ईनाम
dainik bhaskar.com | Aug 03, 2012, 13:27PM IST

मनोज भी अपने मम्मी-पापा के साथ भट्ठे पर ईंट थापने जाने लगा।
पांच भाई-बहन थे, जिसमें तीन भाई और दो बहनें थीं। मनोज तीन भाइयों में से मंझला था। सारा परिवार भट्ठे पर काम करता था। कोई मिट्टी गूंथता, कोई रेहड़ी पर कच्ची ईंटे लादकर भट्ठे ले जाता और कोई पकी हुई ईंटों को चुनता था। कोई ईंट खरीदने आए व्यक्ति के लिए ट्रॉली में ईंटें लादने में मदद करता।
अब भट्ठे पर काम कम हो रहा था क्योंकि पिछले कुछ दिनों से बारिश ज्यादा हो रही थी। रोज़गार चलाने के लिए मनोज के पिताजी ने अपने तीनों लड़कों को पास के शहर में किसी न किसी काम पर लगवा दिया था।
मनोज को शहर में एक चाय वाले की दुकान पर रखवा दिया। वह सुबह होते ही शहर चला जाता और शाम को अपने घर लौट आता। उसके पास कोई साइकिल न थी। वह तेÊा-तेÊा कदमों से चलता हुआ पैदल ही घर लौट आता। कई बार किसी स्कूटर वाले से लिफ्ट ले लेता था। कुछ दिनों में ही वो चाय बनाना सीख गया।
धीरज मनोज से बड़ा था। वह थोड़ा शरारती और कुछ कामचोर किस्म का भी था। उसे फिल्में देखने का काफी शौक था, जबकि उसके घर में एक छोटा-सा टीवी भी था, फिर भी सिनेमाघर में
जाकर फिल्में देखने में उसे बड़ा आनंद आता था।कुछ दिनों से मनोज के घर उसके मामाजी का लड़का पंकज भी रहने आया हुआ था। धीरज पंकज को लेकर शहर की ओर रवाना हो जाता और फिर घूम कर वापस आ जाता। एक दिन धीरज शहर आया। उसके साथ पंकज भी था। वे दोनों मनोज के पास आ गए। मनोज बर्तन धोने में व्यस्त था। उसका मालिक किसी काम से बैंक गया हुआ था, जो वहां से कुछ दूरी पर था।
धीरज का मन साफ नहीं था। वह पहले कई बार आया था और उसे रुपए कमाकर गल्ले में डालते हुए देख चुका था।
‘अच्छा मौका है।’ धीरज ने सोचा।
वह मनोज के पास ही बैठा रहा। मनोज धीरज को रेहड़ी के पास बिठाकर सामने वाले दफ्तर में चाय देने के लिए गया। ज्यों ही पंकज सामने बाथरूम में गया तो मनोज ने सोचा, ‘आज जेब खाली है, इससे अच्छा मौका अब कब मिलेगा?’
मनोज लौटने के कुछ बाद ही धीरज और पंकज वहां से चले गए। किसी ग्राहक को खुल्ले देने के लिए जैसे ही मनोज ने गल्ले की पेटी खोली तो मनोज सन्न रह गया। सौ-सौ के दोनों नोट में से एक गायब था। बाकी पचास-पचास या उनसे छोटे नोट सुरक्षित थे।
‘एक नोट कहां गया?’ मनोज चिंता में डूब गया। वह सोचने लगा, ‘कहीं अंकल तो नहीं ले गए थे?’
उसके मन में सोच का घोड़ा फिर सरपट दौड़ने लगा, ‘नहीं, नहीं, मैंने तो उनके जाने के बाद ही गुल्लक से रुपए निकाल कर गिने थे। यह शरारत धीरज की है। क्योंकि वह कई बार पिता जी के पैसे भी चुरा लेता है।’ मनोज सोचने लगा। इतने में मनोज का मालिक भी बैंक से वापस लौट आया।
‘अंकल जी, मैं अभी आता हूं।’ मनोज ने मालिक से कहा।
‘क्यों क्या बात हो गई? कहां जा रहे हो?’ मालिक ने हैरानी से पूछा।
‘बस अंकल जी दो मिनट में आया..।’ कहकर मनोज उधर भाग निकला जिधर धीरज और पंकज गए थे।
मनोज जानता था कि धीरज Êारूर सिनेमाघर की ओर ही जा रहा होगा। अभी धीरज और पंकज कुछ ही दूर गए थे कि मनोज उनके साथ जा मिला और धीरज की बाजू पकड़ कर बोला, ‘अरे! धीरज अपनी जेब तो दिखा।’ अब धीरज को काटो तो खून नहीं।
‘क्या..क्या..ये क्या कर रहे हो तुम? मेरी जेब में कुछ नहीं है..।’ धीरज सकपकाते हुए बोला। धीरज की आनाकानी के बाद भी मनोज ने उसकी पैंट में से सौ रुपए निकालते हुए बोला,‘झूठे कहीं के, Êयादा चालाक बनते हो?’ ‘ये तो..ये तो ..मैंने पिताजी से..कल..।’
धीरज इधर-उधर की बातें करने लगा।
‘बेईमान, घर आकर पिताजी को सारी बात बताऊंगा।’
धीरज की चोरी पकड़ी गई, मनोज उससे सौ रुपए छुड़ा कर दुकान की ओर चल पड़ा।
‘कहा चले गए थे तुम?’ अंकल ने पूछा।
मनोज अपने मालिक को सौ रुपए देते हुए बोला, ‘ये लेने गया था, इसे मेरा भाई चुराकर ले जा रहा था।’
‘तुम्हारा भाई?’
‘हां अंकल जी, लेकिन आज के बाद वह यहां पर कभी नहीं आएगा। मैं आज उसकी शिकायत अपने पिता जी से करूंगा।’
‘मेरे ईमानदार बेटे! मुझे तुम पर गर्व है।
हम दोनों शाम को तेरे घर पर जाएंगे और उसे प्यार से समझाएंगे कि ऐसा काम इंसान को बदनामी के कुएं में गिरा देता है। और हां, ये सौ रुपए अब तुम्हारे हैं। मेरी ओर से।’‘लेकिन अंकल जी आपने परसो ही तो मुझे तनख्वाह दी है..।’
‘हां, पर ये तो तुम्हारी ईमानदारी
का इनाम है।’







