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जब आंखों ने पहली बार देखा

 
Source: bhaskar   |   Last Updated 00:10(03/07/11)
 
 
 
 
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बंहुत पुरानी बात है। एक बुजुर्ग सज्जन अपने जवान बेटे के साथ रेल में यात्रा कर रहे थे। पिता-पुत्र अपनी गतिविधियों के कारण अन्य यात्रियों के आकर्षण और कुतूहल का केंद्र बने हुए थे। ट्रेन स्टेशन से रवाना होने ही वाली थी।

जवान बेटा खिड़की के पास बैठा था और बहुत खुश दिखाई दे रहा था। उसका उल्लास और उत्सुकता छिपाए नहीं छिप रही थी। दूसरे यात्री अपनी-अपनी सीट पर आराम से बैठे थे।

जैसे ही ट्रेन चली, लड़के ने अपना हाथ बाहर निकाला और सरसराती हुई हवा को अपने हाथों पर महसूस करने लगा। वह खुशी से चिल्लाया, ‘पिताजी देखिए कैसे तेजी से ये सारे पेड़ पीछे की ओर भाग रहे हैं।’ बुजुर्ग मुस्कराए और अपने बेटे की भावनाओं को समझते हुए उन्होंने स्वीकृति में सिर हिलाया।

उनके सामने बैठे एक दंपती लगातार पिता-पुत्र की बातचीत और गतिविधियां देख रहे थे। उन्हें यह देखकर अचरज हो रहा था कि 25 वर्ष का एक युवा किस तरह बच्चों जैसा बरताव कर रहा है।

अचानक वह युवक फिर चिल्लाया, ‘पिताजी, देखिए, तालाब और जानवर और बादल सारे के सारे ट्रेन के साथ पीछे भाग रहे हैं।’ अचानक बारिश शुरू हो गई और पानी की कुछ बूंदें युवक के हाथ पर गिरीं। वह खुशी में बावरा होता हुआ एक बार फिर ऊंची आवाज में बोला, ‘देखिए न पिताजी, बारिश की बूंदों ने मेरे हाथों को छुआ।’ अब आखिर दंपती से बरदाश्त नहीं हुआ।

उन्होंने बुजुर्ग से पूछा, आपका बेटा कैसी अजीबोगरीब हरकतें कर रहा है, आप अस्पताल ले जाकर इसका इलाज क्यों नहीं कराते? बुजुर्ग ने कहा, ‘हम अस्पताल से ही आ रहे हैं। मेरा बेटा जन्म से अंधा था, आज ही उसे आंखें मिली हैं।’ अब बारी दंपती की थी। उन्होंने शर्म से सिर झुका लिया।
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
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