प्रकृति को संरक्षित रखकर कमाएं लाभ
N.Raghuraman
| Sep 11, 2012, 11:46AM IST

वास्तव में सामान्य मिट्टी से मूर्ति बनाने में काफी मेहनत करनी पड़ती है। इसी कारण अधिसंख्य मूर्तिकार इससे बचते हैं, लेकिन साथ ही ज्यादा से ज्यादा पैसा जल्दी कमाना चाहते हैं। उनका इस बारे में यही तर्क होता है कि प्लास्टर ऑफ पेरिस के बगैर विशालकाय मूर्तियां बनाना संभव नहीं है। इस तर्क को खारिज करने के लिए पालव अगले साल मुंबई में एक वर्कशॉप आयोजित करने के बारे में सोच रहा है। वह वहां देशभर से मूर्तिकारों को बुलाकर उन्हें इको-फ्रेंडली मूर्ति बनाने के बारे में जागरूक करना चाहता है। इसकी वजह यह है कि लगातार दूसरे वर्ष पालव ने इको-फ्रेंडली मटेरियल से गणपति की विशालकाय मूर्तियां बनाने में सफलता हासिल की है। विशालकाय मूर्तियों के अलावा पालव ने आठ सौ के लगभग छोटी मूर्तियां भी तैयार की हैं, क्योंकि गणपति समारोह के सिलसिले में मूर्तियों की जबर्दस्त मांग रहती है। उसका दावा है कि अगर सही तरीके से मूर्ति गढ़ी जाए, तो सुरक्षा संबंधी कोई आशंका उठ ही नहीं सकती।
सिर्फ गणपति समारोह के लिए ही नहीं, पालव को सालभर मूर्तियों के निर्माण के ऑर्डर मिलते हैं। इनमें नवरात्र समेत छोटे गांव-कस्बों में विभिन्न अंतराल होने वाले तीज-त्योहार शामिल हैं। मुंबई में विस्तृत पैमाने पर गणपति उत्सव मनाया जाता है। रजिस्टर्ड सार्वजनिक मंडलों की संख्या 9,904 है। इनके अलावा घरों के लिए लगभग 1,70,000 गणपति की मूर्तियां तैयार की जाती हैं। समारोह के अंत में इन सभी मूर्तियों को विभिन्न जल स्रोतों में विसर्जित कर दिया जाता है। विसर्जित मूर्तियों में से अधिसंख्य प्लास्टर ऑफ पेरिस से बनी होती हैं, जो अंतत: पानी को ही प्रदूषित करती हैं।
सच तो यह है कि प्लास्टर ऑफ पेरिस और इको-फ्रेंडली मटेरियल से तैयार गणपति की मूर्ति में विभेद करना बेहद आसान है। पीओपी से तैयार मूर्ति को ठकठकाने पर आवाज निकलती है, जबकि इको-फ्रेंडली मूर्ति के साथ ऐसा नहीं होता। इसके अलावा इको-फ्रेंडली मूर्ति वजन में भी हल्की होती है। पर्यावरण के प्रति बढ़ती जागरूकता के कारण मुंबई में विभिन्न नगरीय निकायों में इको-फ्रेंडली मूर्तियों की ही ज्यादा मांग है। इस साल यही वजह है कि बीते वर्ष की 18 सौ मूर्तियों की तुलना में इको-फ्रेंडली मटेरियल से बनी पचास हजार मूर्तियां बेची जा रही हैं।






