कभी-भी कर सकते हैं नए सिरे से शुरुआत
एन. रघुरामन
| Oct 09, 2012, 09:51AM IST

थॉमस को हमेशा लगता था कि उन्हें उनके पूरे नाम के बजाय सिर्फ थॉमस कहकर बुलाया जाए। बचपन में वह अपने स्कूल के दोस्तों से हमेशा कहते कि अपने नाम की ऐसी पहचान कायम करेंगे, जिसे कोई भी मिटा नहीं पाएगा। उन्होंने जमकर मेहनत की और पांच साल के कड़े संघर्ष व प्रशिक्षण के बाद वह सेना में शामिल हो गए। वह कैप्टन थॉमस बन गए। दूसरे युवाओं की तरह थॉमस भी अपने लिए किसी अच्छी जीवनसंगिनी की तलाश में थे। उनके पिता भी यही मानते थे कि उनका बेटा खुद ही अपने लिए जीवनसाथी तलाश लेगा। सरहद पर सैनिकों को अक्सर छोटे-मोटे टकराव झेलने पड़ते हैं, लेकिन थॉमस के पिता कभी इस बात की फिक्र नहीं करते क्योंकि उनके खानदान में पीढिय़ों से देश के लिए खून बहाने की परंपरा थी। हालांकि खुशकिस्मती से उनके परिवार के किसी भी सदस्य को मोर्चे पर अपनी जिंदगी नहीं गंवानी पड़ी। लेकिन कैप्टन थॉमस के मामले में किस्मत इतनी मेहरबान नहीं थी। वह एक बार बारूदी सुरंगों की टोह ले रहे थे, तभी एक बारूदी सुरंग के फटने से उनके बाएं पैर के परखच्चे उड़ गए। कैप्टन थॉमस को गंभीर हालत में हवाई मार्ग के जरिए पुणे के विशेष अस्पताल में लाया गया, ताकि उन्हें विशेषज्ञ उपचार मिल सके। आर्टिफिशियल लिंब सेंटर (एएलसी) ऐसा ही एक विशिष्ट अस्पताल है, जो युद्ध या प्रशिक्षण इत्यादि में अपने हाथ-पैर गंवाने वाले बहादुर सैनिकों को कृत्रिम अंग, उपकरण और पुनर्वास सुविधा मुहैया कराता है। थॉमस अपने साथ पेश आई इस दुर्घटना से पूरी तरह टूट गए। उन्हें यह चिंता भी सताए जा रही थी कि अब कैसे उनकी शादी होगी व घर बसेगा। एएलसी की ओवरऑल इंचार्ज थीं नर्सिंग ऑफीसर लेफ्टिनेंट मैरी, जो मुश्किल मरीजों को भी कभी नरमी तो कभी सख्ती बरतते हुए आसानी से संभाल लेती थीं। जंग के मोर्चे पर अपना कोई अंग गंवाने वाले ऐसे तकरीबन ९९ फीसदी मरीज वहां से सगर्व चलते हुए वापस जाते। वह तकरीबन चार महीनों की मशक्कत के बाद थॉमस को यह समझा सकीं कि कृत्रिम अंगों के साथ भी खुशी-खुशी जीवन जिया जा सकता है। छह महीने बाद वह नकली पैर के सहारे खड़े होने लगे और तीन महीने गुजरते-गुजरते वह चलने भी लगे। हालांकि तब तक दोनों को ही अहसास नहीं था कि उनके मन में एक-दूसरे के प्रति प्यार का अंकुर फूट चुका है। उन्हें हमेशा अस्पताल परिसर में एक-दूसरे के साथ हंसते-खिलखिलाते देखा जाता। लेकिन कोई भी इसे शक की निगाहों से नहीं देखता, क्योंकि सब जानते थे कि मैरी अपने मरीजों का बहुत ख्याल रखती हैं। आखिरकार, कैप्टन थॉमस के डिस्चार्ज होने का दिन आ गया। उनके वहां से जाते वक्त मैरी की आंखों में आंसू थे। तकरीबन एक हफ्ते तक वह खोई-खोई सी रहीं। ठीक एक हफ्ते बाद कैप्टन थॉमस अपनी फिएट कार से एएलसी में आए। कार पर एक बैनर लगा था, जिसमें लिखा था, 'डियर मैरी, विल यू मैरी मी? युअर थॉमस।' उसके बाद जो हुआ, वह इतिहास है। अब २०१२ में ब्रिगेडियर थॉमस और कर्नल मैरी सेवानिवृत्त हो चुके हैं। इन दोनों को शाम के वक्त पुणे की सालुंके विहार कालोनी में साथ-साथ टहलते हुए देखा जा सकता है। फंडा यह है कि... शरीर का कोई अंग गंवाने के बाद जिंदगी वहीं खत्म नहीं होती। आप इसे नए सिरे से संवार सकते हैं। मुझे तो कई बार हैरत होती है कि आखिर कैसे छात्र/छात्राएं परीक्षा में कम नंबर आने के बाद आत्महत्या जैसा अतिवादी कदम उठा लेते हैं! नौकरियां और अच्छे नंबर हासिल करना तो साध्य लक्ष्य हैं। raghu@dainikbhaskargroup.com |






