वर्तमान में रहते हुए जीभर जिएं
N.Raghuraman
| Oct 05, 2012, 09:33AM IST

इस दुर्घटना को सेलिब्रेट करने के लिए एक पार्टी आयोजित की गई। स्क्वाड्रन लीडर और उनकी पत्नी 'बिंदास' लोग थे और उन्हें दुर्घटना का कतई अफसोस नहीं था। बल्कि वे इस बारे में बात कर रहे थे कि बीमा की रकम से किस तरह तमाम चीजें नई खरीदी जाएं। इन परिवारों ने इस अल्पकालीन प्रवास में दशहरा, दीपावली समेत कई त्योहार मनाए। इसी दौरान छह नवजात भी इस दुनिया में आए, जिनमें से चार के नाम पिंकू रखे गए। लेडीज क्लब की कुकिंग/आर्ट वर्क/डांसिंग/म्यूजिक/ब्यूटी क्लासेस भी पूरी रफ्तार पर थीं। आए दिन वहां प्रतिस्पद्र्धाएं और पार्टियां वगैरह होती रहती थीं। एक्स्ट्रा-कुरिकुलर एक्टिविटीज के लिए आखिर में कई तरह के पुरस्कार वितरित किए गए।
आखिरकार दिसंबर १९७३ आ गया, जब इन सबको अलग-अलग स्टेशनों पर लंबी पोस्टिंग के लिए भेजा गया। अफसरों का पहला बैच और फ्लाइट लेफ्टिनेंट हट्टंगड़ी बैंगलोर(पुराना नाम) रेलवे स्टेशन पहुंचे, जिन्हें अपनी पोस्टिंग के लिए कानपुर पहुंचना था। रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म में कदम रखते ही उनका स्वागत इस उद्घोषणा के साथ हुआ कि जल्द ही अखिल भारतीय रेलवे हड़ताल होने वाली है। वे आठ वयस्क और ३ साल से छोटे ८ बच्चे थे। दिल्ली जाने वाली एक ट्रेन को छोड़कर तमाम ट्रेनें रद्द कर दी गई थीं। हट्टंगड़ी मद्रास स्टेशन की महिला अधीक्षक से जाकर मिले और कहा, 'मैडम, मेरा बड़ा बच्चा १५ महीने का है और छोटा एक महीने पहले ही जन्मा है। हमारे पास सिर्फ २४ घंटों के लिए बेबी फूड है। हमारे साथी तीन और अफसरों के साथ भी यही स्थिति है। हमें टे्रन से जाना था मगर हमारी ट्रेन रद्द हो चुकी है। हालांकि एक और ट्रेन छूटने वाली है, जिससे हम जा सकते हैं। कृपया हमारी मदद करें!' उस सहृदयी महिला ने एक रजिस्टर निकाला और वीआईपी कोटा में उनका नाम दर्ज करते हुए कहा, 'यंग ऑफीसर, आज आपके नौनिहाल हमारे वीआईपी हैं।'
जब ट्रेन कागजपुर पहुंची तो ड्राइवर भी हड़ताल में शामिल हो गए और वे एक ऐसे छोटे-से प्लेटफॉर्म पर फंसे हुए थे, जहां कोई टी-स्टॉल तक नहीं था। हट्टंगड़ी कुछ सामान खरीदने के लिए बाहर गए और बिरला पेपर मिल के वर्करों से जाकर मिले। उनके मन में सेना की वर्दी के लिए काफी सम्मान था और उन्होंने न सिर्फ अफसरों व उनके परिजनों बल्कि पूरी ट्रेन के लिए ३६ घंटों तक खाने का इंतजाम किया। आखिरकार ये आफीसर्स मध्यरात्रि तक झांसी पहुंचे। वे जाकर स्टेशन मास्टर से मिले, जिन्होंने उनके गुलाबी गालों वाले आठों बच्चों को एक नजर देखने के बाद तुरंत ही सिर्फ उनके लिए एक छोटी-सी द्वितीय श्रेणी की बोगी ट्रेन के साथ जोड़ दी। आखिरकार वे ३६ घंटों के बजाय ६३ घंटों में कानपुर पहुंच गए।
जून १९७३ में विजयानंद हट्टंगड़ी समेत चालीस युवा सैन्य अफसरों को बेंगलुरु के आर्मी स्कूल में छह महीने के लिए भेजा गया। वहां उन सबके रहने के लिए चालीस वन रूम किचन ब्लॉक्स तैयार थे। उनसे कहा गया कि वे अपने परिवार संग अगले ४८ घंटों में वहां पहुंच जाएं। कई अफसर तो लगेज के साथ आए, लेकिन कुछ ने ट्रक के जरिए सामान बुक करवा दिया। स्क्वाड्रन लीडर एमएम सिंह तेजपुर से आए थे और उन्होंने एक कार के साथ पूरा लगेज ट्रक के जरिए बुक किया था। तीन महीने के इंतजार के बाद उन्हें टेलीग्राम से सूचना मिली कि उनका सामान लेकर आ रहा ट्रक नदी में गिर गया!!!
