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छोटा शहर या गरीब जैसा कुछ नहीं होता

एन. रघुरामन | Aug 24, 2012, 09:31AM IST
 
 

एक छोटे गांव से आता है कपिल दवे, जिसकी शिक्षा सरकारी स्कूल में हुई। उसकी आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी, जो वह त्योहारों पर भी नए कपड़े पहन सके। उसकी पैंट पिता की रेलवे की सरकारी यूनिफॉर्म को काटकर बनाई जाती। इस कारण बचपन से ही उसमें हीनभावना आ गई थी। जैसे-जैसे वह बड़ा होता गया, उसके मन में हीनभावना और गहरे पैठ करती गई। यहां तक कि जब वह नौकरी करने लगा, तो वह उन सभी लोगों से कटा-कटा रहता जो समाज के मध्य या समृद्ध तबके से आते थे। यह तब था जब उसके सहयोगी उस जैसी शिक्षा-दीक्षा के कारण ही नौकरी में आए थे। अंतर सिर्फ शिक्षण संस्थान का था। कपिल कर्मठ और परिश्रमी था, लेकिन ऑफिस में हमेशा अपने में ही सिमटा रहता। यह देख संस्था के मानव संसाधन विभाग ने कपिल को सेल्फ कांफिडेंस डेवलपमेंट प्रोग्राम में शामिल होने के लिए भेजा।

पहले दिन सेल्फ कांफिडेंस डेवलपमेंट टीम के प्रोत्साहन पर कपिल ने अपने बारे में बताना शुरू किया, 'मेरा जन्म गरीब परिवार में हुआ। मेरी शिक्षा कान्वेंट स्कूल में नहीं हुई। मेरे बोलने का लहजा और शारीरिक हाव-भाव समृद्ध या मध्य तबके से आने वाले लोगों के सामने मुझे हीनता का अहसास कराते हैं। मुझे लगता है कि वे मुझे हेय दृष्टि से देखते हैं। कंपनी में प्रमोशन या किसी कांपटिशन आदि के दौरान मुझे इस कारण ही नुकसान उठाना पड़ता है।' यह सुनने के बाद टीम ने उसकी बातों में सुधार लाते हुए उसके आत्मविश्वास में वृद्धि के लिए काम करना शुरू किया।

टीम ने कपिल से उसकी ही पृष्ठभूमि को नए नजरिए से देखने और स्थितियों को सकारात्मक शब्दों में बयान करने को कहा। इसके मुताबिक, 'मैं सौभाग्यशाली हूं कि मेरा जन्म साधारण परिवार में हुआ, जहां पैसा पानी की तरह नहीं बहता था। पानी तो दूर की बात है, पैसा प्रसाद के रूप में भी हमें प्राप्त नहीं होता था। इस पृष्ठभूमि के कारण मुझे जो अनूठे अनुभव हुए, वह समृद्ध तबके के परिवार में जन्मे बच्चों को नसीब नहीं होते हैं। सही है कि इस कारण मुझमें अभिजात्य वर्ग सरीखा आचार-व्यवहार नहीं पनप सका। उनके तौर-तरीके मुझे नहीं मालूम, लेकिन अपने पेशेवर जीवन की शुरुआत के साथ मैं इन्हें भी सीख लूंगा। मैंने पाया है कि जब भी मैं अभिजात्य वर्ग के रहन-सहन या जीवनशैली से जुड़ी किसी बात के प्रति अज्ञानता प्रकाट करता हूं, तो मेरे सहयोगी तुरंत मदद को आ जाते हैं। इसकी वजह से मुझे अपनी टीम पर गर्व होता है, जो समाज के विभिन्न तबके से आए लोगों से मिलकर बनी है।'

छह माह तक कपिल ने इसके अनुरूप अपने व्यवहार व कामकाज की शैली में परिवर्तन किया। नतीजा चौंकाने वाला रहा। अब कपिल हर मीटिंग या कार्यक्रम में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेता। कुछ लोगों को लगता कि कपिल के रूप में उन्हें एक ऐसा काम करने वाला मिल गया है, जो मीटिंग्स और ऑफिस की पार्टी की तैयारियों में बगैर संकोच जुट जाता है। उधर कपिल मानता था कि इस तरह उसे अभिजात्य वर्ग से जुड़े तौर-तरीके सीखने का मौका मिल रहा है। उसके आत्मविश्वास का आलम यह रहा कि सात माह बाद ही कपिल ने वह नौकरी छोड़ एक बड़ी कंपनी ज्वाइन कर ली, जो कि दिल्ली की एक बड़ी और स्थापित होटल शृंखला है।

मैनेजमेंट फंडा एन. रघुरामन

फंडा यह है कि... raghu@dainikbhaskargroup.com

अपने को दीन-हीन नहीं मानें। किसी गरीब परिवार या गांव-देहात में जन्म लेने को अवसर की तरह लें, जो जिंदगी का अनूठा अनुभव देता है। अगर आपके पास ज्ञान है, तो अभिजात्य वर्ग की स्टाइल कुछ महीनों में सीखी जा सकती है। कभी न कहें कि आपका जन्म गरीब परिवार या किसी गांव-देहात में हुआ है।
 
 
 

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