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स्थानीय जानकारी रखे आपको आगे

एन. रघुरामन | Oct 08, 2012, 09:48AM IST
 
 

कुछ साल पहले मेरा पहली बार पाकिस्तान जाना हुआ। एक दिन मुझे लाहौर की गोवलमंडी में ले जाया गया, जो वहां की मशहूर चटोरी गली है। वहां पर तमाम खोमचेवाले दो-तीन मंजिला इमारतों के बाहर खड़े थे, जिन्हें विभाजन के दौरान जला दिया गया था और तबसे ही ये खाली पड़ी थीं। जब इन खोमचेवालों को पता चला कि हम भारतीय पर्यटक दल का हिस्सा हैं और पाकिस्तान सरकार के मेहमान हैं, तो वे हमारी आवभगत में लग गए। वहां के कुछ व्यंजनों का लुत्फ उठाने के बाद हमारे समक्ष पान पेश किया गया। पानवाला जिस अंदाज में पान लगाकर हमें पेश कर रहा था, उसकी हमारे दल के एक सदस्य ने काफी तारीफ की। चूंकि कम ही लोग उनके काम की तारीफ करते हैं, लिहाजा उसने उत्साहित होते हुए दुनिया के विभिन्न हिस्सों से आए पान के पत्ते दिखाए।

मैंने उससे यूं ही उस खास पत्ते के बारे में पूछा जो तमिलनाडु के कुंभकोणम या केरल के त्रिरुर में उगने वाले पान से काफी साम्यता रखता था। इन दोनों जगहों पर उगाए जाने वाले पान दक्षिण भारतीयों में काफी लोकप्रिय हैं और उष्णकटिबंधीय मृदा से पोषित होते हैं। इस तरह न सिर्फ ये आकार में बड़े होते हैं, वरन काफी तेज भी होते हैं। यही कारण है कि पान के कद्रदानों के बीच इन पत्तों की बेहद मांग है। इन पानों को १००-२०० के समूह में केले के पत्तों में लपेटा जाता है और भूसे की बनी टोकरियों में पैक कर दुबई जैसे खाड़ी देशों में भेजा जाता है, जहां पर इनकी पत्ते के आकार और गुणवत्ता के हिसाब से छंटनी के बाद नए सिरे से पैकेजिंग की जाती है और फिर इन्हें पान खाने वाले विभिन्न देशों में भेजा जाता है, जिनमें पाकिस्तान जैसा देश भी शामिल है।

वास्तव में कुंभकोणम और त्रिरुर दक्षिण भारत में सिर्फ दो ऐसे स्थल हैं, जिनका अपना पान बाजार है। यहां की लंबी-लंबी गलियों में अस्थायी छत के नीचे हजारों पान बिकते हैं और यह बाजार बाहर का तापमान बढऩे के बाद दोपहर तकरीबन १२ बजे बंद हो जाता है। यह बाजार सुबह तीन बजे खुल जाता है। वहीं वाणिज्यिक तौर पर सबसे सफल पान मुंबई में बेचे जाते हैं, जिनकी कीमत ३०० रुपए तक होती है। पान की यह दुकान मध्य प्रदेश के उज्जैन के यमु पंचायत ब्रांड का विस्तार ही है।

गुजरात ने पान खाने की अपनी अलग शैली ईजाद की है और उसी तरह की आदत कराची में भी देखी जा सकती है क्योंकि गुजरात भौगोलिक तौर पर वहां से नजदीक है और विभाजन के दौरान बड़ी संख्या में लोग वहां पहुंचे। यही कारण है कि कराची में मिलने वाला पान लाहौर के पान से अच्छा है। हमारे दल ने उन पानवालों को भारत के तमाम पान सेंटर्स के नाम लिखकर दिए, जिसे पाकर उन्हें लगा मानो पान बिजनेस में कोई डिग्री मिल गई हो। इसके बाद हमारी बनारसी पान के बारे में गुफ्तगू चली, जो स्वाद में मीठा होता है। माना जाता है कि इसे शौकीन लोग ही खाते हैं।

इस चर्चा के साथ आस-पास के और भी लोग आकर जुड़ गए और हमारी उन फूड वेंडरों के बीच शाही आवभगत की गई। उन्होंने हमसे पैसे लेने से भी इनकार कर दिया। अगले चार दिनों तक हमारे लिए उच्च क्वालिटी के पान का बंदोबस्त हो गया था और वे लोग इनके बारे में हमारी राय भी जानना चाहते थे। हालांकि हम में से कोई भी पान टेस्टर नहीं था।

फंडा यह है कि...

यदि आपको अपनी जगह की किसी खास चीज के बारे में जानकारी है, तो यह आपके लिए सीमापार क्षेत्र में काफी मददगार साबित हो सकती है। अजनबी देश में दूसरों के साथ इसे साझा करते हुए आप सम्मान भी हासिल कर सकते हैं। स्थानीय जानकारी को कभी भी 'घर की मुर्गी' मानकर नजरअंदाज न करें।

raghu@dainikbhaskargroup.com



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