किराना को खतरा नहीं मल्टी ब्रांड से
N.Raghuraman
| Sep 21, 2012, 11:16AM IST

सबसे पहले आते हैं मल्टी ब्रांड रिटेल से किराना दुकानों पर खतरे की बात करने वालों पर। सच तो यह है कि मल्टी ब्रांड रिटेल से किराना दुकानदारों को एक फीसदी भी नुकसान नहीं होने वाला है। इसकी बड़ी वजह यह है कि एक किराना दुकान चलाने के लिए पांच सौ से सात सौ वर्ग फीट की जगह चाहिए होती है। इसके उलट 'बेस्ट बाय' जैसे सुपर स्टोर को कम से कम दस किराना दुकानों जितनी जगह चाहिए होती है।
आप ही बताएं किराना दुकान वाले क्षेत्र में इतनी जगह है कहां? द्वितीय और तृतीय श्रेणी के शहरों में इतनी जगह ही नहीं है। दूसरे, किराना दुकान सालों से चल रही हैं। इसलिए नहीं कि वे स्थानीय ग्राहकों को सस्ता सामान देती हैं, बल्कि इसलिए कि ग्राहकों को सामान लेनेे के लिए कहीं दूर नहीं जाना पड़ता। हालांकि कीमतों में भारी अंतर ग्राहकों को माह में एक बार जरूर मल्टी ब्रांड रिटेल से जुड़े सुपर मार्केट तक लेकर जा सकता है, लेकिन दैनिक जरूरत की चीजें वे किराना दुकानों से ही खरीदेंगे।
अगर कोई चाहता है कि ग्राहक महीने में एक बार भी सुपर मार्केट की ओर रुख न करें, तो उन्हें चेन्नई के उपगनर पेरिस कॉर्नर में नाथन स्टोर का अनुकरण करना होगा। पिछले तीस सालों से चल रहा नाथन स्टोर किसी आम किराना दुकान की तरह है। आप किसी भी चेन्नईवासी से बात करें, वह सस्ती कीमतों के कारण नाथन स्टोर को तरजीह देता नजर आएगा। लोग यहां सामान खरीदने के लिए आधा-आधा घंटा लाइन में खड़े रहते हैं। यह स्टोर एक हजार वर्ग फीट से बड़ा नहीं है।
नाथन स्टोर जो कर रहा है, उसे देश के अन्य किराना दुकानदार भी कर सकते हैं। इस स्टोर का मालिक अपना अधिकांश समय शहर से बाहर बिताता है। इस अवधि में वह कंपनियों से विभिन्न उत्पादों की सीधे खरीदारी करता है। इस तरह जो फायदा उसे मिलता है, वह उसमें से एक हिस्सा ग्राहकों को सस्ती कीमत लगाकर देता है। स्टोर में उपलब्ध एक भी सामान प्रिंटेड कीमतों पर नहीं बिकता, बल्कि पचास पैसे से लेकर पांच रुपए तक सस्ता ही बिकता है। कुछ उत्पाद तो अठारह रुपए तक सस्ते मिलते हैं। पेरिस कॉर्नर चेन्नई का व्यावसायिक इलाका है, जहां तमाम प्रमुख ऑफिस स्थित हैं। जैसा बताया कि लोग घंटों लाइन में लगकर यहां सामान खरीदने आते हैं। इसे देखते हुए स्टोर मालिक ने उपनगर मम्बलम में भी एक शाखा खोली है। जाहिर है कि वहां भी लोगों की खासी भीड़ उमड़ती है। ग्राहकों को कम कीमत पर सामान मिलता है और मालिक का किसी उत्पाद की बड़ी संख्या में बिक्री से आर्थिक लाभ का दायरा बढ़ जाता है।
