सजा ऐसी हो, जो कुछ सिखा सके
एन. रघुरामन
| Sep 27, 2012, 10:58AM IST

ज्यॉफ मेसियन एक १२ वर्षीय बालक है और उसे फुटबॉल खेलना बहुत अच्छा लगता है, लेकिन खेलते समय वह बहुत ज्यादा थूकता है। जैसा कि ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट खिलाड़ी चेन्नई ग्राउंड में उच्च आद्र्रता की वजह से अक्सर करते हैं। एक बार उसे हरे-भरे मैदान पर थूकते हुए पकड़ लिया गया। इसके बाद उसके कोच ने उसे एक दिन के लिए मनोविज्ञान के शिक्षक के पास भेजा, जिन्होंने उसे नगरीय निकाय के साफ-सफाई विभाग में दो दिन तक काम करने के लिए कहा।
हालांकि ज्यॉफ ने कोई साफ-सफाई तो नहीं की, लेकिन उसने पूरे दो दिन तक नगरीय निकाय के कर्मियों को सड़कों की सफाई करते, कूड़ेदान से कचरा इकट्ठा करते और इसे उचित जगह पर ले जाकर ठिकाने लगाते हुए देखा। ज्यॉफ को दो दिन बाद स्कूल वापस लौटकर इस विषय पर एक निबंध लिखना था कि शहर में किस तरह कचरा साफ होता है और उसने इसके बारे में क्या सीखा। बहरहाल, इसके बारे में स्कूल के मनोविज्ञान शिक्षक का कहना है, 'ऐसा करने से बच्चों में जिम्मेदारी का भाव आता है और वे सड़क या ग्राउंड पर थूकने या गंदगी फैलाने के प्रति सचेत हो जाते हैं।' इसी तरह स्मिथ राफेल जेब्रा लाइन क्रॉस करते समय मौत के मुंह में जाते-जाते बचा। वह रेड सिग्नल के वक्त जेब्रा लाइन क्रॉस कर रहा था, तभी एक ट्रक तेजी से उसकी ओर आया, जिसने उसे बचाने के चक्कर में पास के एक ट्रैफिक बूथ में टक्कर मार दी। इस घटना के बाद उस किशोरवय बालक को दो दिनों के लिए ट्रैफिक डिपार्टमेंट में भेजा गया, ताकि वह देख सके कि सिडनी शहर में यातायात किस तरह नियंत्रित किया जाता है।
उसने पूरे दो दिनों तक ट्रैफिक पुलिसकर्मियों के साथ घूमते हुए गलती करने वाले लोगों पर जुर्माना लगाने, ट्रैफिक नियमों का पालन करने वाले लोगों को देखकर मुस्कराने, किसी की पता तलाशने में मदद करने समेत वह सब कुछ किया, जो टै्रफिक पुलिसकर्मी अमूमन करते हैं। स्मिथ ने वापस आकर इस बारे में एक विस्तृत रिपोर्ट लिखी कि सिडनी जैसे भीड़भाड़ भरे शहर में ट्रैफिक को नियंत्रित करना कितना मुश्किल है। इससे उसे समझ आया कि ट्रैफिक नियमों का पालन करना क्यों अहम है।
वास्तव में वहां हरेक छात्र स्कूली जीवन के 12 सालों के दौरान समाज के विभिन्न हिस्सों से जुड़े ऐसे प्रोजेक्ट कम से कम 20 दिनों के लिए करता है। इससे उन्हें पता चलता है कि संबंधित विभाग कैसे काम करता है और कर्मियों को अपने जिम्मेदारियों के निर्वहन में किन-किन दिक्कतों से जूझना पड़ता है। इन सब बातों को करीब से जानने से उनमें जिम्मेदारी का भाव आता है और वे आगे चलकर एक अनुशासित नागरिक बनते हैं। स्कूल भी अपनी ओर से इस तरह की गैरजिम्मेदारी भरी बातों को अपने प्रोजेक्ट्स का हिस्सा बनाते हैं। वासत्व में ऐसी कवायद कभी गैर-उत्पादक नहीं होती।
फंडा यह है कि...
इस तरह के अनूठे तरीके अपनाते हुए नटखट बच्चों में भी अच्छी आदतों का समावेश किया जा सकता है। छात्रों को रचनात्मक तरीके से दंडित करना आज के समय की मांग है।
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