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सिद्धांतों की दुहाई न दें, बल्कि अमल में लाएं

एन. रघुरामन | May 19, 2012, 11:34AM IST
 
 

गर्मी के मौसम में एक दिन शाम के समय मोनिका राठौर नामक बालिका (जिसकी उम्र लगभग 9 साल होगी) ने बिल्डिंग के फस्र्ट फ्लोर पर स्थित अपने घर की पिछली बालकनी से देखा कि एक बुजुर्ग सज्जन साथ वाली बिल्डिंग की दीवार से टिके हुए सुस्ता रहे हैं। वह काफी थके हुए लग रहे थे। उसी समय उसके दरवाजे की घंटी बजी। नन्ही मोनिका दरवाजा खोलने के लिए भागी और दरवाजे को चेन तक थोड़ा-सा खोलकर (जैसा उसे सिखाया गया था) बाहर देखा। वहां पर एक युवा खड़ा था, जो दिखने में गरीब लग रहा था। उसके पास बेहतरीन सेबों से भरा एक टोकरा था, जिसे उसने फर्श पर रख रखा था। उसने बच्ची से पूछा, 'क्या तुम्हारे पापा घर पर हैं?' 'हां...एक मिनट...कोई आपसे मिलने आया है', यह कहते हुए बच्ची वापस खेलने चली गई।

थोड़ी देर बाद मुख्य द्वार के करीब से लगातार आती आवाजों को सुनकर वह बच्ची अपने हाथ में एक गुडिय़ा दबाए उत्सुकतावश वहां आई और उसने देखा कि करबद्ध मुद्रा में खड़ा वह बुजुर्ग शख्स कह रहा था, 'सर, प्लीज मेरी ओर से यह भेंट स्वीकार करें। मेरे बेटे को आपकी वजह से नौकरी मिली है।' उसका युवा बेटा उसके बाजू में खड़ा था। 'मैंने कुछ नहीं किया...आपके बेटे को नौकरी इसलिए मिली, क्योंकि वह इस लायक था', उस बच्ची के बाबा ने जवाब दिया।

तभी उस नन्ही-सी बच्ची को देख बुजुर्ग व्यक्ति बोला, 'ओके...लेकिन आप कम से कम अपने बच्चों के लिए इन्हें ले ही सकते हैं। मेरे अपने बच्चों को कभी ऐसे फल नसीब नहीं हुए। लेकिन आभारस्वरूप मैं इन्हें आपके व आपके परिजनों के लिए लाया हूं।' अब तक उस बच्ची के बाबा के चेहरे पर क्रोध झलकने लगा था। उन्होंने नाराजगी भरे स्वर में कहा, 'इससे पहले कि मैं अपना आपा खो बैठूं। आपके लिए बेहतर यही होगा कि आप इन सेबों को ले जाकर अपने बच्चों को खिलाएं। इतना काफी होगा।' यह सुनकर वे दोनों चुपचाप वहां से लौट गए।

मुंबई में मिड स्पेस की एक कर्मचारी श्रिया शेनॉय ने अपने पिता से जुड़ा एक संस्मरण सुनाया। उनके पास आमों से भरा बक्सा उपहार में आया था और लाने वाला था, उनका एक आभारी कर्मचारी। श्रिया के पिता ने उसे साथ बिठाकर चाय पिलाई, बक्से से एक आम उठाया और अपनी पत्नी को बुलाकर उसे चार हिस्सों में काटकर लाने के लिए कहा। थोड़ी देर बाद उनकी पत्नी उस आम की चार फांकें और उसकी गुठली अलग से लेकर आई। सीनियर शिनॉय ने गुठली उठाई और अपने पालतू कुत्ते की ओर बढ़ा दी और आम की एक-एक फांक श्रिया और उसकी मां को दी, एक फांक उस कर्मचारी को दी और आखिरी फांक खुद खाई। आम खाकर उन्होंने हाथ पोंछे और आम का बक्सा उठाकर उस कर्मचारी के हाथों में देते हुए कहा, 'तुम्हारे इस प्यार का मैं सम्मान करता हूं, लेकिन मैं इससे ज्यादा कुछ नहीं ले सकता।' फिलहाल नई दिल्ली में रह रहीं अवंति नंदकुमार बताती हैं कि तमिलनाडु के धर्मपुरी में फॉरेस्ट कमिश्नर रहे उनके ससुर ने एक सिद्धांत बना रखा था कि उनके सरकारी आवास में कोई भी बाहरी शख्स अपने साथ कुछ लेकर नहीं आएगा। यहां तक कि उनके पर्सनल बैग भी सिक्योरिटी केबिन में रखवा लिए जाते थे और सिर्फ फाइलें ही घर के अंदर आ सकती थीं।

मैनेजमेंट फंडा एन. रघुरामन

फंडा यह है कि... raghu@bhaskarnet.com

यदि आप अपने जीवन में सिद्धांत रूपी कोई छोटी सी भी आदत अपनाते हैं, तो इसका आने वाली पीढ़ी पर गहरा असर पड़ता है। वह पीढ़ी इसे हमेशा याद रखती है और आज के इस दौर में भी, जब फेवर पाने के लिए गिफ्ट्स का लेन-देन आम हो गया है, इन सिद्धांतों को कुछ हद तक अपनाने की कोशिश करती है।
 
 
 

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