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शिष्टाचार दिलाता है आपको अलग पहचान

एन. रघुरामन | Oct 11, 2012, 15:32PM IST
 
 

पहला परिदृश्य- वर्ष १९५५, इलाहाबाद यूनिवर्सिटी। गायत्री उस वक्त एमएससी की छात्रा थीं और उनका विज्ञान विभाग विश्वविद्यालय में अंग्रेजी विभाग के काफी निकट था। वहां पर अंग्रेजी विभाग में एक प्राध्यापक थे, जो काफी सुसंस्कृत और स्टाइलिश थे और कार ड्राइव करते समय उनका एक हाथ स्टियरिंग पर होता था, जबकि दूसरे हाथ में सिगरेट दबी होती थी।

जब कभी गायत्री का उनसे आमना-सामना होता, तो वह हल्की-सी मुस्कान के साथ सिर झुकाकर उनका अभिवादन करते। वह ऐसा सिर्फ गायत्री के साथ नहीं, वरन विज्ञान व गणित विभाग की हरेक लड़की के साथ करते थे। यह उनका महिलाओं के प्रति सम्मान जताने का अपना तरीका था।

इन प्राध्यापक को हमेशा बड़ी संख्या में लोग पूरी तन्मयता के साथ सुनते, क्योंकि उन्हें अंग्रेजी व हिंदी दोनों पर समान रूप से दक्षता प्राप्त थी। वह अंग्रेजी के इकलौते प्राध्यापक थे, जो हिंदी में कविताएं लिखते थे। आज गायत्री पचोड़ी ८० वर्ष की हैं।

वह जबलपुर के रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय के अंतर्गत आने वाले एक साइंस कॉलेज में गणित की प्राध्यापिका होने के साथ-साथ गल्र्स होस्टल की वार्डन भी रही हैं और अब सेवानिवृत्ति के बाद आराम से जीवन गुजार रही हैं। वह आज भी इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के उन प्राध्यापक का शिष्टाचार और महिलाओं के प्रति किए जाने वाले शालीन व्यवहार को नहीं भूली हैं। वह प्राध्यापक और कोई नहीं महान कवि हरिवंशराय बच्चन थे, जिनकी 'मधुशाला' उस दौर में विश्वविद्यालय के छात्र/छात्राओं को सम्मोहित कर देती थी।

दूसरा परिदृश्य- १९९८, मुंबई में जुहू बीच के निकट जुहू चर्च रोड नामक एक छोटी-सी गली है। यह वहां की उस पॉश कॉलोनी से महज ३ मिनट की दूरी पर है, जहां महानायक अमिताभ बच्चन का बंगला 'प्रतीक्षा' स्थित है। इस गली के मध्य में चांद सोसायटी नामक एक हाउसिंग सोसायटी है, जो काफी पुरानी है। आज भी यह इमारत मौजूद है और आप कई बार एक लंबी-सी लिमोजिन को इसके परिसर में प्रवेश करते देख सकते हैं।

आप कह सकते हैं कि मुंबई के किसी इमारत परिसर में लिमोजिन की एंट्री में कौन-सी खास बात है? लेकिन यदि आप चांद सोसायटी की हालत को देखें, तो जरूर आपको वहां पर लिमोजिन का घुसना अजीब लगेगा। ऐसा इसलिए क्योंकि यह बहुत छोटी सोसायटी है और इसमें मध्यमवर्गीय लोग ही रहते हैं। इस चारमंजिला इमारत में कोई लिफ्ट नहीं है और यह बदरंग हो चुकी है। इसके गार्डन इत्यादि के रखरखाव पर भी कोई ध्यान नहीं दिया जाता। जो व्यक्ति लिमोजिन जैसी महंगी गाड़ी का मालिक हो या इसमें सफर करता हो, वह कभी इस मध्यमवर्गीय सोसायटी में नहीं रह सकता।

वास्तव में इस परिसर में किसी छोटी कार के टर्न लेते, अंदर घुसते या बाहर निकलते वक्त इस लिमोजिन गाड़ी को इंतजार भी करना पड़ता है। अमूमन इस लिमोजिन विंड शील्ड से अंदर ड्राइवर और उसके बाजू वाली सीट पर एक शख्स को बैठे देखा जा सकता है, जबकि पीछे की सीटें खाली रहती हैं।

पार्किंग के बाद ड्राइवर की सीट पर बैठा शख्स गाड़ी से नीचे उतरेगा, कार के दूसरी ओर जाएगा और बेहद शालीनता के साथ बाजू वाली सीट पर बैठे शख्स के लिए दरवाजा खोलेगा, जो हमेशा एक महिला होती है। इसके बाद वह महिला से शुभरात्रि कह वापस ड्राइवर की सीट पर जाकर बैठ जाता है और गाड़ी को स्टार्ट कर वापस चला जाता है।

यह दृश्य अक्सर देखा जाता है। रात्रि तकरीबन दस बजे वाले इस दृश्य का हीरो कोई और नहीं अमिताभ बच्चन हैं, जिनका आज जन्मदिन है। मैंने तकरीबन दो वर्षों तक रोज यह नजारा देखा है, जब यह महान अभिनेता बुरे दौर से गुजर रहा था। उनका प्रोडक्शन हाउस एबीसीएल घाटे में चल रहा था और उनके पास भी सिल्वर स्क्रीन पर कोई काम नहीं था। और उनके साथ वाली महिला उनकी वफादार सेके्रटरी रोजी सिंह हैं। रोजी अब भी अमिताभ के साथ ही काम करती हैं।

फंडा यह है कि...

शिष्टाचार निभाना एक कला है। यह ऐसी चीज है जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी भी चलती है। आप जितनी इसमें महारत हासिल करते हैं, उतना ही अपने अच्छे बर्ताव के लिए याद रखे जाएंगे।

raghu@dainikbhaskargroup.com


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