बदन पे सितारे लपेटे हुए हिंदी सिनेमा..

देखी है कभी ऐसी पेंटिंग, जिसमें जिंदगी के सारे रंग, सपने, सब इच्छाएं एक साथ, एक ही कैनवास पर देखने को मिलती हों? जी हां हुजूर, हर शुक्रवार को लगती है ये मिलीमीटर के कैनवास पर बनी हुई पेंटिंग, जिसे हम सिनेमाघरों में देखते हैं। हिंदी सिनेमा, यानी सपनों का कैनवास। वे रंग बिरंगे , चित्र, चरित्र, जो हम कभी किसी भूले बिसरे वक्त में, बस अपनी सोच के दायरे में सीमित रखते थे, वे सिनेमा के रूप में अब बाकायदा चलते फिरते हैं। सिनेमा ने खूबसूरती के नए प्रतीक गढ़े हैं, नई परिभाषाएं दी हैं। सिनेमाघरों में चांदी जैसे चमकते परदे पर उभरती तसवीरों ने जो सम्मोहन रचा है, वो बयान के बाहर की बात है। स्वप्न और सौंदर्य की यह यात्रा सिनेमा में खास तरीके से तय की गई है। फिल्मों का कला पक्ष इस यात्रा का जरूरी पाथेय रहा है। इक्कीसवीं शता दी में फिल्मों में एंटरटेनमेंट के मायने सिर्फ हीरो या हीरोइन की एक्टिंग या फिल्म की कहानी तक सीमित नहीं रह गए हैं। सपनों और सुंदरता की कहानी कितने प्रभावी तरीके से कही जाएगी, यह बात सिनेमा के कला पक्ष से भी तय होती है। सेट डिजाइनिंग, फिल्मों का कलर टोन, साउंड इंजीनियरिंग, कॉस्ट्यूस जैसे पहलू भी एंटरटेनमेंट के इस पूरे पैकेज का एक अहम हिस्सा हैं।
‘सेट’ हो जाए कहानी
चलते हैं, यादों के सफरनामे पर। फिल्मों के कला पक्ष को परिभाषित करने वाले सेट्स का रंग रूप लगातार बदलता रहा है। भव्यतम सेट्स का इस्तेमाल पीरियड सिनेमा से महंगी कॉमर्शियल फिल्मों तक होता आया है। साठ के दशक में बनी ऐतिहासिक फिल्म ‘मुगल ए आज़म’ हो, साल 2002 की लॉकबस्टर ‘देवदास’ हो या फिर पारिवारिक ड्रामा ‘कभी खुशी कभी गम’ क्यों न हो — इन सभी फिल्मों में जो भारी भरकम सेट्स इस्तेमाल किए गए, उनसे कहानी में वर्णित कालखंड को उपयुक्त रूप मिला है। यही नहीं, सेट्स की भव्यता ने दर्शकों को आकर्षित भी किया है। फिल्मों का इतिहास नए-नए प्रयोगों से समृद्ध हुआ है। हिंदी सिनेमा की खासियत ही है — कहीं अत्यधिक प्रयोग तो कहीं और तकनीक के सहारे हुए बदलावों से अलग, फिल्मों को बेहद ग्रास रूट लेवल पे शूट करना, बिना किसी सेट के, किसी तड़क-भड़क के बिना। ऐसा ही एक प्रयोग है — फिल्मों को रियल लोकेशंस पर शूट करना, क्राउड के रूप में असली भीड़ इकट्ठा करना। ‘कहानी’, ‘स्लमडॉग मिलिनेयर’ और ‘दिल्ली 6’ जैसी फिल्मों में ऐसे प्रयोग काफी सराहे गए हैं, जो कि फिल्म की कहानी और उसके किरदारों को वास्तविकता के और भी करीब ले आए हैं। कहने की बात नहीं कि इन फिल्मों में भी दर्शकों का सपना ही परदे पर उतरा है, लेकिन उसे पेश करने का तरीका लगातार नया और अनूठा होता गया है।
भव्यतम सेट्स से दूर, बंगलों में शूटिंग करने के प्रयोग ने न केवल फिल्मों को सहजता की तरफ मोड़ा, बल्कि दर्शकों ने भी ऐसी फिल्मों को अपनी जिदगी और वास्तविकता के काफी करीब पाया। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में फिल्मों को बंगलों में शूट करने का चलन उतना ही पुराना है, जितना कि इंडस्ट्री में एक दूसरे को तोहफे देने का चलन।
हिंदी सिनेमा के पहले सुपरस्टार माने जाने वाले राजेश खन्ना ने एक बंगला तोहफे के रूप में एक्ट्रेस अंजू महेंद्रूको दिया था। खैर, यह बात यहां, संदर्भ ये है कि इसी बंगले में कई हिंदी फिल्मों की शूटिंग की गई। पुराने जमाने में ऋषिकेश मुखर्जी निर्देशित फिल्म ‘अभिमान’ और नए दौर के क्लासिक सिनेमा में नाम दर्ज कराने वाली फिल्में, जैसे — ‘परिणीता’ और ‘रेनकोट’ सटीक उदाहरण हैं, ऐसी फिल्मों के, जो कि बंगलों में शूट की गईं और काफी लोकप्रिय रहीं।
स्पेशल इफेक्ट्स की बात है खास
