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समस्याओं का तलाशें रचनात्मक समाधान

n.raghuraman | Oct 16, 2012, 11:19AM IST
 
 

एक केले को कमरे की छत के बीचोंबीच इस ऊंचाई पर लटकाया गया, जहां तक चिंपाजी उछलकर न पहुंच सके। उस कमरे में कोई और सामान नहीं था, सिवाय कुछ पैकिंग क्रेट्स के, जो इधर-उधर बिखरी पड़ी थीं। दरअसल ये टेस्ट यह देखने के लिए था कि क्या आप चिंपाजी को क्रेट्स जमाकर रखते हुए उन पर चढ़ केले तक पहुंचना सिखा सकते हैं।

चिंपाजी एक कोने में चुपचाप बैठकर प्रशिक्षक द्वारा क्रेट्स को सीढिय़ों की तरह जमाने और फिर उन्हें वापस बिखेर देने का पूरा नजारा देखता रहा। इसे समझने के बाद चिंपाजी ने इस टास्क को पूरा भी किया। इससे उत्साहित प्रशिक्षक ने अपने सहयोगियों को भी यह देखने के लिए बुलाया कि किस तरह चिंपाजी के्रट्स को करीने-से जमाकर केले तक पहुंचता है। चिंपाजी चुपचाप अपने प्रशिक्षक को कमरे के मध्य तक जाते हुए देखता रहा। जैसे ही प्रशिक्षक केले के ठीक नीचे पहुंचा, चिंपाजी अचानक उछलते हुए उसके कंधे पर चढ़ गया और वहां से ऊपर छलांग लगाते हुए केले को लपक लिया।

हालांकि चिंपाजी क्रेट्स के जरिए सीढिय़ां बनाना सीख चुका था, लेकिन जब उसके दिमाग में कहीं ज्यादा आसान विकल्प आया तो वह इसे आजमाने से नहीं हिचकिचाया। चिंपाजी समस्या को सुलझाना सीख गया था, लेकिन उसने कहीं ज्यादा प्रभावी समाधानों के लिहाज से भी अपना दिमाग खुला रखा। दूसरे शब्दों में कहें तो सीढिय़ां बनाकर केले तक पहुंचना अनेक जरियों में से महज एक जरिया था। दूसरी ओर हम इंसान हैं, जो एक बार कुछ सीख लेते हैं या फिर किसी अधिकृत व्यक्ति (शिक्षक, बॉस इत्यादि) द्वारा हमें किसी खास तरीके से कोई काम करना सिखा दिया जाता है, तो हम उसी ढर्रे से काम करते रहते हैं तथा अन्य विकल्पों पर गौर नहीं करते।

एक प्रयोग के तहत कुछ इंसानों को दो समूह में बांटते हुए एक पेंडुलम बनाने का काम दिया गया। इन लोगों को एक टेबल तक ले जाया गया, जिस पर डोरी से जुड़ा हुआ एक पेंडुलम, एक कील तथा कुछ और चीजें रखी थीं। उनसे इस पेंडुलम को दीवार पर टांगने के लिए कहा गया। टेबल पर कील तो रखी थी, लेकिन इसे ठोकने के लिए कोई हथौड़ा नहीं था। पहले समूह के लोग चक्कर में पड़ गए और इस टास्क को बगैर हथौड़े के पूरा नहीं कर सके। जबकि दूसरे समूह के लोगों ने कील ठोकने के लिए पेंडुलम का इस्तेमाल किया। इसके बाद डोरी को इस कील से बांधते हुए पेंडुलम को लटका दिया। दूसरे समूह ने उपलब्ध चीजों पर गौर किया और हथौड़े के बारे में नहीं सोचा। इस तरह वे इस टास्क को पूरा करने में सफल रहे, वहीं पहला समूह नाकाम रहा। मनोविज्ञानी रचनात्मक सोच के बारे में बोलते समय अकसर इस तरह की कहानियां सुनाते हैं।

रचनात्मक सोच दरअसल समावेशी सोच है। आप समस्या के विभिन्न पहलुओं पर गौर करते हुए समाधान के सर्वाधिक संभावनाशील विकल्प के अलावा दूरगामी विकल्पों पर भी विचार करते हैं। तमाम विकल्पों पर गौर करने की यह मंशा ही अहम है, भले ही आपको समाधान का कोई पुख्ता विकल्प मिल गया हो।

हममें से ज्यादातर लोगों को एक्सक्लूसिव तरीके से सोचना सिखाया जाता है, जिसका मतलब है कि अपनी सोच को सीमित करते हुए अपना ध्यान सिर्फ किसी खास जानकारी पर ही लगाएं और बाकी चीजों को भूल जाएं। एक्सक्लूसिव सोच अपनाना खासकर तब अच्छा होता है, जब हमें भलीभांति पता हो कि कौन-सी जानकारी प्रासंगिक है और कौन-सी नहीं। अनेक या कहें कि ज्यादातर परिस्थितियां जटिल होती हैं। ऐसे मौकों पर एक्सक्लूसिव थिंकिंग को अपनाने से हम उलझनों से जुड़ी कई अहम चीजों को नजरअंदाज कर सकते हैं। एक्सक्लूसिव थिंकिंग न सिर्फ अप्रासंगिक तथ्यों व धारणाओं को दिमाग में आने से रोकती है, वरन यह कल्पनाशीलता का मार्ग भी अवरुद्ध कर देती है।
 
 
 

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