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हार न मानी,तो जीत हुई..

dainikbhaskar.com | Sep 28, 2012, 10:04AM IST
 
 


जब कभी आपके जीवन में कोई परेशानी आती है तो आप उसका सामना कैसे करते हैं? उस बाधा से डर कर काम को बीच में छोड़ देते हैं? या कभी उस काम को दोबारा न करने की सोच लेते हैं? या हताश होकर खुद को दोष देते हैं? हम में से अक्सर लोग इन तीनों में से ही चुनते हैं। वैसे, आपने मेंढक की कहानी तो सुनी ही होगी।

एक मेंढक फुदकते हुए किसान की झोपड़ी में आ गया। वहां दूध का पात्र रखा हुआ था। उसने बिना सोचे-समझे उस पात्र में छलांग लगा दी। दूध में वह तैर नहीं पा रहा था। आंखों पर दूध की परत जमने की वजह से उसे दिखाई भी नहीं दे रहा था। छलांग लगाकर बाहर भी नहीं निकल पा रहा था। पर मन में हार न मानने का प्रण लिया और अपने हाथ-पैरों को अनवरत चलाने लगा। हाथ-पैरों को चलाने से दूध गोल-गोल घूमने लगा, जिससे मक्खन के कण एक स्थान पर जमा हो गए। कुछ देर बाद मक्खन का थक्का दूध की सतह पर तैरने लगा। इस मक्खन के थक्के पर ऊपर मेंढक बैठ गया। थोड़ी देर बाद उसने पात्र से बाहर छलांग लगा दी और अब वो बाहर था। अगर मेंढक ने कोशिश न की होती, तो शायद उसकी मृत्यु हो जाती। उसने कोशिश की और जीत गया। बुरे समय में कोशिशों से क्या होता है, इसकी एक मिसाल माइकल फैल्प्स के जीवन में भी मिलती है। माइकल फैल्प्स को आप रिकॉर्ड-ब्रेकर के रूप में जानते होंगे। असल में ये तैराक हैं और ओलिंपिक के इतिहास में इनके नाम कई रिकॉर्ड दर्ज हैं।

लेकिन वर्ष 2008 माइकल के साथ दुर्घटना घटी। पैर फिसलने की वजह से गिरे और कलाई चोटिल हो गई। कलाई पर प्लास्टर लगा, जिसकी वजह से न तैरने की हिदायत भी मिली। पर ओलिम्पिक में सबसे ज्यादा रिकॉर्ड हासिल करने के अपने सपने के खातिर वे पूल में उतरे। तैरना तो मुश्किल था, पर घंटों पूल में किक किया करते थे। इससे इनकी पैरों की मांसपेशियां अधिक मज़बूत हो गईं।

अब आया 2008 बीजिंग ओलिंपिक। पूल में माइकल पूरी लगन के साथ उतरे और कुछ सेंकड के अंतर से माइकल ने यह मुकाबला जीत लिया। दूसरे स्थान पर मिलोराड केविन रहे। इस उलट-फेर से सब हैरान रह गए। इसलिए इस प्रतियोगिता की क्लिपिंग्स को कई बार देखा गया। तब समझ आया कि आखिरी पांच मीटर पर पहुंच कर मिलोराड थक कर अपने पैर ढीले कर चुके थे। उसके उलट माइकल तेज़ी से किक करते रहे और जीत हासिल कर पाए। हाथ को पूल से बाहर रखकर केवल किक की प्रैक्टिस ने फैल्प्स की रिकॉर्ड बनाने में मदद की।

ऐसे लोग भी हम जैसे होते हैं, पर इनकी यही सोच और जज्बा इन्हें हम सब से अलग बनाता है। औरों को इल्जाम देने से बेहतर है, अपने ही भीतर छुपे आत्मविश्वास को जगाना।

 
 
 

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