हिंदी सिनेमा की सौंदर्य प्रयोगशाला में खास रंग है — स्पेशल इफेक्ट्स। बीते एक दशक से हाई बजट कॉमर्शियल फिल्मों में स्पेशल इफेक्ट्स का चलन बढ़ा है। तकनीक का खूबसूरत इस्तेमाल यूं तो कई फिल्मों में किया जाता रहा है, लेकिन राकेश रोशन निर्देशित ‘कोई मिल गया’ में स्पेशल इफेक्ट्स की खास कारीगरी नजर आई। इस साइंस फिक्शन की सफलता के बाद ‘कृष’, ‘ओम शांति ओम’, ‘डॉन 2’, ‘धूम’, ‘धूम 2’ और ‘अक्स’ सरीखी फिल्मों में स्पेशल इफेक्ट्स के इस्तेमाल ने बदलाव का नया रास्ता तैयार किया।
ज्यादा अरसा नहीं बीता, जब गेमिंग, सुपर हीरोज और खलनायक की कहानी से लैस फिल्म रिलीज हुई — ‘रावन’। इससे पहले एक्शन ड्रामा ‘रोबोट’ भी आई थी। इन दोनों फिल्मों में स्पेशल और विजुअल इफेक्ट्स तैयार करने के लिए हॉलीवुड के कलाकारों की मदद ली गई। खास बात यह है कि इन फिल्मों में प्रॉपर्टीज की जगह इफेक्ट्स का ही इस्तेमाल किया गया। हिंदी सिनेमा के कला पक्ष का यह रूप किसी जादू से कम नहीं है। ये वह जादू है, जो खूबसूरती के नए प्रतिमान गढ़ता है। यहां सौंदर्य का मतलब सिर्फ अच्छा अच्छा लगने से नहीं है। अंधेरे का भी सौंदर्य है, रहस्यमयता है, जो तकनीक से तैयार होता है। यह सब रंग इफेक्ट्स के हाथों रचे जाते हैं।
रंगों की बारात
इफेक्ट्स की चर्चा करते हुए आइए, रंगों की बारादरी में भी झांक लें। हमारी के साथ-साथ रंगों ने हिंदी सिनेमा के विकास में अहम भूमिका निभाई है। एंड व्हाइट फिल्मों के जमाने से लेकर रंगीन फिल्मों तक — रंगों ने हिंदी सिनेमा में हमेशा नई जान डाली है। पिछले एक दशक से फिल्मों को किसी खास या एकाकी कलर टोन में शूट करने पर काफी जोर दिया जा रहा है, यानी पूरी की पूरी फिल्म की एक विशिष्ट रंगत। कहानी और उसके चरित्रों को उभारते हुए जादुई रंग। यानी महज ग्रे शेड वाले किरदार ही नहीं, कलर भी!
मेटेलिक, ग्रेइश और डार्क कलर स्कीम में बनीं फिल्में हैं — ‘कमीने’, ‘ओमकारा’ और ‘सांवरिया’। इन फिल्मों का कलर टोन लैक और ग्रेइश रहा, वहीं ‘गुलाल’, ‘देव डी’ जैसी फिल्मों का कलर टोन लाल और नीला था। यह बताने की जरूरत नहीं है कि इन सब फिल्मों को किसी खास कलर टोन में शूट करने का उद्देश्य रंगों से खेलना मात्र नहीं था, बल्कि कहानी के मूड और भावनाओं को उभारना भी था। कला के इस पक्ष को आजकल युवा निर्देशक बखूबी समझ रहे हैं और प्रयोग में भी ला रहे हैं।
सब कुछ कहती हैं आवाजें
चलते-फिरते चित्रों और चरित्रों में रंग तो ढले ही, इनके साथ इनमें सुर, लय, ताल और संगीत का भी समावेश हुआ। शास्त्रीय संगीत से लेकर आधुनिक हिप हॉप, रोमांटिक, म्यूजन और सूफी संगीत तक — हिंदी सिनेमा ने अपने साथ सपनों और सुंदरता की यात्रा भी बखूबी तय की है। हिंदी सिनेमा के हर दौर में महान संगीतकारों ने अनूठे प्रयोग किए। ‘पंचम’, जिन्हें दुनिया ‘आर.डी. बर्मन’ के नाम से जानती है, ने संगीत की फील्ड में नए-नए प्रयोग किए। वे ही ‘साउंड इंजीनियरिंग’ जैसी विधा बॉलीवुड में लेकर आए। आमतौर पर साउंड इंजीनियरिंग का प्रयोग संगीत और फिल्म के साउंड को और बेहतर बनाने और दर्शक के करीब ले जाने में होता है। शुरू-शुरू में इस तकनीक का प्रयोग सिर्फ लाइव कॉन्सर्ट्स तक सीमित था, लेकिन अब यह तकनीक फिल्मों में भी बहुत इस्तेमाल हो रही है। इस तकनीक का पूराअसर ‘गजनी’, ‘लैक’, ‘मुसाफिर’,, ‘ट्रैफिक सिग्नल’, ‘गांधी माई फादर’ जैसी फिल्मों में महसूस किया जा सकता है। खुशी की बात है कि इनमें से अधिकतर फिल्मों की साउंड इंजीनियरिंग एक भारतीय ने की — ‘रसूल पोकुट्टी’। हाल में वे ‘स्लमडॉग..’ के लिए सर्वश्रेष्ठ साउंड एडिटिंग श्रेणी का ऑस्कर अवॉर्ड भी हासिल कर चुके हैं।








