नेताओं से यह नफरत हमें कहां ले जाएगी?
Source: संजीव क्षितिज | Last Updated 04:15(14/09/11)
पिछले महीने देश में जो उभार और आंदोलन देखा गया, उसमें एक बात ने कई लोगों को चिंतित कर दिया और वह थी राजनीतिज्ञों के प्रति घृणा की भावना। मंचों से दिए गए कुछ भाषणों में उनके लिए जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया, वही भावना आंदोलनकारियों की भीड़ में कुछ नारों और प्लेकार्ड में दिखाई दी। क्या यह आंदोलन के प्रवाह में गुस्से की तात्कालिक और क्षणिक अभिव्यक्ति थी? या हम, खासकर भारतीय मध्यवर्ग के लोग, अपने राजनीतिज्ञों के प्रति वितृष्णा की भावना से ग्रस्त हैं?
उत्तर जो भी हो, यह चिंताजनक इसलिए है कि हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र हैं और सारी कमियों के बावजूद सफल लोकतंत्र हैं। जनता के द्वारा चुने हुए प्रतिनिधि राजकाज चलाते हैं और राज्य व्यवस्था के संचालन का इससे बेहतर तरीका फिलहाल दूसरा नहीं है। ऐसे में अपने राजनीतिज्ञों के प्रति घृणा या वितृष्णा का क्या अर्थ है?
हम यह तो कर सकते हैं कि अगली बार चुनाव आने पर उन्हें बदल दें और नए जनप्रतिनिधि चुन लें। लेकिन हमने जिन्हें चुना है, जब तक वे हैं, उन्हें स्वीकार करना ही होगा। उनके प्रति घृणा की भावना खतरनाक है क्योंकि इससे लोकतंत्र कमजोर ही होगा।
राजनीतिज्ञों के प्रति घृणा के पीछे कई कारण समझे जा सकते हैं:
1एक के बाद एक घोटालों और उनके विस्मयकारी हदों तक बढ़ते आकार ने लोगों में गुस्से की लहर पैदा की है। घोटालेबाजों के खिलाफ समय से समुचित कार्रवाई न होने से भी गुस्सा बढ़ा। धैर्य का बांध तब टूटा जब लोगों ने देखा कि राजनीतिक जमात के भीतर घोटालों के खिलाफ उतनी गंभीरता नहीं है, जितना खुद लोगों के भीतर गुस्सा है।
टीवी चैनलों की बहसों में राजनीतिक दलों के प्रवक्ता जब एक दूसरे को दोषी और अपनी पार्टी को दूसरों से बेहतर दिखाने की कोशिश करते हैं, तब लोगों का आक्रोश सभी राजनीतिक दलों के खिलाफ केंद्रित हो जाता है।
सत्तालोलुप और आत्मकेंद्रित राजनीतिज्ञों की बहुतायत ने भी मौजूदा राजनीति के प्रति लोगों की घृणा को तीव्र किया है। राजनीति जितनी तेजी से और संपूर्ण रूप से सत्ता केंद्रित होती गई है, उतना ही राजनीतिज्ञ जनता से कटते गए।
राजनीति पर कुछ सौ या हजार परिवारों के काबिज होने से आम लोगों की भागीदारी उसमें नहीं बची। नतीजा यह हुआ कि पहले लोग राजनीति के प्रति उदासीन हुए, जो मतदान में मध्यवर्ग की कम भागीदारी में सामने आया, फिर इस राजनीति के प्रति उनके मन में वितृष्णा जगह बनाने लगी।
सत्ताधारी दलों और विपक्षी दलों का विभाजन खत्म हो गया है, हर पार्टी कहीं सत्ता में और कहीं विपक्ष में है और सभी के आचरण में ज्यादा फर्क नहीं है, इसलिए समूची राजनीतिक जमात के प्रति आक्रोश घर करने लगा।
व्यवस्था की कमियों को दूर करने के लिए जरूरी सुधारों पर कमोबेश हरेक पार्टी की सरकारें जिस तरह टालमटोल करती दिखाई दीं, उसने भी गुस्से में इजाफा किया।
वितृष्णा का एक कारण सकारात्मक भी है। वह है नए और महत्वाकांक्षी भारत का उदय। यह युवा भारत दुनिया में अपनी गौरवशाली जगह बनाने के लिए बेताब है। जब वह देखता है कि मौजूदा राजनीति से घोटाले ही निकलकर आ रहे हैं और व्यवस्था में सुधार की कोई गंभीर कोशिश नहीं है तो उसकी गर्व की भावना आहत होती है। राजनीतिज्ञों के प्रति गुस्से में यह मांग भी निहित है कि राजनीति, राजनीतिक दल और व्यवस्था आज के युवा और महत्वाकांक्षी भारत के अनुरूप अपने को बदले।