इस दुर्घटना को सेलिब्रेट करने के लिए एक पार्टी आयोजित की गई। स्क्वाड्रन लीडर और उनकी पत्नी 'बिंदास' लोग थे और उन्हें दुर्घटना का कतई अफसोस नहीं था। बल्कि वे इस बारे में बात कर रहे थे कि बीमा की रकम से किस तरह तमाम चीजें नई खरीदी जाएं। इन परिवारों ने इस अल्पकालीन प्रवास में दशहरा, दीपावली समेत कई त्योहार मनाए। इसी दौरान छह नवजात भी इस दुनिया में आए, जिनमें से चार के नाम पिंकू रखे गए। लेडीज क्लब की कुकिंग/आर्ट वरक/डांसिंग/म्यूजिक/ब्यूटी क्लासेस भी पूरी रफ्तार पर थीं। आए दिन वहां प्रतिस्पद्र्धाएं और पार्टियां वगैरह होती रहती थीं। एक्स्ट्रा-कुरिकुलर एक्टिविटीज के लिए आखिर में कई तरह के पुरस्कार वितरित किए गए।
आखिरकार दिसंबर १९७३ आ गया, जब इन सबको अलग-अलग स्टेशनों पर लंबी पोस्टिंग के लिए भेजा गया। अफसरों का पहला बैच और फ्लाइट लेफ्टिनेंट हट्टंगड़ी बैंगलोर(पुराना नाम) रेलवे स्टेशन पहुंचे, जिन्हें अपनी पोस्टिंग के लिए कानपुर पहुंचना था। रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म में कदम रखते ही उनका स्वागत इस उद्घोषणा के साथ हुआ कि जल्द ही अखिल भारतीय रेलवे हड़ताल होने वाली है। वे आठ वयस्क और ३ साल से छोटे ८ बच्चे थे। दिल्ली जाने वाली एक ट्रेन को छोड़कर तमाम ट्रेनें रद्द कर दी गई थीं। हट्टंगड़ी मद्रास स्टेशन की महिला अधीक्षक से जाकर मिले और कहा, 'मैडम, मेरा बड़ा बच्चा १५ महीने का है और छोटा एक महीने पहले ही जन्मा है। हमारे पास सिर्फ २४ घंटों के लिए बेबी फूड है। हमारे साथी तीन और अफसरों के साथ भी यही स्थिति है। हमें टे्रन से जाना था मगर हमारी ट्रेन रद्द हो चुकी है। हालांकि एक और ट्रेन छूटने वाली है, जिससे हम जा सकते हैं। कृपया हमारी मदद करें!' उस सहृदयी महिला ने एक रजिस्टर निकाला और वीआईपी कोटा में उनका नाम दर्ज करते हुए कहा, 'यंग ऑफीसर, आज आपके नौनिहाल हमारे वीआईपी हैं।'
जब ट्रेन कागजपुर पहुंची तो ड्राइवर भी हड़ताल में शामिल हो गए और वे एक ऐसे छोटे-से प्लेटफॉर्म पर फंसे हुए थे, जहां कोई टी-स्टॉल तक नहीं था। हट्टंगड़ी कुछ सामान खरीदने के लिए बाहर गए और बिरला पेपर मिल के वर्करों से जाकर मिले। उनके मन में सेना की वर्दी के लिए काफी सम्मान था और उन्होंने न सिर्फ अफसरों व उनके परिजनों बल्कि पूरी ट्रेन के लिए ३६ घंटों तक खाने का इंतजाम किया। आखिरकार ये आफीसर्स मध्यरात्रि तक झांसी पहुंचे। वे जाकर स्टेशन मास्टर से मिले, जिन्होंने उनके गुलाबी गालों वाले आठों बच्चों को एक नजर देखने के बाद तुरंत ही सिर्फ उनके लिए एक छोटी-सी द्वितीय श्रेणी की बोगी ट्रेन के साथ जोड़ दी। आखिरकार वे ३६ घंटों के बजाय ६३ घंटों में कानपुर पहुंच गए।






