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अहिंसा अपनाने की तरह है अच्छी सलाह

N.Raghuraman | Oct 02, 2012, 09:40AM IST
 
 

हालांकि मेरा पड़ोसी मुझे एक योग्य ड्राइवर दिलाने के लिए तैयार था, लेकिन मेरी पत्नी व मुझे लगा कि ऐसा करना ठीक नहीं होगा क्योंकि वह हमारे घर की तमाम निजी जानकारियों को पड़ोसी के साथ साझा करेगा। इस वजह से १९९४ में हमने किसी की सिफारिश पर शकील खान को अपना ड्राइवर रख लिया। वह हमारी अति-काबिल, अद्भुत घरेलू परिचारिका का मंगेतर था।

शकील के साथ गाड़ी में बैठकर चलना अलग ही अनुभव था। वह शहर की भीड़भाड़ भरी सड़कों में भी टॉप गियर में गाड़ी चलाना पसंद करता और इस बात का तो पता ही नहीं रहता कि वह कब बे्रक लगाएगा। हमने उसके साथ कई तनावभरे पल गुजारे। शकील पहली बार हमें तब बाहर लेकर गया, जब हम थोड़ी-दूर पर स्थित एक मंदिर जा रहे थे। हम अपनी नई कार की सेफ्टी के लिए एक छोटी-सी पूजा करना चाहते थे। हम शुरुआत में ही धन्य होते-होते रह गए, जब शकील ने मंदिर के बाहर खड़े एक भीमकाय सांड के कुछ ही इंच पीछे अचानक गाड़ी रोक दी। अपने कॅरिअर के शुरुआती दिनों में वह एक बार तकरीबन १५ मिनट तक कार को इस तरह चलाता रहा, मानो इसे हिचकी आ रही हों। आखिर मेरे सब्र का बांध टूट गया और मैंने उससे पूछा, 'शकील, आखिर कार इतनी आवाज क्यों कर रही है?' शकील ने पूरे भरोसे के साथ जवाब दिया, 'मुझे लगता है कि इसकी बैटरी में खराबी है।' यह सुनकर मैं चौंक गया, 'बैटरी में खराबी! शकील यह कार सिर्फ पांच दिन पुरानी है। आखिर इसकी बैटरी में कैसे खराबी आ सकती है?' इस पर उसने जवाब दिया, 'आजकल नई गाड़ी का भी भरोसा नहीं होता, सर।' तब तक हमें रबड़ के जलने की अजीब-सी गंध आने लगी थी। मैंने तकरीबन चीखते हुए उससे कहा, 'फौरन कार को किसी नजदीकी सर्विस स्टेशन पर ले चलो।' सर्विस स्टेशन पर अटेंडेंट ने कार का मुआयना करने के बाद मुझे दयनीय दृष्टि से देखते हुए कहा, 'सर, गाड़ी का पार्किंग ब्रेक ऑन है।' हम इसी अवस्था में तकरीबन २० मिनट से कार दौड़ा रहे थे और हममें से किसी को इसका एहसास नहीं हुआ। मुझे लगा कि इंस्ट्रूमेंट पैनल पर लाल रंग का चमकता 'पी' पावर का संकेत है। जहां तक शकील की बात है तो मुझे लगने लगा था कि उसने अपना ड्राइविंग लाइसेंस अधिकारियों की मुट्ठियां गरम करके हासिल किया होगा। शकील की जिंदगी का एक और लव अफेयर कार के हॉर्न के साथ था। मुझे पुणे तक का एक सफर अच्छी तरह याद है, जहां हम रसोई गैस के सिलेंडरों से लदे एक विशालकाय ट्रक और किसानों को ले जा रहे एक ट्रैक्टर के बीच सैंडविच बन गए थे। शकील पागलों की तरह हॉर्न बजाए जा रहा था। मैंने अपने दोनों कान ढंक लिए और उससे हॉर्न बंद करने के लिए कहा।

शकील ने शांतभाव से कहा, 'हॉर्न नहीं बजाया तो ट्रकवाला साइड कैसे देगा?' खैर, मुझे याद नहीं पड़ता कि हम उस दिन कार हॉर्न के कर्कश स्वर और फाल्गुनी पाठक के तेज आवाज में बजते गानों के बीच आखिरकार पुणे तक कैसे पहुंचे। मुझे सिर्फ इतना याद है कि उस रोज मेरे कानों को हिंसा झेलनी पड़ी। यह एक अलग कहानी है कि बाद में मेरी घरेलू नौकरानी काम छोड़कर शकील की घरवाली बन गई। इस तरह हमें दोहरा नुकसान हुआ। तब मुझे समझ में आया कि अच्छी सलाह कितना मायने रखती है।
 
 
 

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