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सिलवटों वाली पैकिंग में होते हैं यादगार तोहफे

एन. रघुरामन | Aug 17, 2012, 09:44AM IST
 
 

पिछले माह मुंबई की उपनगरीय पश्चिमी रेलसेवा के मोटरमैन हड़ताल पर चले गए। इस कारण लाखों लोग अपने-अपने गंतव्य तक पहुंचने के लिए सड़कों पर उतर आए। गंभीरता को भांपते हुए स्थानीय एफएम रेडियो चैनलों ने कार मालिकों से यहां-वहां फंसे लोगों की मदद के लिए गुहार लगाई। आदर्श नागरिक की जिम्मेदारी को समझते हुए लोगों ने अपने फोन नंबर एफएम चैनलों को प्रेषित कर दिए। इनमें से मैं भी एक था। कुछ देर बाद मेरे पास एक एसएमएस आया, जिसमें बताया गया पता कोलाबा में एक बिल्डिंग का था। वहां रहने वाली महिला को बांद्रा जाना था और इस रास्ते के बीच पडऩे वाले पवई में ही मेरा घर है। मैं उस महिला को ले जाने के लिए सहर्ष तैयार हो गया।

मैं कोलाबा में बताए गए पते पर पहुंचा और एक फ्लैट की कॉलबैल बजाई। भीतर से बेहद क्षीण सी आवाज आई और कई मिनटों बाद दरवाजा खुला। मेरे सामने ठिगने कद की अस्सी के वय की महिला खड़ी थी, जिसने सत्तर के दशक की हिंदी फिल्मों की तर्ज पर प्रिंटेड साड़ी पहन रखी थी। उसके पास ही एक छोटा सूटकेस रखा था। ऐसा लगता था कि उस अपार्टमेंट में कोई रहता नहीं है। सारा फर्नीचर सफेद चादर से ढंका हुआ था। कोने में एक बॉक्स जरूर रखा था, जिसमें ढेर सारी फोटो भरी हुई थीं।

उस महिला ने मुझसे पूछा, 'क्या तुम मेरा सूटकेस उठा सकते हो?' मैंने एक हाथ में सूटकेस पकड़ लिया। उसने मेरा दूसरा हाथ थामा और हम सधे कदमों से कार की तरफ बढ़ लिए। वह मुझे बारंबार धन्यवाद दे रही थी। मैंने विनम्रता से कहा, 'ऐसा कुछ नहीं है। मैं बस मुंबईकर होने के नाते मदद की कोशिश कर रहा हूं।' इस पर उन्होंने कहा, 'तुम बेहद अच्छे हो।' कार में बैठने के बाद उन्होंने मुझे एक पर्ची दी और बोलीं, 'क्या तुम इन सड़कों से होते हुए चल सकते हो।' मैंने पर्ची देखने के बाद कहा कि ये शॉर्टकट तो नहीं है। वह बोलीं, 'जानती हूं, लेकिन पता नहीं फिर मैं दोबारा इन्हें देख पाऊंगी या नहीं?' मैंने रियर व्यू मिरर में उनकी आंखों में उतर आई नमी को देखा। वह फिर बोलीं, 'मेरे परिवार में कोई नहीं बचा है। डॉक्टरों ने भी कह दिया है कि मैं ज्यादा वक्त की मेहमान नहीं हूं।'

अब कुछ कहने-सुनने को नहीं बचा था। मैं उनके बताए रास्तों पर कार ड्राइव करने लगा। चार घंटे के इस सफर में वह मुझे हर जगह से जुड़ी यादों के बारे में बताती रहीं। अंतत: हम उनके गंतव्य तक पहुंचे, जो वास्तव में एक वृद्धाश्रम था। वहां इंतजार कर रहे कुछ लोगों ने उन्हें कार से उतार कर व्हील चेयर में बैठाया। वह मुझसे बोली, 'मैं तुम्हारी बहुत आभारी हूं बेटा।' पता नहीं क्यों यह सुनते ही मैंने झुकते हुए उन्हें अपनी बांहों में भरा। उन्होंने मुझे लगभग अपनी बांहों में भींचते हुए कहा, 'तुमने एक बूढ़ी औरत को कुछ पल बेशकीमती खुशी के दिए हैं। धन्यवाद।'

एक बार लगा कि मुझे उनसे अपने घर पर डिनर के लिए कहना चाहिए। फिर संकोचवश चुप रहा और उनके बारे में सोचता हुआ घर लौट आया। लेकिन कल मेरी नजर अखबार के श्रद्धांजलि वाले कॉलम पर पड़ी, जिसमें उनके निधन की सूचना के साथ उनका फोटो छपा था। यह देख मैंने गुस्से के साथ अखबार को मसलकर फेंक दिया। मैं वह पूरा घटनाक्रम याद करने लगा। उनकी झुर्रीदार त्वचा को याद करते हुए मुझे लगा कि जीवन के कुछ बेहतरीन पल सिलवटों के साथ भी आते हैं।

मैनेजमेंट फंडा एन. रघुरामन

फंडा यह है कि... raghu@dainikbhaskargroup.com

हमारे जीवन में अनजाने में और अचानक ही कुछ बेहतरीन पल आते हैं। दूसरों के लिए भले ही वह छोटी बात हो, लेकिन वह हमें जिंदगी भर की याद दे जाते हैं। दुर्भाग्य से हम अपनी जिंदगी को बड़ी घटनाओं के कारण ही याद रखते हैं। हकीकत में ऐसा है नहीं।
 
 
 

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