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छोटे संस्थानों में मिलता है हर तरह का अनुभव

एन. रघुरामन | Oct 23, 2012, 11:38AM IST
 
 

रवि मल्होत्रा ने एक बड़े बहुराष्ट्रीय संस्थान में तकरीबन १५ साल काम करने के बाद उसे पिछले साल अलविदा कह दिया। यह संस्थान छोड़ते ही उसे दूसरी जगह नौकरी भी मिल गई। लेकिन उसकी यह नौकरी महज तीन महीने चली और पिछले १२ महीनों में उसने पांच नौकरियां बदलने के बाद आखिरकार अपना काम शुरू कर दिया। आप सोच रहे होंगे कि आखिर रवि के साथ ऐसा क्यों हुआ? यदि वह काम में अच्छा नहीं था तो बड़े संस्थान ने उसे अपने यहां १५ साल तक क्यों बरकरार रखा? आखिर उन पांच संस्थानों में वह सहज क्यों नहीं रहा, जो उसे एक के बाद एक नौकरी ऑफर करते गए? इन तमाम संस्थानों ने उसे १५ वर्ष के अनुभव के आधार पर नौकरी दी, न कि कुछ महीने इधर-उधर काम करने के आधार पर।

इसके उलट सुरेश बालासुब्रह्मण्यन अमेरिका में एक कार्गो एयरलाइंस में पायलट था। वहां उसने विमान उड़ाने से लेकर एजेंट से धन संग्रह करने तक एयरलाइन बिजनेस से जुड़े हर विभाग में काम किया। १९९० के दशक में भारतीय आकाश को निजी कंपनियों के लिए खोलने के बाद किंगफिशर ने सुरेश को अपने यहां नौकरी पर रख लिया। जब किंगफिशर की हालत खराब होने लगी तो सुरेश के साथ-साथ अमेरिका में छोटी-मोटी एयरलाइन कंपनियों में काम कर चुके २० अन्य पायलटों को लागोस में स्थित एरिक एयरलाइंस द्वारा चुन लिया गया। इन्हें उनके कॅरियर में छोटी-मोटी कंपनियों में प्राप्त अनुभव के आधार पर चुना गया। मैरिको कंपनी (जो पैराशुट नारियल तेल उत्पादित करती है) के अध्यक्ष व प्रबंध निदेशक हर्ष मरीवाला ने एक साक्षात्कार में कहा- 'यदि आप बड़े संस्थान का हिस्सा हैं तो आपकी भूमिका सीमित हो सकती है और इसके चलते आप सीमित चीजों के ही संपर्क में आएंगे।' उनका यह भी कहना था कि छोटे संस्थानों में कर्मचारियों को विभिन्न तरह की परिस्थितियों के साथ कहीं ज्यादा समग्र तरीके से निपटना पड़ता है और इस तरह वे कंपनी संचालन से संंबंधित हर तरह की चीजों के बारे में जान जाते हैं।

छोटे संस्थानों में लीडर्स को प्रतिभाओं को आकर्षित करने व बरकरार रखने के लिए लोगों के साथ काम करने, सही टीमें चुनने और संस्थान के लिए एक तरह की संस्कृति स्थापित करने के काबिल होना चाहिए। छोटी जगहों पर लीडर्स में यह काबिलियत होनी चाहिए कि वे काम को करवा सकें और जमकर सौदेबाजी कर सकें तथा बाधाओं से आसानी से निपट सकें।

इसके अलावा उन्हें यह भी पता होना चाहिए कि नपा-तुला जोखिम कैसे लिया जाए तथा हर कदम पर कैसे नवोन्मेषी बना जाए। उनमें नाकामी हाथ लगने पर प्रतिकूल परिस्थितियों से उबरने की क्षमता भी होनी चाहिए। मरीवाला की राय में विकास की मानसिकता वाले लोगों का साथ पाना तभी मुमकिन है, जबकि आपके पास ऐसे लोग हों, जिन्हें किसी एक विभाग की विशेषज्ञता की बजाय तमाम विभागों में काम करने का अनुभव हो। यही कारण है कि रवि मल्होत्रा वाइस प्रेसिडेंट होने के बावजूद छोटे संस्थानों में सफल नहीं रहा, जबकि वह बड़े संस्थान में १५ साल तक टिका रहा था। मल्होत्रा इन तमाम नई कंपनियों में एक कारगर बिजनेस मॉडल तैयार करने लायक माहौल नहीं बना सका। इसी वजह से उसे इतने कम समय में एक कंपनी से दूसरी कंपनी में जाना पड़ा।

फंडा यह है कि...

चौतरफा अनुभव कर्मचारियों को नई नौकरियों की ओर जाने का मौका देता है, जबकि एक ही विभाग में जमे रहना आपके लिए इस तरह की गतिविधियों को बाधित कर देता है।

raghu@dainikbhaskargroup.com

एन. रघुरामन

मैनेजमेंट फंडा
 
 
 

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