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अनूठी सोच अपनाते हुए निपटाएं समस्या

एन. रघुरामन | Aug 08, 2012, 09:46AM IST
 
 

पहली स्टोरी : जब आपके इलाके में मच्छरों की समस्या गहराने लगती है, तो अमूमन आप क्या करते हैं? आप मच्छर-रोधी रसायनों का छिड़काव कर सकते हैं, घर में चारों ओर मच्छर-जाली लगवा सकते हैं या ज्यादा हुआ तो नगर निगम में फोन कर इलाके की तमाम गलियों में धुआं छोडऩे के लिए कह सकते हैं। हालांकि कुछ लोग इसके समाधान का विशुद्ध प्राकृतिक तरीका अपनाते हैं। दरअसल विले पार्ले, मुंबई के एक उपनगरीय इलाके में, जब भी मच्छरों की समस्या बढऩे लगती है, तो यहां के लोग शैलेंद्र इंदुलकर के पास पहुंचते हैं, जो उन्हें एक 'दवाई' देते हैं। शैलेंद्र 'गुप्पी' या पोएसिलिया रेटिकुलेट मछली की ब्रीडिंग करते हैं, जो मच्छरों के लार्वा को खाती है। इस तरह संबंधित इलाके में मच्छरों पर लगाम लग जाती है। वह ऐसा पिछले बीस साल से कर रहे हैं। उन्होंने दो दशक पहले फिशरीज मैनेजमेंट में कोर्स किया था और वह मछलियों का अचार बनाते हुए आजीविका कमाते हैं। जब कभी मच्छरों की समस्या गहराने लगती है तो इस महानगर में स्थित देश का सबसे धनी नगर निगम भी उनसे इन 'गुप्पियों' को लेकर जलीय निकायों में डालता है।

दूसरी स्टोरी : ज्यादातर बच्चे यही चाहते हैं कि उनके जन्मदिन को धूमधाम से मनाया जाए, जिसमें उन्हें खूब सारे गिफ्ट्स मिलें और वे भी दूसरों को रिटर्न गिफ्ट दें। लेकिन ८ से ११ साल के तकरीबन १३० बच्चे ऐसे भी हैं, जो अपना जन्मदिन बिल्कुल अलग तरह से मनाते हैं। इन बच्चों ने बालशिक्षा की दिशा में काम करने वाले एक गैर-लाभकारी संगठन के लिए पैसा इकट्ठा करने की खातिर शेयरमाईकेक डॉट ऑर्ग के साथ साइन-अप किया है। जन्मदिन जैसे अवसर पर ये बच्चे अपने दोस्त-यारों व संबंधियों से संपर्क साधते हुए उन्हें गिफ्ट खरीदने के बजाय नकद धनराशि दान देने के लिए प्रेरित करते हैं। इन बच्चों ने यह भी महसूस किया कि ज्यादातर गिफ्ट्स यूं ही पड़े रह जाते हैं, जबकि इस तरह प्राप्त धनराशि का जरूरतमंद बच्चों का स्तर सुधारने में कहीं बेहतर इस्तेमाल हो सकता है। उनके अंशदान से देश के सभी गरीब बच्चे तो शिक्षित नहीं हो जाएंगे, लेकिन यह एक नेक काज के लिए बेहतर शुरुआत तो है ही।

तीसरी स्टोरी : २७ से ५८ वर्ष की 21 महिलाओं (जो ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं हैं) ने साथ मिलकर एक महिला कार्यकारी समिति का गठन किया है, जो मुंबई में धारावी जैसे विशाल झुग्गी-बस्ती इलाके में स्थित ८५० घरों के पुनर्विकास कार्यों की निगरानी करेगी। पिछले चार दशकों में पुरुष भी यह काम नहीं कर पाए हैं। जगह की कमी, प्राइवेसी की कमी और खुले गटर के आसपास खेलते बीमार बच्चों के साथ यह महिलाएं ही हैं जो इन समस्याओं के आघात को सबसे ज्यादा झेलती हैं। चूंकि यहां के पुरुष इसका कोई सफल निदान नहीं तलाश पाए, लिहाजा ये महिलाएं आगे आईं और उन्होंने संबंधित पार्टियों से बातचीत करनी शुरू की। इन झुग्गियों में ऐसे भी युवा हैं, जो यहीं पले-बढ़े और एमबीबीएस व बीई जैसी डिग्रियां हासिल करने के बावजूद यहां से नहीं निकल सकते, क्योंकि महानगर में रीयल एस्टेट की कीमतें आसमान छू रही हैं। इन मांओं से अपने इन युवा बच्चों की समस्या देखी नहीं गई और उन्होंने साथ मिलकर इस दिशा में कुछ करने की ठान ली। उन्होंने एक महिला वकील को भी नियुक्त किया है, जो उनके कानूनी दस्तावेजों का जिम्मा संभालेगी।

मैनेजमेंट फंडा एन. रघुरामन

फंडा यह है कि... raghu@dainikbhaskargroup.com

समानांतर सोच किसी भी मुश्किल समस्या के समाधान की राह प्रशस्त करती है। भेड़चाल की तरह पुरातन सोच को अपनाने के बजाय समस्या पर नए ढंग से गौर करना हमेशा श्रेयस्कर होता है, ताकि उसका कुछ अनूठा समाधान मिल सके।
 
 
 

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