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उपभोक्ता वस्तुओं के क्षेत्र में आएं

एन. रघुरामन | Oct 18, 2012, 10:00AM IST
 
 


















 

 

मान लीजिए कि आप कॉलेज से पढ़कर निकलते हैं और आपको ऐसी जगह पर नौकरी का प्रस्ताव मिलता है, जो आपकी मूल जगह से काफी दूर है। ऐेसे में आप कुछ ऐसा करने के बारे में सोच सकते हैं, जिसमें आपकी अच्छी कमाई हो और आपको अपने प्यारे घर से दूर भी न जाना पड़े। 

इस लिहाज से आपके लिए सिर्फ एक ही विकल्प बचता है कि उपभोक्ता वस्तुओं व सेवा के क्षेत्र में आ जाएं। कारण यह है कि भारत व चीन हर साल कुल मिलाकर ५२४ लाख करोड़ रुपए के उत्पाद खरीदते हैं। आर्थिक सुस्ती के बीच यदि कोई अभी भी बड़ी मात्रा में खरीदारी कर रहा है, तो वे भारतीय और चीनी लोग ही हैं। 

यह हाल ही में प्रकाशित किताब 'द १० ट्रिलियन डॉलर प्राइज' से ली गई दो पंक्तियां हैं। इस किताब को बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप के चेयरमैन माइकल सिल्वरस्टीन और कंज्यूमर-साउथ एशिया के हेड अभीक सिंघी ने लिखा है। यह किताब कहती है कि चीन व भारत सकारात्मक व आशावादी बने हुए हैं, जबकि अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देश इन दो उभरती महाशक्तियों के मुकाबले कम खर्च करेंगे। भारत में शॉपिंग में अच्छा उछाल देखने में आ रहा है, जबकि चीन इस मामले में थोड़ा आगे है। 

दूसरी ओर अमेरिका जो पिछले ४०-५० साल से सबसे ज्यादा किराना खरीदता आ रहा था, अब उसकी रफ्तार सुस्त हो गई है और वहां पर सजगतापूर्वक किराना सामग्रियां खरीदी जा रही हैं। वहां कारों की बिक्री बढ़ी है और मकानों की बिक्री में भी सुधार हुआ है, लेकिन किराना की बिक्री रफ्तार नहीं पकड़ पा रही है। दूसरी ओर भारत में ट्रेंड अचानक पलट गया है। हालांकि लोग अब भी मकान खरीद रहे हैं, लेकिन उनकी किराना आइटम्स की नई-नई वैरायटीज पर खर्च करने की क्षमता ज्यादा बढ़ गई है। 

पिछले दो वर्षों से जहां दुनिया की ज्यादातर अर्थव्यवस्थाओं में सुस्ती देखी जा रही है, वहीं भारत में उपभोक्ता वस्तुओं से जुड़ी कंपनियां ज्यादातर इससे अप्रभावित रही हैं। विकास के नजरिए से देखें तो पैकेज्ड फूड सेक्टर तेजी से बढ़ा है। भारत में लोग पैकेज्ड ब्रेड से लेकर पैकेज्ड दूध और पैकेज्ड सूप तक हर चीज धड़ाधड़ खरीद रहे हैं। भारत में इलेक्ट्रॉनिक्स से जुड़ी टिकाऊ उपभोक्ता वस्तुओं की बिक्री ठीकठाक है, लेकिन इनकी पुनर्खरीद बहुत कम है। यह भारतीय खरीदारों की 'पैसा वसूल' मानसिकता को दर्शाता है। जब भी वे कोई टिकाऊ उत्पाद खरीद लेते हैं, तो वे इससे अधिकतम हासिल करने से पहले इसे नहीं बदलते। 

भले ही यह उनके लिए मुफीद न हो या उनकी अपेक्षाओं के लिहाज से कम उपयोगी हो। यदि हमारे कारोबारी सजगतापूर्वक किराना में क्षमता बढ़ाएं, तो यह अवधि २०२० तक चलने वाली है। यह भारतीय किराना बाजार के लिए विकास का समय है। यह किताब तो यही कहती है। इन लेखकों ने यह भी कहा है कि युवा भारतीय अच्छा खाना चाहते हैं और उनके पास पिछली पीढ़ी के मुकाबले ज्यादा विकल्प भी हैं। 

यही कारण है कि वे ऐसे उत्पाद खरीदते हैं, जिन्हें किचन में पकाना आसान हो। लेकिन युवा आबादी कम में ज्यादा भी पाना चाहती है, जो एक बार फिर 'पैसा वसूल' मनोवृत्ति है। यदि कोई शख्स एक साल में सूप के १०० पैकेट बेचता है, तो अगले साल वह इसके कम से कम ३०० पैकेट बेचेगा। यानी किराना बाजार के अगले एक साल में तीन गुना तक होने का अनुमान है। 

फंडा यह है कि... 

अगले आठ साल भारत में उपभोक्ता वस्तुओं में तीव्र खपत का दौर रहेगा। इस खुले व उन्मादी बाजार के दोहन के लिए तैयार हो जाएं, जिससे आप लंबे समय तक मुनाफा कमा सकेंगे। 

raghu@dainikbhaskargroup.com 



 

 


 

 
 
 

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