गरीबी को सफलता की राह में बाधक न मानें
N.Raghuraman | May 08, 2012, 11:25AM IST

गोपाला तमिलनाडु में किलाकराई के निकट स्थित एक छोटे-से गांव माविला थोप्पु के रहने वाले हैं। इस गांव की आबादी पौने दो सौ से ज्यादा नहीं होगी। उनकी मां एस राजम्मल और पिता एस. सनमुगावेल क्रमश: तीसरी व पांचवीं कक्षा से आगे नहीं पढ़ पाए। लेकिन ये दोनों चाहते थे कि अपने बेटे को ग्रेजुएशन न सही तो कम से कम पूरी स्कूली शिक्षा जरूर दिलाएं। वे अपने बेटे को पड़ोस के कस्बे में स्थित इंग्लिश मीडियम स्कूल में भेजने का सपना देखते थे। लेकिन घोर गरीबी के चलते उनका यह सपना साकार नहीं हो सका। वे गोपाला का दाखिला एक तमिल स्कूल में ही करा सके, जिसमें मुफ्त शिक्षा दी जाती थी।
गोपाला अपने मामा के घर के एक छोटे से हिस्से में रहे और उनके परिवार के पास कभी रहने के लिए अपना घर और जमीन नहीं रही। इससे उनका जीवन बहुत मुश्किलों भरा रहा क्योंकि उन्हें अपनी दैनिक आजीविका के लिए रोज काम करना पड़ता था।
गोपाला ने स्ट्रीट लाइट के नीचे या पड़ोसी के घर में पढ़ाई की, जिनके पास उस वक्त थोड़ी-बहुत बिजली की सुविधा थी। उन्हें पढ़ाई-लिखाई का अच्छा माहौल नहीं मिला। उनके कठिन श्रम, दृढ़ इच्छाशक्ति, लक्ष्य के प्रति पूर्ण समर्पण और गंभीरता ने उन्हें अपनी मां की जिंदगी में इतना खास बना दिया। इन मां-बेटे का दर्द यह है कि उनके पिता जिन्होंने उनके बारे में इतने सपने देखे थे, वे आज उनकी सफलता का जश्न मनाने के लिए इस दुनिया में नहीं हैं।
आरवी कर्णन वर्ष 2007 में भारतीय वन सेवा परीक्षा में ऑल-इंडिया टॉपर रहे थे। उनकी मां वी. विजयलक्ष्मी चेन्नई से 800 किमी दूर एक छोटे से जिले करइकुडी में सब-रजिस्ट्रार हैं और पिता आर. वीरराघवन आज भी अलागप्पा आटर्स कॉलेज में बतौर लाइब्रेरियन काम करते हैं। कर्णन का कहना है कि इस तरह के हाई-प्रोफाइल एक्जाम्स के पैटर्न और प्रविधियों को अच्छी तरह समझकर ही आप इनमें सफलता हासिल कर सकते हैं। उन्होंने इसकी तैयारी के लिए कोई भी कोचिंग क्लास ज्वाइन नहीं की।
गोपाला और कर्णन, दोनों ही न सिर्फ अपने परिवार के लिए गौरव के पल लेकर आए, वरन उन्होंने पूरे गांव के लिए एक मिसाल भी कायम की। रामनाथपुरम के गोपाला सुंदरा राज ने अखिल भारतीय स्तर पर पांचवीं रैंक हासिल की और राज्य में प्रथम रहे, जबकि करइकुडी के श्रीराम नगर में रहने वाले आरवी कर्णन ने 158वीं रैंक पाई।
फंडा यह है कि... raghu@bhaskarnet.com
गरीबी सफलता की राह में बाधक नहीं होती और न ही सफल होने के लिए कोचिंग क्लास जैसा कोई सपोर्ट सिस्टम जरूरी होता है। मैं ऐसी कई महिलाओं को जानता हूं, जिन्होंने अपने बच्चों को प्राइवेट ट्यूशनों में भेजने के लिए अपने जेवर तक बेच दिए। यद्यपि ऐसे मामलों में सफलता की कोई गारंटी नहीं होती।





