रखें नजर तेजी से बदलती दुनिया पर
N.Raghuraman | Sep 22, 2012, 09:51AM IST

हाल ही में मेरा एक हाईवे पर रुकना हुआ, जहां कई शिक्षण संस्थान मौजूद थे। मैंने उनके बाहर कामचलाऊ दुकानें देखीं, जहां चाय और अन्य खाद्य पदार्थ मिलते हैं। यद्यपि चाय की अच्छी-खासी बिक्री होती है, लेकिन दुकानदार को ज्यादा लाभ चाय के साथ खाए जाने वाले हल्के-फुल्के नाश्ते से होता है। यह आंकड़ा लगभग साठ फीसदी बैठता है। सच तो यह है कि वे फ्रूटी बबलगम जैसे उत्पाद बेचकर भी थोड़ा-बहुत मुनाफा कमा लेते हैं। इस तरह के उत्पादों की खपत ज्यादा होती है।
इन्हें खाने के बाद उनके द्वारा अपनाए जाने वाले हाव-भाव से मुझे इस उत्पाद की पंच लाइन 'कैसे जीभ लपलपाई' याद हो आई। मैंने देखा कि एक पोस्ट-ग्रेजुएट स्टूडेंट अपने प्रोजेक्ट के चयन पर जुड़े भ्रम को लेकर दूसरे से शिकायत कर रहा था। वह अपना गुस्सा बबलगम को फुलाकर और फिर उसे फोड़कर व्यक्त कर रहा था।
वह इस तथ्य से अनजान था कि बबलगम भी प्रोजेक्ट का एक विषय हो सकता है। छह हजार करोड़ रुपए के भारतीय टॉफी बाजार में इस बबलगम की हिस्सेदारी 14 फीसदी है। इससे जुड़ा 30 सेकंड का विज्ञापन ओग्लिवे ने बनाया है, जिसमें एक गाइड को दिखाया गया है। वह अपने हाथ में बबलगम पकड़े है और उसे हिला-डुला रहा है।
बबलगम को हिलते देख सामने खड़ा विदेशी पर्यटक अपनी जीभ इधर-उधर हिला रहा है। इस आदत को विदेश सहित भारत में भी अशिष्ट माना जाता है। इसके बावजूद यह प्रोजेक्ट का हिस्सा बन सकता है कि आखिर क्यों और किस कारण 'कैसे जीभ लपलपाई' पंच लाइन का विचार आया।
आपमें से कई लोग जानते होंगे कि आईआईएम, अहमदाबाद के बाहर चाय की दुकान लगाने वाला शख्स 'चाय व्यवसाय' से जुड़ी बारीकियों पर उस संस्थान में लैक्चर दे चुका है। यही नहीं, उसने किसी प्रोफेशनल प्रोफेसर की तरह अपना प्रेजेंटेशन पावर प्वाइंट पर तैयार किया। तो यह है हमारी आज की पीढ़ी, जो उच्च शिक्षा की तलाश में मारी-मारी फिर रही है, बगैर यह जाने कि आखिर यह उन्हें लेकर कहां जाएगी। इंडियन बैंक एसोसिएशन के आंकड़ों पर गौर फरमाएं।
2001 में महज तीन लाख लोगों ने उच्च शिक्षा के लिए लोन लिया था, जबकि 2010 में यह संख्या बढ़कर 18 लाख तक पहुंच गई। इनमें से 75 फीसदी लोगों ने उच्च शिक्षा के लिए महज चार लाख रुपए का लोन लिया। 2012-13 में उच्च शिक्षा के लिए लोन लेने वालों की संख्या में 20 फीसदी की वृद्धि का अनुमान है।






