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दूसरों से प्रेरणा लेकर आगे बढ़ें हम

N.Raghuraman | Sep 24, 2012, 10:15AM IST
 
 

यह 1973 के मेरे स्कूली दिनों की बात है। मैं स्कूल बस की दुर्घटना में चोटग्रस्त चित्रा आयंगर को देखने गया था। उसके दोनों होंठों पर गहरा घाव हो गया था और एक दांत भी टूट गया था। दरअसल, नागपुर की धर्मपीठ सड़क पर एक साइकिल रिक्शा को बचाने के लिए ड्राइवर को आपातकालीन ब्रेक लगाना पड़ा था और इससे बस में मौजूद बच्चे एक के ऊपर एक आ गिरे थे।

चित्रा सामने की तरफ बैठी थी और जब पीछे के बच्चे अचानक उस पर आ गिरे, तो उसका चेहरा सामने लगी सुरक्षा रॉड से बुरी तरह जा टकराया। उसे और सात अन्य चोटिल बच्चों को तत्काल अस्पताल ले जाया गया, जबकि उसका बड़ा भाई रवि जो पीछे बैठे रहने के कारण सुरक्षित था, उसे स्कूल ले जाया गया।

उन दिनों मोबाइल नहीं थे और लैंडलाइन फोन भी कम ही होते थे। इसलिए सारे निर्णय बस में मौजूद शिक्षक ने ही लिए और जब तक बच्चे अपने-अपने घर नहीं पहुंच गए, अभिभावकों को इसके बारे में भनक भी नहीं लग पाई। हालांकि चित्रा मेरी ही क्लास में पढ़ती थी, लेकिन मैं बस से स्कूल नहीं जाता था। इसलिए मुझे उसके साथ पेश आई दुर्घटना के बारे में स्कूल पहुंचने के बाद ही पता चला। जब मैं उसे देखने उसके घर पहुंचा, तो वह बोल नहीं पा रही थी और आंसू बहाए जा रही थी। हमें लगा कि उसे तकलीफ है, इसलिए उसे डॉक्टर द्वारा लिखी नींद की गोली दी गई और हमने उसे अकेला छोड़ दिया।

वक्त बीतने के साथ चोटों के निशान चले गए, लेकिन चित्रा की मुस्कान भी गायब हो गई थी। वह उस घटना के बाद पूरी तरह बदल गई थी। 12वीं कक्षा के बाद जब हम अलग-अलग होने लगे, तब उसने मुझे बताया कि दुर्घटना के बाद क्या हुआ था। जब वह अस्पताल से घर पहुंची, तो उसकी मां ने दरवाजा खोला था। उन्होंने सूजे चेहरे, चोटिल जबड़े, काली आंखों और चेहरे व सफेद यूनिफॉर्म पर खून के दाग के साथ खड़ी चित्रा को देखा, परंतु उनके मुंह से पहली बात यह निकली कि 'रवि कहां है?' चित्रा किसी तरह बुदबुदाई, 'वह ठीक है और क्लास में है।'

चित्रा के लिए यह उसके और उसकी मां के दरमियान एक निर्णायक क्षण था। हालांकि उसकी मां ने उसे अपनी बांहों में भर रखा था, लेकिन उनके शब्द रवि के लिए थे। उस दिन से उसके दिल में यह बात बैठ गई कि वह रवि से कम महत्वपूर्ण है। वह अलग सोने लगी।

अभिभावकों ने सोचा कि शायद यह बढ़ती उम्र का तकाजा है, लिहाजा उन्होंने इसकी ज्यादा परवाह नहीं की। इससे चित्रा को और ज्यादा आघात लगा। वह अपनी मां से और दूर होती गई। वास्तव में चित्रा को देखते ही उसकी मां यह समझ गई थीं कि उसके घाव गंभीर नहीं हैं और जल्द ही भर जाएंगे। लेकिन उन्हें चिंता यह थी कि रवि कहां रह गया? आखिर ऐसा कैसे हो सकता है कि बस दुर्घटनाग्रस्त हो, तो एक को चोट लगे और दूसरे को खरोंच भी न आए!

मां के लिए चित्रा तो उनके पास थी, लेकिन रवि उनकी पहुंच से दूर था। असल मे वह उसे अपनी आंखों से देखकर आश्वस्त होना चाहती थीं। चित्रा तब मां की इस दुविधा को नहीं समझ पाई थी।

वह इस बात को 30 साल बाद समझ पाई, जब वह खुद दो बच्चों की मां बन चुकी थी। सौभाग्य से चित्रा की मां तब जीवित थीं और चित्रा उनसे अपने दिल की बात कहकर माफी मांग सकी थी।
 
 
 

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