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बच्चों की परवरिश में लें अहिंसा का सहारा

एन. रघुरामन | Aug 11, 2012, 12:43PM IST
 
 

महात्मा गांधी के पौत्र और गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ नॉन वॉयलेंस के संस्थापक डॉ. अरुण गांधी ने प्यूर्टोरिको विश्वविद्यालय में दिए एक व्याख्यान में बच्चों के पालन-पोषण में अहिंसा के योगदान को रेखांकित किया है। इस किस्से को उन्हीं के शब्दों में पेश किया जा रहा है।

एक दिन मेरे पिता ने मुझे कार से शहर छोड़कर आने को कहा। वहां उन्हें एक कांफ्रेंस में शिरकत करनी थी। जब मैंने उन्हें कार्यक्रम स्थल पर छोड़ा, तो वे मुझसे बोले, 'शाम को पांच बजे आ जाना। हम साथ घर चलेंगे।' मैंने अपने काम निपटाए और उसके बाद पास के एक सिनेमाघर में फिल्म देखने चला गया। वहां जॉन वेन की फिल्म लगी थी। फिल्म देखने में मैं इतना रम गया कि मुझे समय का होश नहीं रहा। साढ़े पांच बजे मुझे पिताजी को लेने की याद आई। मैं फिल्म छोड़कर भागा और पार्किंग से कार निकालकर जब तक उनके पास पहुंचा शाम के छह बज चुके थे। वह मेरा बेसब्री से इंतजार कर रहे थे। मुझे देखते ही उन्होंने बेहद चिंतित स्वर में पूछा, 'कहां रह गए थे?' मुझे सच्चाई बताने में शर्म आ रही थी, सो मैंने बोल दिया कि कार खराब हो गई थी, उसे ठीक करा रहा था। मुझे इस बात का कतई अहसास नहीं था कि पिताजी गैराज में फोन कर पहले ही मेरे बारे में पूछताछ कर चुके हैं।

मुझे झूठ बोलता देख वह बोले, 'मेरी ओर से तुम्हारी परवरिश में जरूर कोई कमी रह गई है, जो तुम मुझसे सच नहीं कह पा रहे हो। मुझसे कहां चूक हुई, इस पर सोच-विचार करने के लिए मैं 18 मील पैदल चलकर घर जाऊंगा।' इतना कहकर वे उबड़-खाबड़ रास्ते पर पैदल ही चल पड़े। मैं उन्हें छोड़कर भी नहीं जा सकता था, सो मैं भी उनके पीछे-पीछे कार को धीमी गति से लेकर चल पड़ा। मुझे बार-बार अपने पर ग्लानि हो रही थी कि महज एक झूठ के कारण मेरे पिता को इस कदर मानसिक संताप से गुजरना पड़ रहा है। इसके बाद मैंने प्रण कर लिया कि अब जिंदगी में कभी भी झूठ नहीं बोलूंगा। आज भी मैं जब उस किस्से को याद करता हूं और सोचता हूं कि यदि उन्होंने मुझे वैसे ही सजा दी होती, जैसी आजकल के अभिभावक अपने बच्चों को देते हैं, तो क्या मैं झूठ नहीं बोलने का सबक सीख पाता? मुझे नहीं लगता कि ऐसा होता। मुझे अगर सजा मिली होती तो मैं शायद उसकी प्रतिक्रिया स्वरूप बार-बार झूठ बोलता। लेकिन उस एक अहिंसक अस्त्र ने मुझे गहरे तक झकझोर कर रख दिया। वह इतनी प्रभावी सजा थी कि मुझे लगता है कि जैसे वह कल की ही बात हो। अहिंसा की ताकत इससे समझी जा सकती है।

आक्रामक व्यवहार की प्रतिक्रिया होती है। घर के नियम-कायदे तोडऩे जैसी बातें बच्चों से आवेश में होती हैं। इसके बदले अगर उनसे आक्रामक व्यवहार किया जाएगा, तो प्रतिक्रिया स्वरूप हिंसा और बढ़ेगी। समाज शास्त्रियों का मानना है कि नैतिक मूल्यों की कमी, पारिवारिक मूल्यों का विघटन और एकल परिवार से बच्चों में पनपने वाला अकेलापन ही आक्रामकता के लिए जिम्मेदार है। अक्सर अभिभावक बच्चों की गलती पर उन्हें मारते-पीटते हैं। कुछ बच्चों की गलती पर खुद खाने-पीने से इंकार कर अपने को सजा देते हैं। स्वामी सुखबोधानंद के मुताबिक यह भी एक प्रकार की हिंसा है। इससे हमें बचना चाहिए और बच्चों के प्रति ऐसा रवैया अपनाना चाहिए कि उन्हें खुद ही अपनी गलती का अहसास हो, ताकि भविष्य में वे उसे दोहराने से बच सकें।

मैनेजमेंट फंडा एन. रघुरामन

फंडा यह है कि...

कुछ मौकों पर आप बतौर अभिभावक अपने बच्चों में अनुशासन की समझ अहिंसा के जरिए ही विकसित कर सकते हैं। raghu@dainikbhaskargroup.com
 
 
 

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