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परोपकार सिर्फ पैसों से ही नहीं होता

एन. रघुरामन | Aug 13, 2012, 09:37AM IST
 
 

दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करने के लिए कचरा बीनने वाले किसी शख्स से आप किसी तरह की समाज सेवा या दान-धर्म की उम्मीद कैसे कर सकते हैं? आखिर उसे कूड़ेदान में मिलता भी क्या होगा? लेकिन चीनी समाचारपत्र यंझाओ मेट्रो डेली के मुताबिक 88 वर्षीय लोउ जियाओइंग पिछले चार दशक से जिन्हुआ की सड़कों पर कचरा बीनती आ रही है और उसने इस दौरान कचरे में फेंके गए 30 से अधिक बच्चों को बचाया है। अपने पति की मदद से लोउ ने कचरे के ढेर से उठाए गए बच्चों में से छह की परवरिश खुद की, जबकि शेष को उसके परिचितों और रिश्तेदारों ने पाला। 17 साल पहले लोउ के पति का देहांत हो चुका है।

लोउ फिलहाल हार्ट और किडनी संबंधी समस्या से जूझ रही है। हालांकि उसने जिस काम को इतने लंबे समय से चुपचाप अपने बल पर अंजाम दिया, अब न सिर्फ उसे पहचान मिल रही है, बल्कि मदद को सैकड़ों हाथ भी बढ़ रहे हैं। लावारिस नवजात बच्चों को बचाने के सिलसिले की शुरुआत को याद करते हुए लोउ बताती है, '1972 में पहली बार मुझे एक बच्ची कचरे के ढेर में मिली। अगर हमने उसे वहां से न उठाया होता, तो वह मर जाती। उसे बड़े होते देखने का अनुभव बहुत सुखद रहा। हमने सोचा कि यदि हम कचरा बीनकर उसे रिसाइकिल करने के लिए बेच सकते हैं, तो उसी ढेर से किसी जीवन को बचा भी सकते हैं।' लोउ की अपनी भी एक बेटी है। इसके बावजूद उसने 82 साल की उम्र में बतौर छठी संतान एक लड़के को कचरे के ढेर से उठाकर अपनाया। इस पर वह कहती है, 'अब उम्र भी साथ छोड़ रही है, लेकिन मैं उस नन्हे फरिश्ते को कचरे के ढेर में मरने के लिए नहीं छोड़ सकती थी।' अब यह लड़का सात साल का हो चुका है, जिस लोउ और अन्य लोग क्लिंग के नाम से पुकारते हैं।

लोउ द्वारा कचरे से उठाई बच्चियों में से एक झैंग जुजू अब 33 वर्ष की हो चुकी है। झैंग के मुताबिक जबर्दस्त गरीबी के बावजूद लोउ ने अपने गोद लिए हुए बच्चों को हरसंभव अच्छी जिंदगी देने की कोशिश की। झैंग ने यह भी बताया कि बच्चों का पेट भरने के लिए लोउ दिन भर में दो-तीन बार कचरा बीनने जाती थी। बीमार पडऩे के बावजूद लोउ की यह दिनचर्या अप्रभावित ही रही, जब तक उसने बिस्तर नहीं पकड़ लिया।

चीन की सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ के मुताबिक गंभीर रूप से बीमार पडऩे के बावजूद लोउ अब भी अपने गोद लिए हुए बच्चों के बारे में ही सोचती है। बीमारी के फेर में लोउ अब बोलने और हिलने-डुलने में लगभग असमर्थ हो चुकी है। एजेंसी के मुताबिक इस स्थिति पर लोउ कहती है, 'मेरे पास अब ज्यादा दिन नहीं बचे हैं, लेकिन मैं क्लिंग को स्कूल जाते हुए देखना चाहती हूं। इसकी वजह है कि इस तरह मुझे मरने के बाद क्लिंग को लेकर किसी तरह का कोई पछतावा नहीं रहेगा।' गौरतलब है कि लोउ अपने तीन बड़े बच्चों को स्कूल नहीं भेज सकी। हालांकि झैंग और एक अन्य गोद ली हुई लड़की को उसने जूनियर हाईस्कूल तक शिक्षा दिलाई। लोउ की इस संवेदनशीलता ने उसे चीन में नायिका सरीखा दर्जा दिलाया है। यहां तक कि अब उसके द्वारा शुरू किए गए इस मिशन को पूरा करने के लिए मदद के हाथ भी बढऩे शुरू हो गए हैं। लोउ के उपचार के लिए भी ऑनलाइन आर्थिक मदद जुटाई जा रही है।

मैनेजमेंट फंडा एन. रघुरामन

फंडा यह है कि... raghu@dainikbhaskargroup.com

संतुष्टि रूपी समृद्धि के कई स्तर हैं। कचरा बीनने वाली लोउ हमसे कहीं ज्यादा समृद्ध है। उसने 30 लावारिस बच्चों को परवरिश देकर उन्हें नया जीवन दिया है। अन्यथा कचरे के ढेर में पड़े रहते हुए वे बच्चे कब के मर-खप गए होते।
 
 
 

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