एक मां को अपने नवजात को देखने की कितनी उत्सुकता होती है, वैसी ही उत्सुकता अरुणिमा को भी हो रही थी। लेकिन नर्स ने जैसे ही उसकी गोद में बच्चा रखा उसका दिल धक से रह गया। भगवान ने ये कैसी क्रूरता दिखाई थी, बच्चे के कान ही नहीं थे। खैर, उसने और उसके पति ने इसे नियति मान कर स्वीकार कर लिया। समय बीतता गया।
यह पता चला कि बच्चा सुन तो सकता है लेकिन उसके कान का बाहरी हिस्सा नहीं हैं। बच्चा पढ़ाई-लिखाई में बहुत तेज था फिर भी लोग उसका बहुत मजाक उड़ाते थे। वह परेशान रहता। पिता अपने बेटे के साथ चिकित्सकों के चक्कर काटता। आखिर एक दिन मेहनत रंग लाई एक चिकित्सक ने कहा कि इस समस्या का हल है।
उसने कहा अगर कोई अपने कान देता है तो मैं उन्हें आपके बेटे के कानों की जगह लगा दूंगा। तलाश आरंभ हुई। आखिर कई महीनों के बाद पिता ने बेटे से कहा कि वह अस्पताल चलने के लिए तैयार हो जाए। उसे कान देने वाला मिल गया है। ऑपरेशन सफल रहा।
बच्चे के कान लग गए अब उसकी खूबसूरती परिपूर्ण हो गई। वह अक्सर अपने पिता से पूछता कि वह कौन है जिसने उसका जीवन बदल दिया। लेकिन पिता कहते कि दान देने वाले की शर्त है कि उसे यह बात न बताई जाए। वक्त बीतता गया।
बेटा बहुत बड़ा वैज्ञानिक बन गया। बुढ़ापे ने उसकी मां छीन ली और पिता भी मृत्युशैया पर था। पिता ने एक दिन बेटे से कहा कि अब मैं भी एक दिन गुजर जाऊंगा तो तुम्हारे मन में यह सवाल हमेशा बना रहेगा कि तुम्हें कान किसने दिए? बेटा ये तुम्हारी मां अरुणिमा के कान हैं। उसके घने बालों के कारण तुम कभी जान ही नहीं पाए कि उसके कान नहीं है। बेटे की आंख से आंसू बह चले।
सबक
वास्तविक सौंदर्य शारीरिक नहीं बल्कि आंतरिक होता है। असली प्रेम वह नहीं होता जो करके जताया जाता है, बल्कि वह होता है जिस कर दिया जाए लेकिन कभी उसका जिक्र तक न हो।