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देने के लिए अमीर होना जरूरी नहीं

N.Raghuraman | Nov 02, 2012, 11:15AM IST
 
 

आप और हम जानते हैं कि एक आयुर्वेदिक डॉक्टर कितना कमा सकता है। पेशेवरतौर पर वह चाहे जितना लोकप्रिय हो, फिर भी शायद ही कभी उसकी कमाई अन्य माध्यम के मेडिकल प्रैक्टिसनर्स की आय को पार सकती है। ऐसे में उसकी पत्नी (जो एक आम गृहिणी है) उसकी कमाई में हाथ बंटाने के लिए टिफिन सर्विस शुरू कर देती है। उसके टिफिन सेंटर में हर दिन ६५ 'अतिरिक्त' लोगों का भोजन तैयार किया जाता हो तो आप समझ सकते हैं कि उस इलाके में टिफिन का कारोबार कैसा चलता होगा।

४३ वर्षीय डॉ. उदय मोदी के घर का मामला कुछ ऐसा ही है। जहां उनकी पत्नी अपने नॉर्मल फूड बिजनेस के साथ ६५ बुजुर्ग लोगों के लिए एक मुफ्त टिफिन सेवा चला रही हैं। यह 'अतिरिक्त' भोजन बेचने के लिए नहीं है। ये उन वरिष्ठ नागरिकों के लिए है, जिन्हें अच्छा कमाने वाले उनके बच्चों ने छोड़ दिया है और अब ये बेसहारा पश्चिमी मुंबई के मीरा-भयंदर नामक उपनगरीय इलाके में रहते हैं। भयंदर (पश्चिम) के नारायण नगर इलाके में डॉ. मोदी १५ साल से क्लीनिक चला रहे हैं।

उन्होंने कम उम्र में ही पिता को खो दिया। मां को अकेले परिवार चलाने के लिहाज से काफी संघर्ष करना पड़ा। वह मां के संघर्ष को आज भी नहीं भूले हैं, जिसने उन्हें इस तरह का नेक काम करने की प्रेरणा दी। उन्होंने टिफिन सर्विस को 'श्रवण टिफिन सर्विस' नाम दिया है। बुजुर्गों को मुफ्त भोजन के साथ चिकित्सा सेवाएं भी दी जाती हैं।

डॉ. मोदी इन ६५ लोगों को अपने विस्तारित परिवार का हिस्सा मानते हैं। इनमें से नौ लोग शारीरिकतौर पर नि:शक्त, चार लकवाग्रस्त और दो दृष्टिहीन हैं। 'श्रवण टिफिन सर्विस' के भोजन में आठ चपाती, दो सब्जी, दाल, चावल और पापड़ होता है। मधुमेह के रोगियों के लिए वे कम नमक व तेल से बना खास भोजन तैयार करते हैं।

इसकी शुरुआत वर्ष २००९ में हुई। डॉ. मोदी अपने क्लीनिक में मरीजों को देख रहे थे। तभी एक लकवाग्रस्त बुजुर्ग इलाज के लिए आए। मोदी यह जानकर हैरान रह गए कि उनके तीन बेटे हैं, जिनमें से कोई भी उन्हें अपने साथ नहीं रखना चाहता। डॉ. मोदी ने शुरुआत में एक स्थानीय कैटरर से संपर्क कर उनके लिए डेली लंच का इंतजाम किया। यहीं से उनके मन में एक टिफिन सर्विस यूनिट शुरू करने का ख्याल आया। उन्होंने एक सर्वे करते हुए पता लगाया कि 'मीरा-भयंदर' इलाके में ऐसे ६५ बुजुर्ग रहते हैं, जिन्हें संतानों ने त्याग दिया है। इसके बाद उन्होंने अपनी पत्नी के साथ मिलकर 'श्रवण टिफिन सर्विस' की शुरुआत की। इसके लिए उन्होंने अपने दिवंगत पिता के नाम पर हिम्मतलाल हरजीवनलाल मोदी चैरिटेबल ट्रस्ट की स्थापना भी की।

