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अटकलें लगाने से बेहतर है पूछ लें

एन. रघुरामन | Jul 13, 2012, 09:29AM IST
 
 

मुझे रुखसाना से पहली नजर में प्यार हो गया। वह मुझे पूर्वी जॉर्जिया में खाकेती नामक जगह पर घने जंगलों के बीच एक होटल में मिली थी। वहां मैं अपनी हालिया यात्रा के दौरान अपने दो दोस्तों अनिल धारकर व हरपाल सिंह सोखी के साथ ठहरा था। अनिल धारकर वरिष्ठ पत्रकार हैं और हरपाल सिंह टीवी कुकरी सीरियल 'नमक शमक' के एंकर व मशहूर शेफ हैं। रुखसाना दरअसल दस महीने का एक प्यारा-सा फरदार डॉगी है, जो तुर्की से आया था। एक दिन मैं उसके साथ लॉन में खेल रहा था, तभी एक भारतीय शख्स, जो उसी होटल में ठहरा हुआ था, मेरे पास आया और उसका नाम पूछने लगा।

मैंने उसे बताया कि इसका नाम 'रुखसाना' है। 'ओह', उसने इस तरह जाहिर किया, जैसे वह कुत्ते के नामकरण के बारे में सब कुछ जानता हो। वह बोला, 'नाम सुनकर लगता है कि यह जरूर मध्य प्रदेश से है।' मैंने उसे सुझाव दिया कि इसके बारे में वह डॉगी के मालिक से पूछे तो बेहतर रहेगा। उसका मालिक होटल का मैनेजर था, जो खुद जॉर्जियन था, लेकिन उसकी पत्नी तुर्की से थी। जब मैनेजर ने भी डॉगी का नाम 'रुखसाना' बताया, तो उस शख्स ने पुन: अपना ज्ञान बघारते हुए जवाब दिया, 'वैल, यस! जैसा मैं सोच रहा था कि इसका नाम जॉर्जियन से ज्यादा इराकी लगता है।' यह सुनकर मैनेजर ने उसकी बात में सुधार करते हुए कहा, 'नहीं सर, यह तुर्की से है और इसे मेरी बीवी को उसकी बहन ने गिफ्ट किया था।' इससे उसके सर्वज्ञाता होने का मुखौटा उतर गया और वह चुपचाप वहां से खिसक लिया।

मेक्सिकन लेखक मिगेल एंजेल रुइज ने कहा था, 'अटकलें न लगाएं। सवाल पूछने की हिम्मत जुटाएं और सामने वाले को बताएं कि वास्तव में आप क्या चाहते हैं। गलतफहमियों से बचने के लिए दूसरों के साथ संवाद करें।' होटल में मिला वह शख्स इसकी बेहतरीन मिसाल था कि हमारा दिमाग किस तेजी से अटकलें लगाने लगता है और जानकारियों को अपने अंदर आने और इसके बाद उपलब्ध तमाम जानकारी का अपनी मेधा की मदद से विश्लेषण करने से रोकता है। अटकलें या कल्पनाएं दरअसल सर्वज्ञता का भ्रमजाल बुनती हैं, जिससे आगे चलकर आपको शर्मिंदगी झेलनी पड़ सकती है। उस शख्स ने दो अटकलें लगाईं। पहली, जब एक भारतीय (जो मैं था) ने जब उसे डॉगी का नाम बताया, तो उसने सोचा कि मैं भारतीय नस्ल के अलावा किसी और तरह का नाम सोच ही नहीं सकता, लेकिन जब एक जॉर्जियन ने वही नाम बताया, तो उसे लगा कि वह इराकी नाम के अलावा कुछ नहीं सोच सकता। लेकिन सच सामने आने पर वह शर्मिंदा होकर रह गया। उसके बाद उस पर 'सर्वज्ञाता' का ठप्पा लग गया, जो, दुर्भाग्य से उसकी प्रतिष्ठा धूमिल करने वाला था।

मैं ऐसे कई लोगों को जानता हूं, जिन्होंने मुझसे कहा, 'मैं जानता हूं कि तुम्हारे दिमाग में क्या चल रहा है।' यह सुनकर मैं दंग रह जाता हूं। यदि आपको लगता है कि आप यह जानते हैं कि दूसरे के दिमाग में क्या चल रहा है, तो एक बार फिर सोचें। यूं तो यह यह आत्म-रक्षा की बेहतरीन प्रणाली है, लेकिन वास्तव में संवाद का कोई विकल्प नहीं है। ऐसा न करने से किसी से आपके रिश्ते हमेशा से लिए बिगड़ सकते हैं।

मैनेजमेंट फंडा एन. रघुरामन

फंडा यह है कि... raghu@bhaskarnet.com

कुछ जानने और अपनी समझदारी साबित करने का सर्वोत्तम तरीका यही है कि किसी के बारे में अटकलें न लगाएं। ऐसा करने से आपके गलत होने की काफी संभावनाएं होती हैं, जिससे आखिरकार आपकी प्रतिष्ठा धूमिल होगी। स्मार्ट सोच अपनाएं और स्मार्ट सोच यही कहती है कि 'पूछ लें।' यही काफी है।
 
 
 

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