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बेहतर प्रबंधन के लिए सही फीडबैक है जरूरी

एन. रघुरामन | Aug 22, 2012, 09:33AM IST
 
 

लगभग दस साल पहले एक पुलिस कर्मी आयुर्वेद के डॉक्टर वशिष्ठ सुनील के पास पहुंचा। वह डॉक्टर से बोला, 'डॉक्टर साहब, मेरे पिताजी 80 साल के रिटायर्ड शख्स हैं। वे पिछले 13 साल से हिचकी की समस्या से जूझ रहे हैं। क्या आपके पास इसके लिए कोई दवा है?' यह सुनने के बाद डॉक्टर बोला, 'आपके पिताजी हैं कहां?' पुलिस कर्मी बोला, 'घर पर।' इस पर डॉक्टर ने कहा, 'उन्हें क्लीनिक लेकर आइए। उनकी अच्छे से जांच के बाद ही मैं कोई दवा दे सकूंगा।' यह सुनने के बावजूद वह लक्षणों के आधार पर दवा देने की जिद पर अड़ा रहा। उसका कहना था कि उसकी ड्यूटी 'बंदोबस्त' में लगी है और वह बाद में अपने पिता को क्लीनिक ले आएगा। अंतत: डॉक्टर ने उसे 250 मिग्रा के दस कैप्सूल (यहां दवा का नाम नहीं दे रहे हैं, क्योंकि इस स्तंभ के जरिए हम किसी खास दवा का प्रचार नहीं करना चाहते) दिए और कहा कि इसे वह अपने पिताजी को दिन में तीन बार खिलाए। दवा लेकर पुलिस कर्मी चला गया और दोबारा लौटकर नहीं आया।

इस घटना के लगभग पांच साल बाद उसी डॉक्टर के क्लीनिक पर दो अन्य लोग पहुंचे। वे भी किसी शख्स के लिए हिचकी की दवा मांग रहे थे, जिसे लगभग पंद्रह दिन पहले हिचकियों का जबर्दस्त दौरा पड़ा था। वह शख्स शहर के एक नर्सिंग होम में भर्ती था। उनकी बात सुनने के बाद डॉक्टर बोला, 'जब तक मैं मरीज का मुआयना नहीं कर लेता, मैं आपको दवा नहीं दे सकता हूं।' इस पर वह दोनों एक साथ बोले, 'लेकिन कुछ साल पहले आपने महज तीन दिन की खुराक देकर 13 साल से हिचकी की समस्या से पीडि़त एक शख्स का इलाज किया था। वह मरीज एक पुलिस कर्मी का पिता था, इसलिए आपने बगैर देखे दवा दे दी थी।' यह सुनते ही डॉक्टर को पांच साल पहले का घटनाक्रम याद आ गया। उसने उनसे पूछा, 'आपको इसकी जानकारी कैसे है?' जवाब में उन्होंने कहा, 'उसने ही हमें आपके पास भेजा है।' अब डॉक्टर ने उन्हें भी दवा दे दी।

इसका बाद डॉक्टर काफी देर तक उस पुलिस कर्मी के गैरजिम्मेदाराना रवैये के बारे में सोचता रहा। उसे गुस्सा आ रहा था कि आखिर वह पुलिस कर्मी यह बताने क्यों नहीं आया कि महज दस खुराक ने उसके पिता की 13 साल पुरानी हिचकी की समस्या खत्म कर दी। फिर उसे अहसास हुआ कि इस तरह की हरकत ज्यादातर लोग करते हैं। अगर उस पुलिस कर्मी ने डॉक्टर को दवा के कारगर साबित होने की जानकारी यानी फीडबैक दिया होता, तो संभव है कि डॉक्टर उसका इस्तेमाल कहीं अधिक आत्मविश्वास और पुख्तापन से करता।

दैनिक भास्कर में एक चीफ फाइनेंस ऑफीसर (सीएफओ) हैं पीजी मिश्रा। वह हमेशा जोर देकर कहते हैं कि जब कोई सूचना मांगी या दी जाती है, तो यह जिम्मेदारी उस सूचना पाने वाले की है कि वह वापस आकर सूचना देने वाले को उसके सकारात्मक या नकारात्मक प्रभाव के बारे में बताए। इस तरह किसी संवाद प्रक्रिया को तार्किक ढंग से परखा जा सकता है। इस तरह ही बीच की खामियों को दूर किया जा सकता है। मैंने व्यक्तिगत तौर पर उन्हें इस प्रक्रिया को अपनाने के लिए अपने सहयोगियों के साथ जद्दोजहद करते देखा है।

मैनेजमेंट फंडा एन. रघुरामन

फंडा यह है कि... raghu@dainikbhaskargroup.com

सूचना-प्रसारण के बेहतर प्रबंधन के लिए जरूरी है कि आपको इसके बारे में समुचित फीडबैक भी मिले। इसके बाद ही आप जान पाएंगे कि आपके द्वारा दी गई जानकारियां दूसरों तक कितने प्रभावी ढंग से पहुंच रही हैं और वे उसे किस तरीके से ले रहे हैं।
 
 
 

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