सब सच ही तो है!

नई प्रजाति
जहां ताज अनुमान के अनुसार समुद्री सांपों की संख्या कम होती जा रही है, वहीं वैज्ञानिकों ने कॉर्पेन्ट्रिया की खाड़ी में समुद्री सांप की एक नई प्रजाति खोज ली है। अजीब तरह की कंेचुली वाले इस सांप का नाम वैज्ञानिकों ने ‘हाइड्रोफिस डोलान्लडी’ रखा है। इस बोलचाल की भाषा में ‘रफ स्केल्ड सी स्नेक’ भी कहा जा सकता है। ऑस्ट्रेलिया के निकट स्थित पाए गए इन सांपों के विकास में बारे में वैज्ञानिकों ने जानकारी जुटानी शुरू कर दी है। नई सांप की प्रजाति को खोजने वाले दल का नेतृत्व करने वाले प्रो. ब्रायन फ्राई का कहना है कि इन सांपों के बारे में अब तक जानकारी न हो पाने की मुख्य वजह थी कि ये सांप खाड़ी के इलाके में ही रहते हैं। और इन इलाकों में इस प्रकार का सर्वेक्षण करना अपेक्षाकृत मुश्किल होता है। आगे बताते हैं कि इनके दल को एक रात में 200 ऐसे सांपों को देखा।
बड़ा-बड़ा सा
सोच कर देखिए अगर आपका कद अपने दोस्तों के कद से थोड़ा-सा Êयादा हो तो अच्छा लगता है। यही खुशी फील्ड मार्शल को भी मिली। अरे, अरे! फील्ड मार्शल आपकी तरह कोई बच्च नहीं है, बल्कि वो तो है बैल। ये ब्रिटेन का सबसे बड़ा बैल है। इसकी लम्बाई है छह फीट। फिलहाल इसे समरसेट के कारावान पार्क में पर्यटकों के आकर्षण के लिए रखा गया है। इसके केयरटेकर गैरी बॉडन का कहना है कि हमें रिसर्च करने पर पता चला कि ब्रिटेन ही नहीं बल्कि ये तो विश्व का सबसे बड़ा बैल है। अब इसका नाम गिनीÊा बुक में दर्Êा होने का इंतÊार है।
अपनी भी भाषा!
हम सब बात करते हैं और जीव-जगत के सभी प्राणी बात करते हैं। लेकिन इनकी ‘गुप्त भाषा’ का अब तक कोई पता नहीं लगा पाया था। पर अब वैज्ञानिकों को दावा है कि संवाद स्थापित करने के लिए कुछ प्राणी एक खास किस्म के प्रकाश का प्रयोग करते हैं। मैगÊाीन ‘करंट बॉयोलॉजी’ के अनुसार वैज्ञानिकों ने पता लगाना शुरू किया कि जानवर ‘धुव्रीकरण’ का प्रयोग संवाद के लिए कैसे करते हैं। यह प्रकाश का एक प्रकार है, जो मनुष्यों को नहीं दिखता है। इसे वैज्ञानिकों ने कटलफिश पर अध्ययन करने के बाद जाना है कि संवाद किस प्रकार स्थापित होता है और जीव विज्ञान में इनका क्या महत्व है। ब्रिटेन के ब्रिस्टल विश्वविद्यालय और ऑस्ट्रेलिया के क्वींसलैंड विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों के मुताबिक ये खुलासा हुआ कि समुद्री जीव सीफैलोपोडस को ‘पोलराइज्ड लाइट’ की कई दिशाओं पता होता है।
एक रोचक खोज!
लम्बे समय से ये धारणा रही है कि सही और गलत शब्दों के बीच अंतर पहचानने की मानवीय योग्यता बोली गई भाषा से विकसित होती है क्योंकि बच्चे पहले से ही मौखिक भाषा को समझने की योग्यता के आधार पर अक्षर विन्यास समझते हैं।
लेकिन अब फ्रांस के खोजकर्ताओं ने बंदरों(बबून) पर अध्ययन करके इस धारणा को चुनौती दी है। उन्होंने साबित करने का प्रयास किया है कि बंदर शब्दों के अक्षरों के विशेष संयोजनों को देखकर उन्हें पहचान सकते हैं और विसंगतियों को भी समझ सकते हैं, जिन्हें अब तक बोलकर ही समझने की बात कही जाती रही है। अध्ययन के अनुसार, पढ़ने की समझ आने का मतलब केवल बोलने से नहीं है बल्कि शब्द बनाने वाले अक्षरों को पहचानने और उनके नियमित पैटर्न को याद करने से भी है। यह बात सीएनआरएस एआईएक्स मार्सील्लारी यूनिवर्सिटी के लैबोरेट्री डिसाइक्लॉजी कॉग्निटिव के खोजकर्ताओं ने कही है। प्रयोग में बंदरों को टच स्क्रीन पर चार-चार अक्षरों वाले अंग्रेÊाी के शब्द दिखाए गए और उन्हें प्रशिक्षण दिया गया कि सही शब्द बोले जाने पर वह टच स्क्रीन पर अंडाकार आकृति को दबाएं तथा सही नहीं लगने पर क्रॉस की आकृति पर बटन दबाएं। कुछ ही दिनों बाद बंदरों ने अंग्रेजी के शब्दों को पहचानना शुरू कर दिया और उदाहारण के तौर पर बैंक शब्द की तरह एक निर्थक शब्द जैंक में भेद करने लगे। रोचक बात यह है कि बंदरों ने कई सारे शब्दों का उच्चारण याद करने के बाद उन शब्दों में भी सही-गलत की पहचान कर ली जिन्हें कभी उन्हें दिखाया नहीं गया। खोजकर्ताओं के अनुसार बंदर भी लगातार बोले जाने वाले अंग्रेÊाी शब्दों के अक्षर विन्यास को समझते हैं और याद कर लेते हैं। है न मÊोदार ये जानकारियां।





