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बहुत कुछ अच्छा भी हो रहा है इस देश में

एन. रघुरामन | Jul 28, 2012, 11:22AM IST
 
 

इस देश में बहुत कुछ अच्छा हो रहा है। ऐसे में 'इसका कुछ नहीं हो सकता' वाले रवैए से बचना होगा। बहुत कुछ हो सकता है, बहुत लोग कुछ अच्छा कर भी रहे हैं। जरूरत सिर्फ अपनी भूमिका ईमानदारी से निभाने की है। गांधीजी ने भी कहा था बदलाव की बयार पहले हमारे अपने घर से शुरू होती है।


पिछले हफ्ते स्टूडेंट एक्सचेंज प्रोग्राम के तहत भारत आए कुछ विदेशी छात्रों से मिलना हुआ। उनके साथ हम कुछ दोस्त एक चैनल देख रहे थे। उस पर 'कॉकटेल' फिल्म में दीपिका पादुकोण के पात्र और उसके द्वारा पहनी गई पोशाकों पर 'सारगर्भित' चर्चा चल रही थी। हमारे मेजबान ने चैनल बदला, तो सामने था एक बम धमाके का वीभत्स फुटेज और एक अपराधी का विस्तृत 'एक्सक्लूसिव' इंटरव्यू। कुछ देर बाद मैंने उन विदेशी छात्रों से पूछा कि वे भारत के बारे में क्या सोचते हैं। उनके जवाब को यहां हूबहू प्रस्तुत कर रहा हूं। उनका कहना था, 'टीवी देखने के बाद लगता है कि भारत में चोर-उचक्के, हत्यारे, आतंकी, बलात्कारी, नैतिकता के स्वयंभू झंडाबरदार, भ्रष्ट नेता ही भरे हुए हैं। ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है, जो किसी विषय पर अपनी आवेशपूर्ण प्रतिक्रिया को तर्कसंगत ठहराने में पीछे नहीं रहते।'

यह सुनते ही दिमाग में सवाल कौंधा, 'क्या इसी भारत को हम विश्व की महाशक्ति बनाने का ख्वाब देख रहे हैं?' ध्यान रखें कि इस देश की आधी से अधिक आबादी 25 साल से कम उम्र की है। मैं उनके पास बैठ गया और उन्हें भारत में आकार लेने वाली अच्छी घटनाओं के बारे में बताने लगा। मैंने उन्हें बताया कि भारत साधारण इंसान के असाधारण कारनामों से रचा-बसा देश है। मसलन पुणे का एक टेक्नीशियन खाली समय में पहाड़ी को बचाने के लिए वृक्षारोपण अभियान में जुट जाता है, तो एक सत्तर वर्षीय कृशकाय महिला ने अपने घर के दरवाजे आवारा कुत्तों को आश्रय देने के लिए खोल रखे हैं।

मैंने उन्हें बताया कि जानलेवा कैंसर के कारण अपने 19 वर्षीय बेटे को गंवाने वाले एक शख्स ने इंश्योरेंस में मिले धन से निराश्रित बच्चों के लिए घर बनाया है। एक 75 साल के सेवानिवृत्त वैज्ञानिक कहीं भी आने-जाने के लिए साइकिल का इस्तेमाल करते हैं। एक महिला अपने नौकरों के बच्चों को नि:शुल्क संगीत सिखाती है। इस देश में ऐसे युवा प्रोफेशनल्स भी बसते हैं, जिन्होंने अपनी सोसायटी के चौकीदार के बच्चों की शिक्षा का जिम्मा उठाया हुआ है। मेरी घरेलू नौकरानी और उसके चौकीदार पति जैसे लोग इस देश में बसते हैं, जो पाई-पाई जोड़कर अपने बच्चों को कॉलेज में पढ़ा रहे हैं। वह भी बगैर किसी बाहरी मदद या शिकायत के। भारत साधारण लोगों से बना है, जो किसी अजनबी के साथ अपनी रूखी-सूखी रोटी बांटने में नहीं हिचकते। इतने उदाहरणों के साथ मैंने उन्हें गर्व के साथ बताया, 'ऐसा है हमारा भारत, जो हमारे चारों और रचा-बसा हुआ है। यह वह देश है, जहां जीवन में भले ही कितनी चुनौतियां सामने क्यों न हों, लेकिन लोग खुशी मनाने का कोई मौका हाथ से जाने नहीं देते।'

इस वार्तालाप के खत्म होने के साथ ही मैंने मन ही मन एक निश्चय किया कि कभी-कभी हमें इस दूसरे भारत को लेकर भी खुशी मनानी चाहिए। ऐसे भारत की, जहां बुराई पर अच्छाई की जीत होती है। जहां जिंदगी का मतलब सिर्फ शिकायतें करना नहीं। हमें इस भारत के दर्शन अपने बच्चों को कराने चाहिए। इसके बाद वे जब बड़े होंगे, तो उनके मन में भी आशा का समंदर हिलोरे ले रहा होगा। इस आशा के साथ ही उनके मन में कहीं भीतर खुशी भी अठखेलियां कर रही होगी।

raghu@dainikbhaskargroup.com

मैनेजमेंट फंडा एन. रघुरामन
 
 
 

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