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सच्चे मन से मांगने पर मिल ही जाती है मदद

एन. रघुरामन | Aug 25, 2012, 09:33AM IST
 
 

जून की एक सुबह काउंसलर मीशेल अर्नावेज चाहकर भी अपनी धड़कनों को काबू में नहीं रख पा रही थीं। उस दिन वह अपनी बेटी की शादी की तैयारियों में व्यस्त थीं, जो अगले दिन चालीस मील दूर स्थित चर्च में होने वाली थी। वह सोच रही थीं कि अगर उनकी आर्थिक स्थिति ठीक होती, तो वह तैयारियों को कहीं अच्छे से अंजाम दे पाती। वह स्वयं को एक जरूरतमंद के तौर पर देख रही थीं। उनके बेटे जैक का कहना था कि वह शादी के दिन सीधे चर्च पहुंचेगा और पिता से जुड़ी रस्मों को निभाएगा। जैक के पिता का देहांत कुछ साल पहले हुआ था। पैसे बचाने के लिए मीशेल ने अपने कुछ दोस्तों से मैग्नोलिया फूलों के गुच्छे मांगकर एक खूबसूरत गुलदस्ता तैयार किया था। बाकी सारी तैयारी हो चुकी थी। उनकी बेटी पेट्सी को उसकी ब्राइडमैड्स की भूमिका निभाने वाली सहेली सजाने-संवारने में मदद करने वाली थीं। अगले दिन मीशेल अपने होने वाले दामाद टिम के साथ चर्च के हॉल का जायजा लेने पहुंचीं। उनके हाथों में फूलों का गुलदस्ता था। जैसे ही मीशेल ने हॉल का दरवाजा खोला, वैसे ही तेज गर्म हवा के झोंके ने गुलदस्ते को बदरंग कर दिया। एसी खराब होने के कारण हॉल के अंदर जबर्दस्त गर्मी थी। अब अर्नावेज पसोपेश में थीं। उनके पास इतने पैसे नहीं थे कि वह नया गुलदस्ता खरीद लें। यह भी संभव नहीं था कि वह वापस चालीस मील दूर अपने गृहनगर जाकर दोस्तों से दोबारा फूल मांग गुलदस्ता तैयार करें। अकेले गुमसुम खड़ी मीशेल ने अचानक हाथ उठाकर ईश्वर से प्रार्थना की। उन्होंने कहा, 'हे ईश्वर। मैं इस शहर में किसी को नहीं जानती। कुछ ऐसा करो कि मुझे मैग्नोलिया के फूल मुफ्त में मिल जाएं।'

इसके बाद वह चर्च से निकल आसपास मैग्नोलिया के फूलों की तलाश करने लगीं। कुछ ही दूर उन्हें एक घर दिखा, जहां मैग्नोलिया के फूल लगे थे। उन्होंने दरवाजा खटखटाया और सामने आए वृद्ध शख्स से फूल देने की इल्तिजा की। वृद्ध खुशी-खुशी फूल देने को तैयार हो गया। फूल मिलने के बाद मीशेल ने उस वृद्ध से कहा, 'आप नहीं जानते कि आपने एक मां को कितनी खुशी दी है।' यह सुनकर वह वृद्ध बोला 'ऐसी बात नहीं है। आपको नहीं मालूम है कि ऐसा क्यों घटित हुआ?' मीशेल द्वारा कारण पूछने पर वह वृद्ध बोला, 'मेरी पत्नी का 67 वर्ष की उम्र में पांच दिन पहले ही निधन हुआ। इस गम के मौके पर मुझे सांत्वना देने कई नाते-रिश्तेदार आए। मेरा बेटा भी सपरिवार आया। अंतिम क्रियाकर्म के बाद एक-एक करके सभी चले गए और मैं इस घर में अकेला रह गया। आज सुबह इस अकेलेपन से उकताकर मैं लगभग रोते हुए ईश्वर से बोला कि मेरी पत्नी पिछले 16 साल से बीमार थी। इस दौरान देखभाल के लिए उसे मेरी जरूरत पड़ती थी, लेकिन उसके जाने के बाद क्या किसी को भी मेरी जरूरत नहीं रह गई है? क्या मैं किसी के काम नहीं आ सकता? तभी अचानक दरवाजे पर दस्तक हुई और मेरे सामने आप थीं और आपने मुझसे कुछ मांगा, जो मैं दे सकता था।' इसके बाद उस वृद्ध ने मीशेल से पूछा, 'क्या आप देवदूत हैं?' मीशेल के इनकार पर वह बोला, 'आपको मैग्नोलिया के फूल देते वक्त मैं सोच रहा था कि मेरी जरूरत अभी भी इस दुनिया में है। मैंने सोच लिया है कि अब मैं मैग्नोलिया के फूलों को हर जरूरतमंद को दूंगा। इसके साथ ही अपना समय ईश्वर की सेवा में लगाऊंगा, जब तक कि वह मुझे अपने पास नहीं बुला लेता।'

मैनेजमेंट फंडा एन. रघुरामन

फंडा यह है कि... raghu@dainikbhaskargroup.com

सच्चे मन से की गई प्रार्थना कभी बेकार नहीं जाती। ईश्वर किसी न किसी तरह से, किसी न किसी को भेजकर जरूरतमंद की मदद जरूर करता है।
 
 
 

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