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चुराएं खुशियों के छोटे-छोटे से पल

एन. रघुरामन | May 10, 2012, 10:47AM IST
 
 

कुछ समय पहले जब मैं गंभीर फूड प्वाइजनिंग के चलते एक महीने तक बिस्तर पर था, तब मैंने देखा कि कबूतर का एक जोड़ा मेरे बेडरूम की बालकनी में अपना घोंसला बनाने की जुगत में लगा है। चूंकि उस वक्त मेरे पास किताबें पढऩे और टीवी देखने के अलावा कुछ और काम नहीं था, लिहाजा मैंने जीवन के बारे में ऐसा कुछ देखा, जिसे हममें से कई लोग व्यस्त जिंदगी में भूलते जा रहे हैं। इसकी शुरुआत छोटे-छोटे तिनकों से हुई, जिन्हें गोलाकार तरीके से जमाया जा रहा था और जाहिर तौर पर इसमें भी एक खूबसूरती थी। कुछ दिन बाद मुझे घोंसले में दो अंडे नजर आए। तब तक उस घोंसले में थोड़ी-बहुत कतरनें, धागे, पंख और यहां तक कि एक रीफिल भी पहुंच चुकी थी। उनके प्रति थोड़ी हमदर्दी रखते हुए मैंने एक पुराना मुलायम दुपट्टïा बिछाने के बाद घोंसले को सावधानीपूर्वक उठाकर उसमें रख दिया। उस वक्त कबूतर-कबूतरी संभवत: भोजन की तलाश में बाहर गए हुए थे। हालांकि मुझे चेताया गया था कि ऐसा करने पर पंक्षियों को झटका लग सकता हैं और हो सकता है कि वे वापस न लौंटे।

इसके अलावा मेरे परिजनों समेत घर में आने वाले लोगों ने भी मुझे चेताया कि ये कबूतर उत्पाती होते हैं। इस कारण आने वाले दिनों में मेरे लिए बड़ा सिरदर्द साबित हो सकते हैं। लेकिन मैं उन अंडों को बाहर फेंकने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। जल्द ही उन अंडों में से दो प्यारे-प्यारे चूजे निकल आए। इसके बाद कबूतर का जोड़ा नियमित तौर पर वहां आता और मैं उन्हें अपने चूजों की नन्हीं चोंच में खाना डालते हुए खिड़की से देखता। इस दौरान वे चूजे लगातार 'चूं-चूं' करते रहते। यह बहुत प्यारा व दिल को छू लेने वाला नजारा होता। धीरे-धीरे चूजे थोड़े बड़े हो गए। अब वे और भी सुंदर दिखने लगे और घोंसले से उछलकर बाहर भी निकल आते। बाहर निकलकर वे खुद को थोड़ा हिलाते-डुलाते, आस-पास नजर दौड़ाते और बिल्डिंग के दसवें माले से बाहरी दुनिया का नजारा लेते। मेरे लिए परदे के पीछे छिप कर चुपचाप उन्हें देखते रहना समय गुजारने का अच्छा जरिया था। मैंने देखा कि वे अब थोड़ा-बहुत फुदकने भी लगे थे। उनकी 'चीं-चीं, चूं-चूं' बराबर चलती रहती। मेरी आहट सुनते ही वे जड़वत हो जाते। मैं चाहता तो उन्हें बाहर निकाल सकता था, लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया, क्योंकि तब तक उनका पूरी तरह विकास नहीं हुआ था।

लेकिन वे बहुत गंदगी फैलाते। मैं नहीं जानता कि वे क्या खाते थे, लेकिन उस बालकनी पर खाने की इतनी चीजें बिखरी रहतीं, जिसे देखकर लगता कि कबूतरों ने वहां पूरे दिन पार्टी मनाई होगी। मेरे परिवार ने मुझे उनकी बदबू के प्रति चेताया, लेकिन मैं फिर भी उन नन्हे-से प्यारे पंक्षियों के साथ खड़ा रहता। जल्द ही वे फुदकते हुए बालकनी की ग्रिल तक आने लगे और फुदककर उस पर चढ़ भी जाते। इस दौरान उनके माता-पिता उनका पेट भरने के लिए लगातार वहां आते रहे। और एक दिन, वे वहां से उड़ गए। उनके जाने के बाद बालकनी को अच्छे से साफ किया गया। तब तक मैं भी स्वस्थ हो गया था। बालकनी को घंटों रगड़-रगड़कर साफ करने वाले नौकर का कहना था, 'मुझे कोई आश्चर्य नहीं होगा अगर नन्हे कबूतर वापस आकर चहचहाते हुए शुक्रिया अदा करें।'

मैनेजमेंट फंडा एन. रघुरामन

फंडा यह है कि...

हमारी महानगरीय जीवनशैली ने बहुत पहले ही हमसे छोटी-छोटी खुशियों के पल छीन लिए हैं। मेरे ख्याल से यदि आप ठान लें, तो इन्हें अपनी जिंदगी में वापस ला सकते हैं। खुशियों के ये छोटे-छोटे पल इस तनावपूर्ण जिंदगी में हमें काफी सुकून दे सकते हैं। raghu@bhaskarnet.com
 
 
 

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