विज्ञापन
 
Home >> Magazine >> Career Mantra >> Article Of Career Mantra

ग्रामीण घरों में बदल रहे हैं शक्ति केंद्र

एन. रघुरामन | May 31, 2012, 11:44AM IST
 
 

तैंतालीस वर्षीय बैनाबाई की दोनों बेटियों की शादी हो चुकी है और उसका बेटा भी पढ़-लिखकर काम-धंधे पर लग गया है। इसके बावजूद वह सड़क किनारे स्थित अपना टी-स्टॉल चलाना पसंद करती है। वह दिन में तकरीबन ३०० कप चाय बेच लेती है। उसके परिवार ने वे दिन भी देखे, जब उनकी जिंदगी में सब कुछ डूबता हुआ सा लग रहा था। उन्हें सहारा देने के लिए कोई नहीं था और उनके पास खाने के लिए तक पैसे नहीं होते थे। तभी मण देसाई महिला सहकारी बैंक सामने आया, जिसने उसे ३०,००० रुपए का कर्ज दिया। हर दिन वह १० से ५० रुपए तक चुकाती है और २८,000 रुपए का कर्ज वह पहले पटा चुकी है। इस टी-स्टॉल से कुछ मीटर की दूरी पर ५५ वर्षीय कांताबाई नामक एक लोहारन रहती है, जो दिन में तकरीबन २०० हंसिया बनाती है। कांताबाई की कमाई से ही उसके १४ सदस्यीय परिवार का गुजारा होता है। कांताबाई ने तीन महीने पहले इसी बैंक से १५,००० रुपए का कर्ज लेकर अपना कारोबार शुरू किया। पिछले तीन महीनों में उसने प्रतिदिन ३० रुपए का भुगतान करते हुए अब तक तकरीबन २००० रुपए चुका दिए हैं।

विजया लांगे (३५) टेलरिंग का काम करती है। सुनीता बुहारे और मंदा पांसे साथ मिलकर बर्तन बेचती हैं। तोलन विरकार पहले वड़ा पाव बेचती थी, फिर उसने गधों की खरीदफरोख्त का काम किया और अब वह दूसरी लड़कियों के साथ मिलकर सिलार्ई का काम सीख रही है। इनमें से कुछ दूध बेचती हैं, कुछ सब्जियां बेचती हैं, तो कुछ बुनकर हैं। रचना रसल एक नकली आभूषणों की दुकान चलाती है। ऐसी १,४०,३६० महिलाएं हैं, जो इस तरह के छोटे-मोटे रोजगार करती हैं। मण देसाई महिला सहकारी बैंक ने छह लाख रुपए की शुरुआती पूंजी के साथ अपना कामकाज महाराष्ट्र के सतारा जिले में स्थित म्हासवाड से शुरू किया। आज इसकी पूंजी सवा दो करोड़ रुपए तक पहुंच चुकी है और इसका कारोबार सतारा जिले के अलावा सांगली, रायगढ़, रत्नागिरि, पुणे और कोल्हापुर जैसे जिलों तक फैल गया है। इस बैंक में कर्ज अदायगी की दर ९८ फीसदी है।

आर्थिक रूप से सक्षम ये महिलाएं इन जिलों में फैमिली डायनामिक्स को बदल रही हैं। यद्यपि महिलाएं तमाम क्षेत्रों में काम करते हुए अपने पतियों की मदद करती रहती थीं, लेकिन वित्तीय मामलों में वे कभी नहीं बोलती थीं। धीरे-धीरे ये महिलाएं न सिर्फ परिवार में, बल्कि समाज में नया पावर सेंटर बनती जा रही हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि अब अपना उत्पाद बेचने आए सेल्सकर्मियों को इन महिलाओं से ही निपटना पड़ता है। वे उनका काम पूरा होने तक इंतजार करते हैं और उन्हें स्टोव, बर्तन, कपड़े, खाना पकाने का कच्चा माल इत्यादि बेचने की कोशिश करते हैं।

अब सतारा में कहानी ने एक नया मोड़ लिया है। स्विट्जरलैंड और जर्मनी से आए एंथ्रोपोलॉजी के कुछ विद्यार्थी फरवरी से यहां डेरा डाले हुए हैं और इन महिलाओं की सफलता की गाथा को समझने की कोशिश कर रहे हैं। स्विट्जरलैंड की केरॉल वेगनर(२४), मुंबई की चेतना राठौर(२३) और जर्मनी के क्रिस्टोफर रियुस(२४) तथा दिना युनुस (२५) महिला बैंकों पर अपने डॉक्टरेट प्रोग्राम के लिए इस तरह की गाथाओं को रिकॉर्ड कर रहे हैं।

मैनेजमेंट फंडा एन. रघुरामन

फंडा यह है कि... raghu@bhaskarnet.com

अगली बार आप ग्रामीण बाजार में कोई चीज बेचने जाएं, तो आपको पता होना चाहिए कि किससे बात करनी है। आपका वास्ता ग्रामीण महिलाओं से पड़ेगा क्योंकि उन्होंने वित्तीय प्रबंधन का जिम्मा अपने हाथ में ले लिया है। उन्हें देखकर लगता है कि ग्रामीण घरों में शक्ति केंद्र बदल रहा है।
 
 
 

आपके विचार
 
 
कोड:
1 + 2

 
Ad Link
विज्ञापन
विज्ञापन
 
 
 
 
Sabse Bada Match Fixer Contest
 
 

बड़ी खबरें

रोचक खबरें

विज्ञापन

बॉलीवुड

जीवन मंत्र

क्रिकेट

बिज़नेस

जोक्स

पसंदीदा खबरें

Email Print Comment
Email Print Comment