जज्बा ही काफी है सफलता के लिए
एन. रघुरामन
| Sep 01, 2012, 09:37AM IST

कोयंबटूर, तमिलनाडु के रहने वाले मुरुगनाथन स्कूल ड्रॉपआउट हैं। आज वह 48 साल के हंै। अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए वह 14 साल की उम्र से वैल्डिंग करते आ रहे थे। उनके हाथ में वैल्डिंग मशीन के अलावा अगर कुछ और दिखाई पड़ता था, तो वह महिलाओं द्वारा इस्तेमाल में लाई गईं गंदी सैनिटरी नैपकिन थीं। इस कारण लोग न सिर्फ उन्हें पागल कहते, बल्कि यौन रूप से कुंठित भी मानने लगे थे। इसी के चलते गांव वालों ने उनका सामाजिक बहिष्कार कर दिया। पत्नी उन्हें छोड़कर चली गई और बाद में तलाक का नोटिस भिजवा दिया। उन्होंने इस पर ध्यान दिए बगैर अपना ज्यादा समय गंदी सैनिटरी नैपकिन से जुड़ी रिसर्च को देना शुरू कर दिया। वास्तव में वह सोच रहे थे कि किस तरह ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाली गरीब तबके की महिलाओं के लिए सस्ती नैपकिन बनाई जाए।इस 'पागलपन' की खबर जब मुरुगनाथन की मां तक पहुंची, तो वे उसे देखने आईं। पति की मौत के बाद उनकी मां ने अपने तीन बच्चों की खातिर मजदूरी तक की थी। वह जब मुरुगनाथन के गैराज स्थित कारखाने पहुंची, तो उन्हें यहां-वहां फैली गंदी सैनिटरी नैपकिन दिखाई दीं। वह अब तक मुरुगनाथन से जुड़ी बातों को कोरी अफवाह ही मानती आ रही थीं, लेकिन अपनी आंखों से सब-कुछ देखने के बाद वह फूट-फूटकर रो पड़ीं। मुरुगनाथन को लानतें-मलानतें भेजने के बाद वह उनसे हर तरह से संबंध खत्म कर वापस लौट आईं।
मुरुगनाथन अकेले दम किसी तरह जिंदगी जीते हुए अपनी रिसर्च पर जुटे रहे। उन्होंने कोयंबटूर में स्थित विभिन्न टेक्सटाइल मिलों द्वारा बनाए जा रहे सूत को लेकर अपना अनुसंधान जारी रखा। अंतत: एक दिन उन्होंने अपनी सोच के मुताबिक सैनिटरी नैपकिन बनाने में सफलता प्राप्त कर ली। इसके परीक्षण के लिए उन्होंने अपनी पत्नी और बहनों से आग्रह किया, जिसे उन्होंने दो-टूक शब्दों में ठुकरा दिया। वह इलाके में स्थित मेडिकल कॉलेज की छात्राओं के पास गए, लेकिन उन्होंने भी लोक-लाज के भय से इनकार कर दिया। अंतत: मुरुगनाथन उन मेडिकल छात्राओं से बजाय कॉलेज के बस स्टैंड पर मिले, उन्हें पूरी बात बताई और परीक्षण में शामिल होने के साथ एक प्रश्नावली भरकर देने का आग्रह किया।
परीक्षण के परिणामों के आधार पर मुरुगनाथन ने एक पोर्टेबल वैल्डिंग मशीन बनाई। इस मशीन के जरिए मुरुगनाथन ने लकड़ी के गूदे से सूत तैयार किया और फिर अपने फॉर्मूले से बेहद सस्ती दर पर सैनिटरी नैपकिन तैयार की। मुरुगनाथन को अपनी इस खोज के कारण लोकप्रियता तब मिली, जब उन्होंने अपनी इस रिसर्च और उसके परिणामों को आकलन के लिए प्रोजेक्ट आईआईटी, मद्रास भेजा। यह 2005 की बात है और उसके बाद से मुरुगनाथन ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। स्थापित ब्रांड्स से जुड़ी सैनिटरी नेपकिन का निर्माण करने वाली मशीन की लागत डेढ़ करोड़ रुपए है, जबकि मुरुगनाथन द्वारा तैयार मशीन महज डेढ़ लाख रुपए में पड़ती है। वह अब तक 600 मशीनें बेच चुके हैं और प्रत्येक मशीन की बिक्री पर पांच फीसदी कमीशन लेते है। 2009 में ग्रासरूट इंजीनियरिंग इनोवेशन के वर्ग में उन्हें पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील सम्मानित कर चुकी हैं। अगले माह वह लेक्चर के लिए विदेश यात्राओं पर जाने वाले हंै।
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