डॉ. मोदी हर हफ्ते इन बुजुर्गों का चेकअप करते हैं और स्वास्थ्य संबंधी कोई समस्या होने पर उम्र के मुताबिक उचित दवाइयां देते हैं। मधुमेह के रोगियों का वह नियमित अंतराल पर यूरिन व ब्लड टेस्ट करवाते हैं, ताकि उनका ब्लड-शुगर लेवल पता चले और उनकी सेहत पर निगाह रखी जा सके। इस पूरी कवायद में हर महीने उनके तकरीबन सवा लाख रुपए खर्च होते हैं, जिसमें इन बुजुर्गों को पॉकेटमनी देना भी शामिल है।
आप और हम जानते हैं कि एक आयुर्वेदिक डॉक्टर कितना कमा सकता है। पेशेवरतौर पर वह चाहे जितना लोकप्रिय हो, फिर भी शायद ही कभी उसकी कमाई अन्य माध्यम के मेडिकल प्रैक्टिसनर्स की आय को पार सकती है। ऐसे में उसकी पत्नी (जो एक आम गृहिणी है) उसकी कमाई में हाथ बंटाने के लिए टिफिन सर्विस शुरू कर देती है। उसके टिफिन सेंटर में हर दिन ६५ 'अतिरिक्त' लोगों का भोजन तैयार किया जाता हो तो आप समझ सकते हैं कि उस इलाके में टिफिन का कारोबार कैसा चलता होगा।

४३ वर्षीय डॉ. उदय मोदी के घर का मामला कुछ ऐसा ही है। जहां उनकी पत्नी अपने नॉर्मल फूड बिजनेस के साथ ६५ बुजुर्ग लोगों के लिए एक मुफ्त टिफिन सेवा चला रही हैं। यह 'अतिरिक्त' भोजन बेचने के लिए नहीं है। ये उन वरिष्ठ नागरिकों के लिए है, जिन्हें अच्छा कमाने वाले उनके बच्चों ने छोड़ दिया है और अब ये बेसहारा पश्चिमी मुंबई के मीरा-भयंदर नामक उपनगरीय इलाके में रहते हैं। भयंदर (पश्चिम) के नारायण नगर इलाके में डॉ. मोदी १५ साल से क्लीनिक चला रहे हैं।

उन्होंने कम उम्र में ही पिता को खो दिया। मां को अकेले परिवार चलाने के लिहाज से काफी संघर्ष करना पड़ा। वह मां के संघर्ष को आज भी नहीं भूले हैं, जिसने उन्हें इस तरह का नेक काम करने की प्रेरणा दी। उन्होंने टिफिन सर्विस को 'श्रवण टििन सर्विस' नाम दिया है। बुजुर्गों को मुफ्त भोजन के साथ चिकित्सा सेवाएं भी दी जाती हैं।

डॉ. मोदी इन ६५ लोगों को अपने विस्तारित परिवार का हिस्सा मानते हैं। इनमें से नौ लोग शारीरिकतौर पर नि:शक्त, चार लकवाग्रस्त और दो दृष्टिहीन हैं। 'श्रवण टिफिन सर्विस' के भोजन में आठ चपाती, दो सब्जी, दाल, चावल और पापड़ होता है। मधुमेह के रोगियों के लिए वे कम नमक व तेल से बना खास भोजन तैयार करते हैं।

इसकी शुरुआत वर्ष २००९ में हुई। डॉ. मोदी अपने क्लीनिक में मरीजों को देख रहे थे। तभी एक लकवाग्रस्त बुजुर्ग इलाज के लिए आए। मोदी यह जानकर हैरान रह गए कि उनके तीन बेटे हैं, जिनमें से कोई भी उन्हें अपने साथ नहीं रखना चाहता। डॉ. मोदी ने शुरुआत में एक स्थानीय कैटरर से संपर्क कर उनके लिए डेली लंच का इंतजाम किया। यहीं से उनके मन में एक टिफिन सर्विस यूनिट शुरू करने का ख्याल आया। उन्होंने एक सर्वे करते हुए पता लगाया कि 'मीरा-भयंदर' इलाके में ऐसे ६५ बुजुर्ग रहते हैं, जिन्हें संतानों ने त्याग दिया है। इसके बाद उन्होंने अपनी पत्नी के साथ मिलकर 'श्रवण टिफिन सर्विस' की शुरुआत की। इसके लिए उन्होंने अपने दिवंगत पिता के नाम पर हिम्मतलाल हरजीवनलाल मोदी चैरिटेबल ट्रस्ट की स्थापना भी की।

डॉ. मोदी हर हफ्ते इन बुजुर्गों का चेकअप करते हैं और स्वास्थ्य संबंधी कोई समस्या होने पर उम्र के मुताबिक उचित दवाइयां देते हैं। मधुमेह के रोगियों का वह नियमित अंतराल पर यूरिन व ब्लड टेस्ट करवाते हैं, ताकि उनका ब्लड-शुगर लेवल पता चले और उनकी सेहत पर निगाह रखी जा सके। इस पूरी कवायद में हर महीने उनके तकरीबन सवा लाख रुपए खर्च होते हैं, जिसमें इन बुजुर्गों को पॉकेटमनी देना भी शामिल है।
 
 
 

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