यह दुनिया है परछाइयों की
dainik bhaskar
| Jun 14, 2012, 17:09PM IST

वाब में वह अपने लिए किसी दीवाने दिल की पुकार सुनती है। उसकी नींद जगराते ओढ़े, हाथ में बंसी लिए उफकके पहले सितारे को निहारती है..। सफेद घोड़े पर हवा से बात करते राजकुमार की छवि हो या मोटरबाइक चलाते नायक की
कल्पना — दोनों ही गुदगुदाकर उसके अंतर्मन को सींचती हैं, उसे पल्लवित करती हैं। यह स्वप्न उसकी धरोहर है, जिन्हें न तो चुराना संभव है, न ही छीनना। वह उन्हें बुनती है, ताकि उनसे लिपटकर सुकून पा सके। उनकी गर्माहट से रोशन कर सके अपना वजूद। जीने के लिए वाबों का होना निहायत जरूरी है। वाब, जो Êिांदगी की ऊर्जा और ऊष्मा है। वह कोमल सपना, जो ट्रेन के कंपार्टमेंट में किसी अभिनेत्री के पैरों में अटके पुर्जे पर रख गया कोई — ‘आपके पैर देखे, बहुत हसीं हैं ये, इन्हें Êामीन पर मत उतारिएगा, मैले हो जाएंगे’, जो उसके साथ जि़ंदगीभर चलता है। उसके अंधेरेउजालों में उमीद की तरह रोशन रहता है..वही वाब एक आम लड़की के भी जीने का सबब बन जाता है।
फिल्में सपने जगाती हैं। सपने Êिांदगी जीने की इच्छा..जीवन के बेढब उतारचढ़ाव में कितने ही दिलों को बंजर होने से बचाती है, यह रुपहली दुनिया। तेज धूप में छांव का एहसास कराती तो कहीं मन के क्षितिज पर सतरंगा जाल सजाती है।
फिल्म जगत ने हर उम्र और वर्ग की स्त्रियों के मन को छुआ है, परदे पर थिरकते नायकनायिकाओं के अद्भुत संसार में बिताए महज तीन घंटे, अजाने ही उस स्त्री के जीवन के सुंदरतम पल बन जाते हैं, जिसके लिए आज भी फिल्में ही बाहरी दुनिया देखने का झरोखा हैं। इस खिड़की के पार वह अक्सर उन सपनों के महकते बाग देखती है, जो उसके जीवन में अधखिले रह गए।
यह अनमोल लहे, उसके इर्दगिर्द पसरे अभावों की कसक कम कर उसे राहत देते हैं। बोझिल रिश्तों की गिरहें खुलती देख उसका मन बरसों बाद, अपने रूठे हुए वाबों को मनाता अंदर ही अंदर मुस्कुराता है। परदे पर बेड़ियां खोल, पायल पहनकर नृत्य करती हुई नायिका उस स्त्री को अपने अंतस में हरहराकर, उमड़ती हुई वेगवान नदी मालूम पड़ती है। अपनी उनींदी आंखों पर फिर वह एक वाब की आहट सुनती है।
‘पंख होते तो उड़ आती रे’ सिल्वर स्क्रीन पर गूंजती पंक्तियां, उसकी अपनी इच्छा है, अपनी दरकार, वह एक सुकून भरी सांस भीतर समेटकर, आहिस्ताआहिस्ता सकुचाए मन के पंख खोलती है। सपने देखने और उन्हें पूरा करने की वाहिश का नन्हा अंकुर मन में जन्मते ही वह खुद में परिवर्तन महसूस कर, अपने अस्तित्व में उजास देखती है। उजाला, जो सुंदरप्रभामय है।
1960 के पहले बनी फिल्मों में साधारण वेशभूषा और साजसज्जा दिखती थी, जबकि उसके बाद की फिल्मों ने फैशन के क्षेत्र में एक नई लहर जगाई। फैशन, जो सिल्वर स्क्रीन से उतरकर, आम स्त्री के जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बना। घर की साजसजावट हो, ज्वैलरी हो या फिर नायकनायिकाओं के कपड़े — उसने सबको इस रजतपट से बखूबी अपनी Êिांदगी में शामिल किया। संगीत, अभिनय और नृत्य, जहां युवतियों के मन पर काबिज हुआ, वहीं नितनए तरीके के लिबास, मेकअप और हेयर स्टाइल्स ने उनकी Êिांदगी के कैनवास को खूबसूरत, विविध रंग नवाजे.. मुमताज की बॉडी हैंगिंग साड़ियों से घरेलू स्त्रियों ने साधारण बनावश्रंगार से अलहदा, एक फैशनेबल लुक पाया तो वहीं सार के दशक में युवतियों ने जीनत अमान, नीतू सिंह के बेलबॉटस और लंबे कॉलर वाली शर्ट्स से खुद को नए रूप में संवारा। चुस्त कमीज पर चूड़ीदार नाजुकशोख बालाओं की खास पसंद बनी। उस दौर से बहुत आगे निकल आई, आज की युवा पीढ़ी को लोवेस्ट जींस, पोल्गा डोट्स, मिनी मिडी खुद पर जंचती है।