केंद्र सरकार के मल्टी ब्रांड रिटेल में 51 फीसदी के प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के फैसले को दो तरह से देखा जा रहा है। उद्यमियों को लग रहा है कि इस फैसले से लगभग 16 अरब रुपए का विदेशी निवेश रिटेल सेक्टर में होगा, जिससे न सिर्फ रोजगार के अवसर बढ़ेंगे बल्कि अर्थव्यवस्था को भी गति मिलेगी। दूसरी तरफ वे लोग हैं, जो इसे किराना दुकानों के लिए खतरा बता रहे हैं। उनका तर्क है कि मल्टी ब्रांड रिटेल के आने से लोग किराना दुकानों से समान खरीदना बंद कर देंगे, जिसका असर इससे जुड़े लोगों की रोजी-रोटी पर पड़ेगा।
सबसे पहले आते हैं मल्टी ब्रांड रिटेल से किराना दुकानों पर खतरे की बात करने वालों पर। सच तो यह है कि मल्टी ब्रांड रिटेल से किराना दुकानदारों को एक फीसदी भी नुकसान नहीं होने वाला है। इसकी बड़ी वजह यह है कि एक किराना दुकान चलाने के लिए पांच सौ से सात सौ वर्ग फीट की जगह चाहिए होती है। इसके उलट 'बेस्ट बाय' जैसे सुपर स्टोर को कम से कम दस किराना दुकानों जितनी जगह चाहिए होती है।
आप ही बताएं किराना दुकान वाले क्षेत्र में इतनी जगह है कहां? द्वितीय और तृतीय श्रेणी के शहरों में इतनी जगह ही नहीं है। दूसरे, किराना दुकान सालों से चल रही हैं। इसलिए नहीं कि वे स्थानीय ग्राहकों को सस्ता सामान देती हैं, बल्कि इसलिए ि ग्राहकों को सामान लेनेे के लिए कहीं दूर नहीं जाना पड़ता। हालांकि कीमतों में भारी अंतर ग्राहकों को माह में एक बार जरूर मल्टी ब्रांड रिटेल से जुड़े सुपर मार्केट तक लेकर जा सकता है, लेकिन दैनिक जरूरत की चीजें वे किराना दुकानों से ही खरीदेंगे।
अगर कोई चाहता है कि ग्राहक महीने में एक बार भी सुपर मार्केट की ओर रुख न करें, तो उन्हें चेन्नई के उपगनर पेरिस कॉर्नर में नाथन स्टोर का अनुकरण करना होगा। पिछले तीस सालों से चल रहा नाथन स्टोर किसी आम किराना दुकान की तरह है। आप किसी भी चेन्नईवासी से बात करें, वह सस्ती कीमतों के कारण नाथन स्टोर को तरजीह देता नजर आएगा। लोग यहां सामान खरीदने के लिए आधा-आधा घंटा लाइन में खड़े रहते हैं। यह स्टोर एक हजार वर्ग फीट से बड़ा नहीं है।
नाथन स्टोर जो कर रहा है, उसे देश के अन्य किराना दुकानदार भी कर सकते हैं। इस स्टोर का मालिक अपना अधिकांश समय शहर से बाहर बिताता है। इस अवधि में वह कंपनियों से विभिन्न उत्पादों की सीधे खरीदारी करता है। इस तरह जो फायदा उसे मिलता है, वह उसमें से एक हिस्सा ग्राहकों को सस्ती कीमत लगाकर देता है। स्टोर में उपलब्ध एक भी सामान प्रिंटेड कीमतों पर नहीं बिकता, बल्कि पचास पैसे से लेकर पांच रुपए तक सस्ता ही बिकता है। कुछ उत्पाद तो अठारह रुपए तक सस्ते मिलते हैं। पेरिस कॉर्नर चेन्नई का व्यावसायिक इलाका है, जहां तमाम प्रमुख ऑफिस स्थित हैं। जैसा बताया कि लोग घंटों लाइन में लगकर यहां सामान खरीदने आते हैं। इसे देखते हुए स्टोर मालिक ने उपनगर मम्बलम में भी एक शाखा खोली है। जाहिर है कि वहां भी लोगों की खासी भीड़ उमड़ती है। ग्राहकों को कम कीमत पर सामान मिलता है और मालिक का किसी उत्पाद की बड़ी संख्या में बिक्री से आर्थिक लाभ का दायरा बढ़ जाता है।








