं ही मेरे सुखद वैवाहिक जीवन की राह का रोड़ा बन गईं। (जैसा पूजा सिंह को बताया)