वक्त के साथ बदलते पैरहन तनमन और विचारों में ताजगी का संचार करते हैं। स्त्रियों ने अपने साथसाथ पुरुष मित्रों और जीवनसाथी को भी फिल्मों में करवट लेते फैशन के अनुसार कभी देवानंद के काले सूट तो कभी ऋषि कपूर की ‘आल ह्वाइट’ वाली इमेज में देखने की वाहिश की। शमी कपूर के चेक सूट्स, स्कार्फ और मफलर के साथ राजेश खन्ना के कुर्ते उनकी कमजोरी रहे। शाहरुख खान के लेदर जैकेट्स और टाइट फिट टी शर्ट्स, शाहिद कपूर के पठानी सूट में आज लड़कियां अपने वॉयफ्रेंड को सजे देखना चाहती हैं।
फिल्मों में लगातार बदलते साड़ियों के पैटर्न्स स्त्रियां अपनी उम्र व वर्ग के अनुसार चुनती रहीं। रेखा की कांजीवरम हो या विद्या बालन की कॉटन साड़ियां, सभी ने महिलाओं की वॉर्डरोब में खासी जगह बनाई। काजोल की शिफॉन और सेमी ट्रांसपेरेंट साड़ियों ने कम उम्र की स्त्रियों को लुभाया तो कॉलेज जाने वाली लड़कियों ने लॉन्गशॉर्ट्स स्कर्ट्स के पैटर्न को खुले मन से अपनाया। और तो और, रानी मुखर्जी और प्रीति जिंटा की रंगीन कुर्तियों ने भी उन्हें मोहित किया। इतना ही नहीं, शादियोंउत्सवों की शॉपिंग के दौरान पारंपरिक घाघराचोली और ब्राइडल लहंगे उनके लिए मुय आकर्षण रहे।
एक्सेसरीज में लॉन्ग बूट्स, स्लीक सनग्लासेज आज की नवयुवतियों की पसंद हैं, जबकि कभी जमाना आशा पारेख की लटों और माधुरी दीक्षित के कुंदन जड़े गहनों का रहा है।
समाज का आईना कही जाने वाली फिल्में, सिक्के के दोनों पहलुओं से रूबरू कराती हैं। इसकी जादुई लहरों पर सैर करती कल्पना लोक में विचरती हुई स्त्री — ‘अर्थ’, ‘इजाजत’ और ‘माया मेमसाहब’ के विवाहेार संबंधों से उपजे तनाव का खूबसूरत योरा देने वाले स्वप्नलोक पर पांव रखतेरखते ठिठक कर सजग हो जाती है। मन की उमंग में बेपरवाह बढ़े कदमों की जमीन टटोल, सही राह तलाशती है।
समय के साथ स्त्री के स्वभाव में परिवर्तन आया है, जिससे उसकी पसंदनापसंद में बदलाव भी लाजिमी है। आज की नई पीढ़ी को Êिांदगी के साथ प्रयोग करती हुई फिल्में रुचिकर लगती हैं। ‘स्पर्म डोनेशन’ जैसा अछूता विषय हो या ‘लाइफ इन ए मेट्रो’ या फिर ‘कहानी’ का थ्रिल, वह उसी फिल्म की प्रशंसा करती है, जिससे खुद को जोड़ सके — उसके लिए सिने जगत, आसपास की गतिविधियों से जुड़ा संसार है। वह जहान..जिसका सौंदर्य उसके जीवन की लज्जत बढ़ाता है, उसे प्रेरणा देता है कि वह अपने सपनों को समझ आसपास के बनतेबिगड़ते माहौल पर नÊार रखें, उन पर Êाोरदार तरीके से टिप्पणी कर सके। सिल्वर स्क्रीन ने कभी उसे प्रश्न दिए तो कभी उसकी समस्याओं के उार।
दिल में सुनहले वाब बजने से लेकर उनकी ताबीर की राहों तक निकलता है ये स्वप्निल संसार। किसी कामयाब रोशन सुबह, यह रुपहली शानदार फिल्मी दुनिया, फिर उसे हाथ बढ़ाकर अपना हिस्सा बना लेती है। वह नन्ही जान कहीं सुनिधि चौहान तो कहीं श्रेया घोषाल के रूप में अपने सौंधे वाब साकार होते देखती है।
जीवन विविध वाकयों और अनुभवों का एक कोलाज है। जिसकी खूबसूरत झलक है मायानगरी। शद, स्वर और चित्र के संयोजन से बने अद्भुत रुपहले संसार में डोलती परछाइयों के कुछ सपने, इसको बहुत करीब से देखने वाली उस स्त्री के भी हैं, जो परदे के बाहर, अरमानों का कारवां सजाए कभी महानगरीय सयता में आबोदाना तलाशती है तो कभी आसमान के तारे जमीं पर! o