राजनीति का कोई विकल्प नहीं है। हमारे जैसे स्वतंत्र और लोकतांत्रिक समाज में राजनीतिज्ञों की जरूरी और अहम भूमिका है। राज्य व्यवस्था के संचालन के लिए तो हमें उनकी जरूरत है ही। इसके अलावा भी कई काम सिर्फ वे ही कर सकते हैं। इसलिए राजनीतिज्ञों के प्रति नागरिकों के बड़े हिस्से में व्याप्त मौजूदा भावना राजनीति को बेहतर बनाने का अवसर होनी चाहिए, न कि राजनीतिज्ञों पर इल्जाम लगाने और उन्हें लांछित करने का।
लोकसत्ता आंदोलन के राष्ट्रीय समन्वयक जयप्रकाश नारायण कहते हैं, ‘राजनीतिज्ञों को समाज का कैंसर करार देने की उतावली और असंयमित आलोचना निरंकुशता को न्यौता देगी। यह फिजूल है कि राजनीति में सभी शैतान हैं और राजनीति से बाहर सभी फरिश्ते। सभी राजनीतिज्ञों को एक झाड़ू से बुहारकर राजनीति के भीतर अच्छे लोगों को कमजोर करेंगे, जबकि जरूरत उन्हें मजबूत करने की है।’
दिक्कत यह है कि राजनीति को बेहतर बनाने के लिए जिन सुधारों की जरूरत है, उन्हें भी राजनीतिज्ञों के माध्यम से ही अंजाम दिया जा सकता है। राइट टू रिकॉल चाहिए, तो यह कानून भी संसद में राजनीतिज्ञों के हाथों ही बनेगा। वे ऐसा कोई भी सुधार क्यों होने देंगे जिससे खुद उनकी सत्ता पर आंच आए?
यह आज हमारे लोकतंत्र का यक्ष प्रश्न है। इसका जवाब भी घृणा या गुस्से में नहीं है। एक तरीका संवाद ही हो सकता है। दूसरा जनदबाव है। तीसरा यह है कि व्यापक जन-रणनीति बने जो चुनावों में वोट के जरिए विधायिका में सुधारों के समर्थक राजनीतिज्ञों की उपस्थिति बढ़ाए।
पांच जरूरी सुधार
चुनाव के लिए धन: राजनीतिक दलों के चंदा एकत्र करने की मौजूदा व्यवस्था भ्रष्टाचार का उत्स बन गई है। एक सुझाव चुनाव के लिए सरकारी कोष से धन की व्यवस्था करने का है। यह तब तक कारगर नहीं होगा जब तक कि पार्टियों का संचालन भी इतना ही पारदर्शी न हो।
आंतरिक लोकतंत्र: इसके अभाव में पार्टियां नेताओं की जेबी पार्टियां बन गई हैं। पार्टियों के भीतर सदस्यता, पदाधिकारियों के चुनाव और हिसाब-किताब की निष्पक्ष व पारदर्शी व्यवस्था हो।
राइट टू रिजेक्शन: मतपत्र पर ‘इनमें से कोई नहीं’ जोड़कर उस पर बटन दबाने की सुविधा की होनी चाहिए। बहुमत सभी उम्मीदवारों को खारिज कर दे तो उन्हें चुनाव लड़ने से वंचित किया जाए।
राइट टू रिकॉल: लोग अब पांच साल तक इंतजार करने को तैयार नहीं। इसलिए जनप्रतिनिधि से निराश होने की स्थिति में उसे वापस बुलाने का अधिकार जनता को मिलना चाहिए।
सीमित चुनाव लड़ने की स्वतंत्रता: राजनीति गिनती के परिवारों तक सीमित हो रही है। इसे रोकने और नए खून को प्रोत्साहित करने के लिए क्या सीमित संख्या में चुनाव लड़ने की व्यवस्था की जा सकती है?
नफरत आसान प्रेम कठिन
पोलिटिकल साइकोलॉजी पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन बताता है कि नागरिकों में राजनीतिज्ञों से प्रेम करने की बजाय नफरत करने की स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है। राजनीतिज्ञों के प्रति विरोध का भाव उनके मन में जितना तीव्र होता है, समर्थन का भाव उतना तीव्र नहीं होता। अध्ययन में मतदाताओं के समूह को 10-12 सीनेटरों के नाम के साथ ‘मैं इनका समर्थन करता हूं’ और ‘मैं इनका विरोध करता हूं’ में से एक विकल्प चुनने को कहा। ‘विरोध’ का विकल्प चुनने वाले लोगों का निर्णय ज्यादा पक्का था, जबकि ‘समर्थकों’ का समर्थन उतना पक्का नहीं।
इसकी व्याख्या यह है कि दलों द्वारा एक दूसरे के खिलाफ निंदात्मक प्रचार से लोगों में राजनीति को ‘समर्थन’ की बजाय ‘विरोध’ के रूप में लेने की आदत विकसित हो गई है। इसीलिए कोई मतदाता किसी का समर्थन करना चाहता है तो हो सकता है कि उसके पक्ष में वोट डालने के लिए जहमत न उठाए, लेकिन जो किसी का विरोध करना चाहता है, वह उसके विरोधी को वोट देने जरूर जाएगा।