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दूसरे प्राणियों को भी अपना सहजीवी बनाएं हम

एन. रघुरामन | Nov 22, 2012, 12:54PM IST
 
 








हमारी इस पृथ्वी पर इंसान के साथ-साथ कई अन्य प्राणी भी रहने के हकदार हैं। यदि आप इस ग्रह को पूरी तरह सिर्फ इंसानों से भर दें तो यह रहने लायक नहीं रह जाएगा। यदि हम अपने जीवन में इन तमाम प्राणियों से नहीं मिल सकते, तो कम से कम कुछ को देख ही सकते हैं और इनमें से कुछ को अपने साथ भी रख सकते हैं। ऐसा करके तो देखिए। इससे आपके जीवन में एक नया रंग भर जाएगा। 

raghu@dainikbhaskargroup.com 

बीते सोमवार को मैं एक वेटरनरी डॉक्टर की डिस्पेंसरी के बाहर बैठकर अपनी बारी आने का इंतजार कर रहा था। तभी मैंने पास की चाल में रहने वाले कुछ बच्चों को तेजी से वहां आते हुए देखा। उनके हाथ में बिल्ली का एक नवजात बच्चा था, जिसकी हालत बेहद गंभीर लग रही थी। बच्चे उसे डॉक्टर को दिखाने लाए थे। किसी ने उन्हें नहीं रोका। उनमें से कुछ लड़के बाहर इंतजार करने लगे और तीन बच्चे अपनी चप्पलें उतारकर (यह अहम बात है क्योंकि अमूमन लोग वेटरनरी डॉक्टर के पास जाते हुए अपने जूते-चप्पल नहीं उतारते, लेकिन संभवत: उन बच्चों को किसी ने बताया होगा कि वे चप्पलें उतारकर ही क्लिनिक के अंदर जाएं) बिल्ली के बच्चे को लिए अंदर सीधे ऑपरेशन थिएटर की ओर भागे। उनके चेहरों को देखकर मैं समझ गया कि उनके मन में भी कहीं न कहीं यह आशंका है कि बिल्ली का बच्चा जिंदा नहीं है। लेकिन वे उसे डॉक्टर से दिखाकर तसल्ली करना चाहते थे। जल्द ही वे वहां से बाहर आ गए। बिल्ली के बच्चे को गोद में थामने वाले बालक के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। डॉक्टर ने बिल्ली के बच्चे को 'मृत' घोषित कर दिया था। उसकी गैंग के बाकी लड़के उसे सांत्वना देते हुए वहां से वापस ले गए। 

एक नन्हे प्राणी के लिए उनकी यह भावना मेरे दिल को छू गई। इस दृश्य ने मुझे अपने बचपन के उन दिनों में पहुंचा दिया, जब इस तरह आवारा पशुओं को बचाना व संरक्षण देना आम बात हुआ करती थी। उन बच्चों को देखकर मुझे लगा कि मानवता अभी भी मरी नहीं है, कम से कम निर्धन वर्ग में तो नहीं। मैंने सड़कों पर भिखारियों को अपने भोजन में से इन आवारा पशुओं को निवाला खिलाते देखा है, जो इस बेरहम शहर में उनकी मदद करते हैं। उसी शाम मेरा एक पॉश सोसायटी में भी जाना हुआ, जहां पर उसकी सालाना बैठक में एक प्रस्ताव पेश करते हुए रहवासियों से पालतू जानवर और खासकर कुत्ता पालना प्रतिबंधित करने की बात कही गई थी। उस सोसायटी में सैकड़ों बच्चे तरह-तरह के गेम खेल रहे थे। 

इसका मतलब था कि बच्चों की यह पीढ़ी नहीं जान पाएगी कि किसी कुत्ते, बिल्ली, चिडिय़ा, मछली, खरगोश, तितली, पतंगे या घोंघे को स्पर्श करने की अनुभूति क्या होती है। जानवरों के प्रति इस द्वेष को देखकर मुझे दुख हुआ। 

इसके बाद मैं अपने पालतू कुत्ते की एंडोस्कोपी करवाने के लिए एक बड़े पशु चिकित्सालय में पहुंचा। वहां मैंने देखा कि एक भीमकाय बैल का उपचार किया जा रहा है और बाजू में खड़ा इंडियन सारस उस बैल के शरीर की सफाई कर रहा है तथा बैल उसकी नन्ही पूंछ को चाट रहा है। सारस जानता था कि बैल उसे कोई नुकसान नहीं पहुंचाएगा और बैल को भी पता था कि यह पंछी उसके शरीर में चिपके कृमियों को चुनकर अलग कर देगा। 

यह सहजीविता की बेहतरीन मिसाल थी। जहां तक 'पालतुओं' की बात है तो कुत्ता एकमात्र ऐसी डिजाइनर प्रजाति है, जिसे इंसान ने अपनेे साथी के तौर पर तैयार किया है। कई बार उसके साथ भी बुरा बर्ताव होते देखा जाता है। 

हम अपने जीवन में दया व उदारता जैसे मूल्यों के बारे में खूब बातें करते हैं, लेकिन अपने साथ रहने वाली अन्य प्रजातियों के प्रति इन्हें अमल में नहीं लाते। उन लड़कों जैसे करुणा के असंख्य टापुओं को देखें। मैं जानता हूं कि वहां एक उम्मीद है। दुर्भाग्य यह है कि मानवता अब समाज की एक अलग परत से आ रही है। हमारे बच्चे एक बंद समाज में परवरिश पा रहे हैं, जहां पर वे अपने परिजनों और शिक्षकों के अलावा सिर्फ गार्ड, ड्राइवर और घरेलू नौकर-नौकरानियों को देखते हैं, जो सभी इंसान हैं। इस तरह वे यह नहीं देख पाते कि प्रकृति ने इंसान के साथ-साथ हजारों-हजार अन्य प्रजतियों को भी पैदा किया है। वह दिन दूर नहीं जब वे भारतीय सारस जैसे साधारण पंछी को भी किसी डीवीडी या एचडीटीवी में ही देख पाएं। 

 

 
 
 

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