लंगड़ा आम!
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| May 11, 2012, 12:39PM IST

उस कमरे में शोर बड़ा।
कहीं खत्म होने जैसा था,
बबलू-मित्रा का झगड़ा।
पीला मीठा यह आम,
इसे कहती लंगड़ा।
इसी बात को लेकर बबलू,
मित्रा से था उलझ पड़ा।
मेहनत से न डरती चींटी,
नन्हे पांव चलती चींटी।
पंक्ति-पंक्ति बढ़ती जाती,
अनुशासन में पलती चींटी।
गुड़-शक्कर की है यह रसिया,
अवसर मिले न टालती चींटी।
आटा चावल जो भी मिलता,
चट कर के ही हिलती चींटी।
हाथी दादा के ऊपर चढ़,
उसे कभी तो छलती चींटी।
कल के लिए बचा कर रखती,
हाथ कभी न मलती चींटी।







