कर्मचारी के जोश को खत्म न करें
एन. रघुरामन
| Sep 28, 2012, 10:10AM IST

आखिरकार एक दिन रवि बेहतर संभावनाओं की खातिर संस्थान छोड़कर चला गया। एक्जिट इंटरव्यू में उसने कहा कि वह यह संस्थान अपने बॉस की वजह से छोड़ रहा है, अपने मैनेजर की वजह से नहीं।
हाल में मुझे न्यूयॉर्क टाइम्स की बेस्टसेलिंग सूची में शामिल 'फस्र्ट, ब्रेक द रूल्स' के लेखक कर्ट कॉफमैन से साक्षात्कार का मौका मिला। जब मैंने उन्हें रवि की कहानी सुनाई, तो उन्होंने कहा कि बॉस द्वारा ऐसा करने से ही कर्मचारी का जोश खत्म हो जाता है। कॉफमैन ने कहा कि निम्न पांच नियमों पर चलने वाले लीडर्स ही अपने संस्थान का बेड़ा गर्क करते हैं :
1 . कर्मचारी का आकलन इस आधार पर करना कि वह कैसे काम करने के विभिन्न 'चरणों' को अपनाता है, भले ही नतीजा कुछ भी हो।
2 . उसे खासतौर पर यह बताना कि वह क्या 'नहीं' है और कमियों से उबरने में मदद न करना।
3. हमेशा उसे यह अहसास कराना कि काम गंभीर है और कड़ी मेहनत ही एकमात्र समाधान है।
4 . तमाम कर्मचारियों को भय दिखाकर काम के लिए विवश करना।
5 . हमेशा यह हाईलाइट करना कि वे 'क्या नहीं' चाहते।
कर्मचारियों में काम के प्रति जोश पैदा करने के लिए बॉस निम्न पांच उपाय अपना सकते हैं :
1. कर्मचारियों को लक्ष्य की ओर आगे बढ़ाने के लिए 'उम्मीद' का इस्तेमाल करना।
2. काम को मजेदार और ऊर्जा से भरपूर बनाया जाए।
3. कर्मचारियों की यह समझने में मदद करें कि वे नतीजे पाने के लिए जिस प्रक्रिया को अपना रहे हैं, उससे कैसा फल मिलेगा और उन्हें वास्तव में किसलिए नौकरी पर रखा गया है।
4 . हरेक कर्मचारी की यह जानने में मदद करें कि वह क्या है और कंपनी के लक्ष्यों के लिए किस तरह अपना सर्वश्रेष्ठ दे सकता है।
5 . वह 'निश्चित तौर पर' क्या चाहता है, इस बारे में एक विजन तैयार हो।
कॉफमैन के मुताबिक हरेक संस्थान में संस्कृति के तीन स्तर होते हैं- कर्मचारी के साथ 'सूक्ष्म' संस्कृति, मैनेजर के साथ 'सेतु' संस्कृति और प्रमोटर्स के साथ 'वृहद' संस्कृति। इन तीनों संस्कृतियों की अपनी खास भूमिका होती है, जैसे कि सूक्ष्म संस्कृति का काम साथी कर्मचारियों में उद्देश्यपरक और सकारात्मक ऊर्जा पैदा करना है, वहीं सेतु संस्कृति का काम इन सकारात्मक लोगों को संस्थान के उद्देश्यों के साथ जोडऩा तथा वृहद संस्कृति का काम वह दिखाना है, जो नहीं देखा गया। इसे स्टीव जॉब्स की मिसाल के जरिए अच्छी तरह समझा सकता है, जिन्होंने ऐसे बाजारों को उभारा, जो अस्तित्व में ही नहीं थे।






