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लगातार बढ़ाते रहें अपने ज्ञान को

एन. रघुरामन | Aug 27, 2012, 09:46AM IST
 
 

पुरानी कहानी : एक लकड़हारा लकड़ी के व्यापारी के पास काम मांगने गया। काम करने की स्थितियों समेत वेतन-भत्ते भी अच्छे थे, इस कारण लकड़हारे ने अपना सर्वश्रेष्ठ देने की ठान ली। पहले दिन लकड़हारे ने 18 पेड़ काटे। इस पर उसके मालिक ने उसे बधाई देते हुए कहा कि वह ऐसी ही मेहनत से काम करता रहे। मालिक की सराहना से प्रेरित होकर लकड़हारा अगले दिन और भी जोर-शोर से काम में जुटा, लेकिन 15 पेड़ ही काट पाया। तीसरे दिन भी वह सिर्फ दस पेड़ ही काट सका। हर गुजरते दिन के साथ उसके द्वारा काटे जाने वाले पेड़ों की संख्या कम होती जा रही थी। यह देख उसने सोचा कि उसकी ताकत कम हो रही है। यह सोच वह अपने मालिक के पास पहुंचा और क्षमा मांगते हुए पूरी बात बताई। लकड़हारे की पूरी बात सुनने के बाद मालिक ने पूछा, 'तुमने अपनी कुल्हाड़ी को आखिरी बार धार कब दी थी?' इस पर लकड़हारे ने जवाब दिया, 'मेरे पास कुल्हाड़ी को धार देने के लिए समय ही नहीं था। मैं तो लकड़ी काटने में ही व्यस्त रहा।'

नई कहानी : अगर आप 21वीं सदी के अमेरिका में रह रहे हैं, तो अधिसंख्य लोग अपनी व्यस्तता का रोना रोते मिल जाएंगे। यह प्रवृत्ति भारत में भी तेजी से पैर पसार रही है। अमेरिका में आप किसी से भी पूछिए कि कैसा चल रहा है। जवाब यही मिलेगा, 'बिजी। सो बिजी, क्रेजी बिजी।' जाहिर है कि इस शिकायती लहजे के पीछे कहीं न कहीं अपनी बड़ाई छिपी होती है।

ऐसा नहीं है कि हम इसी तरह की जिंदगी चाहते हैं। वास्तव में हम सामूहिक रूप से इस व्यस्तता को परस्पर थोपने का काम कर रहे हैं। गौर करें कि अस्पताल के आईसीयू में कोई भी लगातार शिफ्ट्स में काम नहीं करता। कोई भी अलग-अलग नौकरी के सिलसिले में दिन भर इधर-उधर भागता नहीं फिरता। ध्यान से देखें कि कौन अपनी व्यस्तता का रोना रोता है? व्यस्तता का रोना रोने वाले लोगों में से अधिसंख्य स्वयं ही इसके लिए जिम्मेदार हैं। उन्होंने अपनी मर्जी से ढेर सारी गतिविधियों में अपने को फंसा लिया है। वे अपनी महत्वाकांक्षा, चिंता और लक्ष्यों को लेकर व्यस्त हैं। वे व्यस्त रहने के लती हो चुके हैं।

मैं जितने लोगों को जानता हूं, उनमें से ज्यादातर व्यस्त हैं। वे जब कुछ काम नहीं कर रहे होते हैं, तो ग्लानि महसूस करते हैं। वे कुछ न कुछ करते रहते हैं। इसके बावजूद वे एक दिन पाते हैं कि अचानक कोई नया शख्स संस्थान में प्रवेश करता है, जो वेतन-भत्तों और पद में उनसे बड़ा होता है। इसकी वजह यह है कि उन्होंने भी अपनी 'कुल्हाड़ी' को धार नहीं दी। आशय यह है कि उन्होंने अपने काम से जुड़ी बदलती मांग के सापेक्ष अपने ज्ञान को निखारा नहीं। कुछ लोग पुराने ढर्रे पर चलते हुए तकनीक या बदलते चलन के बारे में कुछ नहीं जानते हैं। इस कारण उनकी उत्पादकता दिन पर दिन कम होती जाती है और अंतत: एक दिन वे काम के मामले में नाकाम हो जाते हैं।

मैनेजमेंट फंडा एन. रघुरामन

फंडा यह है कि... raghu@dainikbhaskargroup.com

हम अक्सर इतने व्यस्त हो जाते हैं कि ज्ञान रूपी कुल्हाड़ी को धार देने का ही हमारे पास समय नहीं होता। आज के परिदृश्य में लोग व्यस्त ज्यादा हो गए हैै। साथ ही उनकी खुशी का स्तर भी कम हुआ है। ऐसा क्यों? क्या वे स्वयं को धार देना भूल गए हैं? कठिन परिश्रम या हमेशा कुछ न कुछ करते रहने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन इस व्यस्तता में हम कहीं उन चीजों से दूरी न बना बैठे, जो हमारे जीवन में अहम है, जो हमारे ज्ञान को बढ़ाती हैं।
 
 
 

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